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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1622 of 1855

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Page 1622

हम तुम्हें देखें. (९)
शं नो भव चक्षसा शं नो अह्ना शं भानुना शं हिमा शं घृणेन.
यथा शमध्वञ्छमसद् दुरोणे तत्सूर्य द्रविणं धेहि चित्रम्.. (१०)
हे सूर्य! तुम अपने तेज, दिवस, किरण, शीतलता एवं उष्णता के द्वारा हमारे लिए
कल्याणकारी बनो. हम चाहे मार्ग में हों या अपने घर में, तुम हमें यह विचित्र संपत्ति दो. (१०)
अस्माकं देवा उभयाय जन्मने शर्म यच्छत द्विपदे चतुष्पदे.
अदत्पिबदूर्जयमानमाशितं तदस्मे शं योररपो दधातन.. (११)
हे देवो! तुम हमारे द्विपद और चतुष्पद दोनों प्रकार के प्राणियों को सुख दो. सब प्राणी
खाते-पीते एवं शक्तिशाली बनें. तुम प्राणियों को सुख एवं पापहीनता प्रदान करो. (११)
यद्वो देवाश्चकृम जिह्वया गुरु मनसो वा प्रयुती देवहेळनम्.
अरावा यो नो अभि दुच्छुनायते तस्मिन्तदेनो वसवो नि धेतन.. (१२)
हे निवासस्थान देने वाले देवो! हमने वचन अथवा मन के प्रयोग से तुम्हारा जो अपमान
किया है, उस पाप को तुम उस पर डालो जो हम पर आक्रमण करके हमारे प्रति पाप का
आचरण करता है. (१२)
सूक्त—३८ देवता—इंद्र
अस्मिन्न इन्द्र पृत्सुतौ यशस्वति शिमीवति क्रन्दसि प्राव सातये.
यत्र गोषाता धृषितेषु खादिषु विष्वक्पतन्ति दिद्यवो नृषाह्ये.. (१)
हे इंद्र! तुम यश देने वाले व परस्पर प्रहारों से युक्त युद्ध में सिंहनाद करते हो एवं धन
पाने के लिए हमारी रक्षा करते हो. गायों का लाभ कराने वाले एवं मानवों को पराजित करने
वाले युद्ध में योद्धा एक-दूसरे को नष्ट करते हैं एवं दीप्त आयुध चारों ओर गिरते हैं. (१)
स नः क्षुमन्तं सदने व्यूर्णुहि गोअर्णसं रयिमिन्द्र श्रवाय्यम्.
स्याम ते जयतः शक्र मेदिनो यथा वयमुशमसि तद्वसो कृधि.. (२)
हे प्रसिद्ध इंद्र! तुम हमारे घर में इतनी प्रशंसनीय संपत्ति भर दो कि गाएं सागर के जल
के समान पर्याप्त मात्रा में हों. हे शक्र! हम तुम्हारी विजय पर शक्तिशाली बनें. हे वासदाता
इंद्र! हम जो कामना करें, उसे पूरा करो. (२)
यो नो दास आर्यो वा पुरुष्टुतादेव इन्द्र युधये चिकेतति.
अस्माभिषे सुसहाः सन्तु शत्रवस्त्वया वयं तान्वनुयाम सङ्गमे.. (३)
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