Skip to content
SarvaKosh
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1613 of 1855

Read in context
Page 1613

सूक्त—३४ देवता—अक्ष अर्थात् पासे
प्रावेपा मा बृहतो मादयन्ति प्रवातेजा इरिणे वर्वृतानाः.
सोमस्येव मौजवतस्य भक्षो विभीदको जागृविर्मह्यमच्छान्.. (१)
प्रवण देश में उत्पन्न बड़े-बड़े पासे जुआ खेलने के तख्ते पर इधर-उधर बिखरते हुए
मुझे आनंदित करते हैं. जीत-हार में हर्ष-शोक जगाने वाला पासा मुझे उसी प्रकार सुख देता
है, जिस प्रकार मुंजवान् पर्वत पर उत्पन्न सोमलता का रस पीकर सुख मिलता है. (१)
न मा मिमेथ न जिहीळ एषा शिवा सखिभ्य उत मह्यमासीत्.
अक्षस्याहमेकपरस्य हेतोरनुव्रतामप जायामरोधम्.. (२)
यह पत्नी न मुझसे कभी अप्रसन्न हुई और न इसने कभी मुझसे लज्जा की. यह मेरे
मित्रों और मेरे प्रति सुखकारी थी. इस प्रकार सर्वथा अनुकूल पत्नी को भी मैंने एकमात्र पासों
के कारण त्याग दिया. (२)
द्वेष्टि श्वश्रूरप जाया रुणद्धि न नाथितो विन्दते मर्डितारम्.
अश्वस्येव जरतो वस्न्यस्य नाहं विन्दामि कितवस्य भोगम्.. (३)
सास जुआ खेलने वाले की निंदा करती है एवं पत्नी उसे छोड़ जाती है. यदि वह धन
मांगे तो उसे कोई देने वाला नहीं मिलता. जिस प्रकार बूढ़े घोड़े का कुछ भी मूल्य नहीं लगता,
उसी प्रकार मुझ जुआरी का कहीं आदर नहीं होता. (३)
अन्ये जायां परि मृशन्त्यस्य यस्यागृधद्वेदने वाज्य१क्षः.
पिता माता भ्रातर एनमाहुर्न जानीमो नयता बद्धमेतम्.. (४)
शक्तिशाली पासे जिस जुआरी के धन को लालच की दृष्टि से देखते हैं, उसकी
व्यभिचारिणी पत्नी का दूसरे लोग स्पर्श करते हैं. जुआरी के माता, पिता एवं भाई कर्ज मांगने
वालों से कहते हैं—"हम इसे नहीं जानते. इसे बांधकर ले जाओ." (४)
यदादीध्ये न दविषाण्येभिः परायद्भ्योऽव हीये सखिभ्यः.
न्युप्ताश्च बभ्रवो वाचमक्रतं एमीदेषां निष्कृतं जारिणीव.. (५)
जब मैं निश्चय कर लेता हूं कि जुआ नहीं खेलूंगा, तब मैं आए हुए जुआरी मित्रों को
त्याग देता हूं. किंतु जब जुआ खेलने के तख्ते पर फेंके हुए पीले रंग वाले पासे शब्द करते हैं,
तब मैं उस स्थान की ओर ऐसे चला जाता हूं, जैसे व्यभिचारिणी स्त्री संकेतस्थान पर पहुंच
जाती है. (५)
सभामेति कितवः पृच्छमानो जेष्यामीति तन्वा३ शूशुजानः.
ebook converter DEMO Watermarks*