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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages
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यजमान के घर में सुख से बैठे होओ. तुम हमारा यह स्तोत्र सुनो. (१७)
उत स्या श्वेतयावरी वाहिष्ठा वां नदीनाम्. सिन्धुर्हिरण्यवर्तनिः.. (१८)
नदियों में सबसे अधिक बहने वाली एवं सोने के मार्ग वाली श्वेतयावरी नामक नदी
स्तुति के साथ तुम्हारे समीप जाती है. (१८)
स्मदेतया सुकीर्त्याश्विना श्वेतया धिया. वहेथे शुभ्रयावाना.. (१९)
हे शोभन गमन वाले अश्विनीकुमारो! शोभन स्तुति वाली, श्वेत जल वाली एवं दोनों
किनारों पर बसे लोगों का पोषण करने वाली श्वेतयावरी नदी को प्रवाहित करो. (१९)
युक्ष्वा हि त्वं रथासहा युवस्व पोष्या वसो.
आन्नो वायो मधु पिबास्माकं सवना गहि.. (२०)
हे वायु! तुम रथ खींचने योग्य दोनों घोड़ों को रथ में जोड़ो. हे निवासस्थान देने वाले
वायु! उन पोषण-योग्य घोड़ों को संग्राम में मिलाओ. इसके बाद तुम मधु पिओ एवं तीनों
सवनों में आओ. (२०)
तव वायवृतस्पते त्वष्टुर्जामातरद्भुत. अवांस्या वृणीमहे.. (२१)
हे यज्ञपालक कर्त्ता, ब्रह्मा के जमाई एवं विचित्र कर्म करने वाले वायु! हम तुम्हारे पालन
को प्राप्त करते हैं. (२१)
त्वष्टुर्जामातरं वयमीशानं राय ईमहे. सुतावन्तो वायुं द्युम्ना जनासः.. (२२)
हम लोग ब्रह्मा के दामाद एवं सबके स्वामी वायु के प्रति सोमरस निचोड़कर धन मांगते
हैं. वायु द्वारा दिए धन से हम धनी होंगे. (२२)
वायो याहि शिवा दिवो वहस्वा सुस्वश्व्यम्. वहस्व महः पृथुपक्षसा रथे.. (२३)
हे वायु! स्वर्गलोक से कल्याणों को यहां लाओ एवं शोभन गति वाले रथों को चलाओ.
हे महान् वायु! मोटी बगलों वाले घोड़ों को अपने रथ में जोड़ो. (२३)
त्वां हि सुप्सरस्तमं नृषदनेषु हूमहे. ग्रावाणं नाश्वपृष्ठं मंहना.. (२४)
हे अतिशय सुंदर व महिमा से सबको व्याप्त करने वाले वायु! जिस प्रकार सोमरस
निचोड़ने के लिए पत्थर बुलाया जाता है, उसी प्रकार यज्ञों में हम तुम्हें बुलाते हैं. (२४)
स त्वं नो देव मनसा वायो मन्दानो अग्रियः. कृधि वाजाँ अपो धियः.. (२५)
हे देवों में प्रमुख वायु देव! तुम मन से प्रसन्न होकर हमें अन्न, जल एवं यज्ञकर्म प्रदान
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करो. (२५)
सूक्त—२७ देवता—विश्वेदेवगण
अग्निुरुक्थे पुरोहितो ग्रावाणो बर्हिरध्वरे.
ऋचा यामि मरुतो ब्रह्मणस्पतिं देवाँ अवो वरेण्यम्.. (१)
इस स्तोत्रपूर्ण यज्ञ में अग्नि की स्थापना सोमरस कुचलने वाले पत्थरों एवं कुशों के
अगले भाग में हुई है. मैं मरुद्गण ब्रह्मणस्पति एवं अन्य देवों से वरण योग्य रक्षा की याचना
करता हूं. (१)
आ पशुं गासि पृथिवीं वनस्पतीनुषासा नक्त मोषधीः.
विश्वे च नो वसवो विश्ववेदसो धीनां भूत प्रावितारः.. (२)
हे अग्नि! तुम रात तथा दिन में हमारे यज्ञ के पशु, यज्ञभूमि, वनस्पति एवं ओषधियों के
समीप आते हो. हे निवासस्थान देने वाले विश्वेदेव! तुम हमारे यज्ञ कर्मों के रक्षक बनो. (२)
प्रसून एत्वध्वरो३ ग्ना देवेषु पूर्व्यः.
आदित्येषु प्र वरुणे धृतव्रते मरुत्सु विश्वभानुषु.. (३)
हमारा प्राचीन यज्ञ अग्नि तथा अन्य देवों के पास भली प्रकार जावे. हमारा यज्ञ
आदित्यों, व्रतधारी वरुण एवं सब ओर तेज फैलाने वाले मरुतों के समीप जावे. (३)
विश्वे हि ष्मा मनवे विश्ववेदसो भुवनवृधे रिशादसः.
अरिष्टेभिः पायुभिर्विश्ववेदसो यन्ता नोऽवृकं छर्दिः.. (४)
अधिक धन वाले एवं शत्रुनाशक विश्वेदेव मनु की वृद्धि करने वाले हों. हे सर्वज्ञ देवो!
दूसरों द्वारा अबाधित रक्षासाधनों द्वारा हमें चोर के भय से रहित घर दो. (४)
आ नो अद्य समनसो गन्तो विश्वे सजोषसः.
ऋचा गिरा मरुतो देव्यदिते सदने पस्त्ये महि.. (५)
हे विश्वेदेव! स्तोत्रों के प्रति समान विचार वाले एवं संगत होकर स्तुतिवचन एवं ऋचाएं
सुनने की अभिलाषा से आज हमारे पास आओ. हे मरुतो एवं महान् अदिति! हमारे यज्ञगृह
में आओ. (५)
अभि प्रिया मरुतो या वो अश्व्या हव्या मित्र प्रयाथन.
आ बर्हिरिन्द्रो वरुणस्तुरा नर आदित्यासः सदन्तु नः.. (६)
हे मरुद्गण! अपने प्यारे घोड़ों को हमारे यज्ञ में भेजो. हे मित्र! हव्य पाने के लिए हमारे

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यज्ञ में आओ. इंद्र, वरुण तथा युद्ध में शत्रु का शीघ्र वध करने वाले व नेता आदित्य हमारे
द्वारा बिछाए हुए कुशों पर बैठें. (६)
वयं वो वृक्तबर्हिषो हितप्रयस आनुषक्.
सुतसोमासो वरुण हवामहे मनुष्वदिद्धाग्नयः.. (७)
हे वरुण! हम लोग कुश बिछाकर, सुच में हव्य भरने के बाद अग्नि में डालकर, सोमरस
निचोड़ कर एवं अग्नि को प्रज्वलित करके तुम्हें बुलाते हैं. (७)
आ प्र यात मरुता विष्णो अश्विना पूषन्माकीनया धिया.
इन्द्र आ यातु प्रथमः सनिष्युभिर्वृषा यो वृत्रहा गृणे.. (८)
हे मरुद्गण, विष्णु, अश्विनीकुमारो एवं पूषा! मेरी स्तुति सुनने के साथ ही यज्ञ में
आओ. देवों में ज्येष्ठ इंद्र भी आवें. स्तोता कामपूरक इंद्र की स्तुति वृत्रहंता के रूप में करते हैं.
(८)
वि नो देवासो अद्रुहोऽच्छिद्रं शर्म यच्छत.
न यद्द्ूराद्वसवो नू चिदन्तितो वरूथमादधर्षति.. (९)
हे द्रोहहीन देवो! हमें बाधारहित घर दो. हे निवासस्थान देने वाले देवो! समीप अथवा
दूर से आकर हमारे घर को नष्ट नहीं करना. (९)
अस्ति हि वः सजात्यं रिशादसो देवासो अस्त्याप्यम्.
प्र णः पूर्वस्मै सुविताय वोचत मक्षू सुम्नाय नव्यसे.. (१०)
हे शत्रुनाशक देवो! तुम में समान जाति का भाव एवं बंधुता है. प्राचीन अभ्युदय एवं
नवीन धन पाने का साधन शीघ्र एवं भली प्रकार हमें बताओ. (१०)
इदा हि वः उपस्तुतिमिदा वामस्य भक्तये.
उप वो विश्ववेदसो नमस्युराँ असृक्ष्यन्यामिव.. (११)
हे सर्वधनसंपन्न देवो! मैं अन्न पाने की अभिलाषा से इसी समय तुम्हारा उत्तम धन पाने
के लिए ऐसी स्तुति करता हूं, जिसे किसी ने पहले नहीं सुना. (११)
उदु ष्य वः सविता सुप्रणीतियोऽस्थादूर्ध्वो वरेण्यः.
नि द्विपादश्चतुष्पादो अर्थिनोऽविश्रन्पतयिष्णवः.. (१२)
हे शोभन स्तुति वाले मरुतो! तुम लोगों से ऊपर जाने वाले एवं वरणीय सविता जब
उदय होते हैं, तब मनुष्य, पशु, पक्षी एवं याचना करने वाले लोग अपने-अपने काम में लग
जाते हैं. (१२)
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देवन्देवं वोऽवसे देवन्देवमभिष्टये.
देवन्देवं हुवेम वाजसातये गृणन्तो देव्या धिया.. (१३)
हम दीप्तिशाली स्तुति द्वारा प्रशंसा करते हुए प्रत्येक देव को यज्ञकर्म की रक्षा, मनचाही
वस्तुओं की प्राप्ति एवं अन्न पाने के लिए बुलाते हैं. (१३)
देवासो हि ष्मा मनवे समन्यवो विश्वे साकं सरातयः.
ते नो अद्य ते अपरं तुचे तु नो भवन्तु वरिवोविदः.. (१४)
समान क्रोध वाले विश्वेदेव मनु को धन आदि देने के लिए एक साथ ही तत्पर हों. वे
आज एवं अन्य दिनों में मेरे तथा मेरे पुत्र के लिए धन देने वाले हों. (१४)
प्र वः शंसाम्यद्रुहः संस्थ उपस्तुतीनाम्.
न तं धूर्तिर्वरुण मित्र मर्त्यं यो वो धामभ्योऽविधत्.. (१५)
हे द्रोहरहित देवो! स्तुतियों के आधार पर यज्ञ में मैं तुम्हारी भली प्रकार स्तुति करता हूं.
हे वरुण एवं मित्र! तुम्हारे शरीर की वृद्धि के लिए जो हवि धारण करता है, उसे शत्रु बाधा
नहीं पहुंचाते. (१५)
प्र स क्षयं तिरते वि महीरिषो यो वो वराय दाशति.
प्र प्रजाभिर्जायते धर्मणस्पर्य्रिरिष्टः सर्व एधते.. (१६)
हे देवो! वह मनुष्य अपना घर बढ़ाता है, जो वरणीय धन पाने के लिए तुम्हें हव्य देता
है. वह अन्न वृद्धि करता है, प्रजाओं की वृद्धि करता है एवं तुम्हारे यज्ञकर्म के कारण
अबाधित होकर बढ़ता है. (१६)
ऋते स विन्दते युधः सुगेभिर्यात्यध्वनः.
अर्यमा मित्रो वरुणः सरातयो यं त्रायन्ते सजोषसः.. (१७)
देवों को हव्य देने वाला युद्ध के बिना भी धन पाता है, सुंदर गति वाले अश्वों द्वारा मार्ग
में चलता है तथा मित्र, वरुण एवं अर्यमा समान दान वाले बनकर तथा परस्पर मिलकर
उसकी रक्षा करते हैं. (१७)
अञ्जे चिदस्मै कृणुथा न्यञ्जनं दुर्गे चिदा सुसरणम्.
एषा चिदस्मादशनिः परो नु सासेधन्ती वि नश्यतु.. (१८)
हे देवो! अगम्य एवं दुर्गम मार्ग पर भी हमारा गमन तुम सरल बनाओ. यह वज्र किसी
की हिंसा न करता हुआ शीघ्र ही हमसे दूर नष्ट हो जाए. (१८)
यदद्य सूर्य उद्यति प्रियक्षत्रा ऋतं दध.
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यन्निमुचि प्रबुधि विश्ववेदसो यद्वा मध्यन्दिने दिवः.. (१९)
हे प्रसन्न करने वाले बल से युक्त देवो! आज सूर्य का उदय होने पर हमारे लिए
कल्याणकारक घर दो. हे सब धन के स्वामी देवो! सूर्यास्त के समय, प्रातःकाल अथवा
दोपहर के समय हमें घर दो. (१९)
यद्वाभिपित्वे असुरा ऋतं यते छर्दिर्र्यम वि दाशुषे.
वयं तद्वो वसवो विश्ववेदस उप स्थेयाम मध्य आ.. (२०)
हे बुद्धिसंपन्न, समस्त धन के स्वामी एवं निवासस्थान देने वाले देवो! इस यज्ञ में तुम्हारे
आने के उद्देश्य से हवि देने वाले एवं यज्ञ की ओर जाने वाले यजमान को तुम घर देते हो तो
हम तुम्हारे उसी कल्याणकारी घर में तुम्हारी पूजा करेंगे. (२०)
यदद्य सूर उदिते यन्मध्यन्दिन आतुचि.
वामं धत्थ मनवे विश्ववेदसो जुह्वानाय प्रचेतसे.. (२१)
हे समस्त धन के स्वामी देवो! आज सूर्योदय के समय, दोपहर को एवं शाम के समय
हवन करने वाले तथा उत्तम ज्ञानी मनु के लिए तुम सुंदर धन धारण करते हो. (२१)
वयं तद्वः सम्राज आ वृणीमहे पुत्रो न बहुपाय्यम्.
अश्याम तदादित्या जुह्वतो हविर्येन वस्योऽनशामहै.. (२२)
हे भली प्रकार सुशोभित देवो! तुम्हारे पुत्र-तुल्य हम बहुतों के भोगयोग्य उसी धन की
याचना करते हैं. हे आदित्यो! हम उस धन को प्राप्त करें एवं यज्ञ करते हुए उस धन के द्वारा
अधिक संपन्नता प्राप्त करें. (२२)
सूक्त—२८ देवता—विश्वेदेव
ये त्रिंशति त्रयस्परो देवासो बर्हिरासदन्. विदन्नह द्वितासनन्.. (१)
जो तेंतीस देवता कुशों पर बैठे थे, वे हमें समझें एवं दोनों प्रकार का धन दें. (१)
वरुणो मित्रो अर्यमा स्मद्रातिषाचो अग्नयः. पत्नीवन्तो वषट्कृताः.. (२)
मैंने वरुण, मित्र एवं यजमान को धन देने वाले अग्नियों को वषट् के द्वारा पत्नीसहित
बुलाया है. (२)
ते नो गोपा अपाच्यास्त उदक्त इत्था न्यक्. पुरस्तात्सर्वया विशा.. (३)
वे वरुणादि देव अपने सभी अनुचरों के साथ सामने से, पीछे से, ऊपर से और नीचे से
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हमारी रक्षा करें. (३)
यथा वशन्ति देवास्तथेदसत्तदेषां नकिरा मिनत्. अरावा च न मर्त्यः.. (४)
देव जैसा चाहते हैं, वैसा ही होता है, देवों की अभिलाषा को कोई नष्ट नहीं कर सकता.
देवों का चाहा हुआ अदाता मनुष्य भी नष्ट नहीं होता. (४)
सप्तानां सप्त ऋष्टयः सप्त द्युम्नान्येषाम्. सप्तो अधि श्रियो धिरे.. (५)
सात मरुतों के सात तरह के आयुध हैं. इनके सात आभरण हैं एवं ये सात प्रकार की
दीप्तियां धारण करते हैं. (५)
सूक्त—२९ देवता—विश्वेदेव
बभ्रुरेको विषुणः सूनरो युवाञ्ज्यङ्क्ते हिरण्ययम्.. (१)
पीले रंग वाले, सर्वत्र गतिशील, रात्रियों के नेता, युवक एवं अकेले सोमदेव सोने के
गहने प्रकाशित करते हैं. (१)
योनिमेक आ ससाद द्योतनोऽन्तर्देवेषु मेधिरः.. (२)
देवों के मध्य सर्वाधिक तेजस्वी, मेधावी, एवं अकेले अग्नि अपना स्थान पाते हैं. (२)
वाशीमेको बिभर्ति हस्त आयसींमन्तर्देवेषु निध्रुविः.. (३)
देवों के मध्य निश्चल स्थान में वर्तमान त्वष्टा देव हाथ में लोहे की कुल्हाड़ी धारण करते
हैं. (३)
वज्रमेको बिभर्ति हस्त आहितं तेन वृत्राणि जिघ्नते.. (४)
अकेले इंद्र हाथ में पकड़ा हुआ वज्र धारण करते हैं और उससे शत्रुओं का नाश करते
हैं. (४)
तिग्ममेको बिभर्ति हस्त आयुधं शुचिरुग्रो जलाषभेषजः.. (५)
पवित्र, उग्र एवं सुखकर ओषधियों वाले रुद्र एकाकी हैं. वे हाथ में तीखा आयुध धारण
करते हैं. (५)
पथ एकः पीपाय तस्करो यथाँ एष वेद निधीनाम्.. (६)
एकमात्र पूषा मार्ग की रक्षा करते हैं एवं चोर के समान समस्त धन को जानते हैं. (६)
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त्रीण्वेक उरुगायो वि चक्रमे यत्र देवासो मदन्ति.. (७)
बहुतों की स्तुति के पात्र विष्णु ने अकेले ही तीन चरणों से सभी भुवनों में गमन किया
था. इन लोगों में देव प्रसन्न होते हैं. (७)
विभिर्द्वा चरत एकया सह प्र प्रवासेव वसत:.. (८)
अश्वों द्वारा चलने वाले दो अश्विनीकुमार प्रवासी पुरुषों के समान एक नारी सूर्या के
साथ रहते हैं. (८)
सदो द्वा चक्राते उपमा दिवि सम्राजा सर्पिरासुती.. (९)
भली प्रकार सुशोभित घृतरूप हवि वाले एवं एक-दूसरे के उपमान मित्र एवं वरुण दो
देव द्युलोकरूपी को बनाते हैं. (९)
अर्चन्त एके महि साम मन्वत तेन सूर्यमरोचयन्.. (१०)
अत्रिवंशी ऋषि महान् साममंत्र बोलते हुए सूर्य को दीप्तिशाली बनाते हैं. (१०)
सूक्त—३० देवता—विश्वेदेव
नहि वो अस्त्यर्भको देवासो न कुमारक:. विश्वे सतोमहान्त इत्.. (१)
हे देवो! तुम में कोई शिशु या कुमार नहीं है. तुम सभी महान् हो. (१)
इति स्तुतासो असथा रिशादसो ये स्थ त्रयश्च त्रिंशच्च. मनोर्र्देवा यज्ञियास:.. (२)
हे शत्रुनाशक एवं मनु के यज्ञ के पात्र देवो! तुम तेंतीस हो, ऐसा कहकर तुम्हारी स्तुति
की जाती है. (२)
ते नस्त्राध्वं तेऽवत त उ नो अधि वोचत.
मा न: पथ: पित्र्यान्मानवादधि दूरं नैष्ट परावत:.. (३)
हे देवो! हमें राक्षसों से बचाओ, हमारी रक्षा करो एवं हमसे अच्छी तरह बोलो. हमारे
पिता मनु के दूरागत मार्ग से हमें भ्रष्ट मत करना. (३)
ये देवास इह स्थन विश्वे वैश्वानरा उत.
अस्मभ्यं शर्म सप्रथो गवेऽश्वाय यच्छत.. (४)
हे विश्वेदेव एवं अग्नि! तुम यहां स्थित होओ. तुम हमें सर्वत्र प्रसिद्ध सुख, गाय एवं घोड़ा
दो. (४)
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सूक्त—३१ देवता—यज्ञ

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सूक्त—३१ देवता—यज्ञ
यो यजाति यजात इत्सुनवच्च पचाति च. ब्रह्मेदिन्द्रस्य चाकनत्.. (१)
जो यजमान यज्ञ करता है, देवों के लिए हव्य देता है, सोमरस निचोड़ता है एवं पुरोडाश
पकाता है, वह इंद्र संबंधी मंत्रों को बार-बार बोलता है. (१)
पुरोळाशं यो अस्मै सोमं ररत आशिरम्. पादित्तं शक्रो अंहसः.. (२)
जो यजमान इंद्र को पुरोडाश एवं गाय के दूध से मिला सोमरस देता है, उसे इंद्र पाप से
बचाते हैं, यह निश्चित है. (२)
तस्य द्युमाँ असद्रथो देवजूतः स शूशुवत्. विश्वा वन्वन्नमित्रिया.. (३)
देवों की पूजा करने वाले यजमान के पास देवों द्वारा भेजा हुआ तेजस्वी रथ आता है.
यजमान उस रथ द्वारा शत्रुओं की समस्त बाधाओं को नष्ट करता हुआ समृद्ध होता है. (३)
अस्य प्रजावती गृहेऽसश्वन्ती दिवेदिवे. इळा धेनुमती दुहे.. (४)
इस यजमान के घर में संतानयुक्त, कहीं न जाने वाला एवं गायों सहित अन्न प्रतिदिन
प्राप्त किया जाता है. (४)
या दम्पती समनसा सुनुत आ च धावतः. देवासो नित्ययाशिरा.. (५)
हे देवो! जो पतिपत्नी समान विचार से सोमरस निचोड़ते हैं, उसे दशापवित्र द्वारा शुद्ध
करते हैं एवं तीसरे सवन में उस में गोदुग्ध मिलाते हैं. (५)
प्रति प्राशव्याँ इतः सम्यञ्चा बर्हिराशाते. न ता वाजेषु वायतः.. (६)
वे भोजन के योग्य अन्न देवों से प्राप्त करते हैं, मिलकर यज्ञ के कुशों पर बैठते हैं एवं
किसी के पास अन्न मांगने नहीं जाते. (६)
न देवानाम्पि ह्रुत: सुमतिं न जुगुक्षतः. श्रवो बृहद्विवासतः.. (७)
हे देवो! वे पतिपत्नी देवों के प्रति बुरी बातें नहीं करते एवं तुम्हारे प्रति शोभन बुद्धि को
समाप्त करना नहीं चाहते. वे अधिक अन्न द्वारा तुम्हारी सेवा करते हैं. (७)
पुत्रिणा ता कुमारिणा विश्वमायुर्व्यश्नुतः. उभा हिरण्यपेशसा.. (८)
वे शिशुओं एवं कुमारों वाले पतिपत्नी सोने के गहनों से युक्त होकर पूर्ण आयु प्राप्त
करते हैं. (८)
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आ शर्म पर्वतानां वृणीमहे नदीनाम्. आ विष्णोः सचोभुवः.. (१०)

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वीतिहोत्रा कृतद्वसू दशस्यन्तामृताय कम्. समूधो रोशमं हतो देवेषु कृणुतो दुवः.. (९)
यज्ञ को प्रेम करने वाले पतिपत्नी देवों को हव्य देते हुए उपयुक्त पात्रों को धनदान करते
हैं एवं संतानवृद्धि के लिए पुरुष एवं नारी जननेंद्रियों का संयोग करते हैं. वे देवों की सेवा
करते हैं. (९)
आ शर्म पर्वतानां वृणीमहे नदीनाम्. आ विष्णोः सचोभुवः.. (१०)
हम पर्वतों के सुख, नदियों के सुख एवं समस्त देवों के साथ विष्णु के सुख की कामना
करते हैं. (१०)
ऐतु पूषा रयिर्भर्गः स्वस्ति सर्वधातमः. उरुरध्वा स्वस्तये.. (११)
धन देने वाले, सबके सेवनीय व धनादि द्वारा सबका पोषण करने वाले पूषा रक्षासाधनों
के साथ आवें. पूषा के आने पर विस्तृत मार्ग हमारे लिए सुखकर हो. (११)
अरमतिरनर्वणो विश्वो देवस्य मनसा. आदित्यानामनेह इत्.. (१२)
शत्रुओं द्वारा पराजित न होने वाले पूषादेव के सब स्तोता पर्याप्त श्रद्धा से युक्त होते हैं.
आदित्यों का दान पापरहित ही होता है. (१२)
यथा नो मित्रो अर्यमा वरुणः सन्ति गोपाः. सुगा ऋतस्य पन्थाः.. (१३)
जिस प्रकार मित्र, अर्यमा एवं वरुण हमारे रक्षक हैं, उसी प्रकार हमारे यज्ञ मार्ग सुगम
हों. (१३)
अग्निं वः पूर्व्यं गिरा देवमीळे वसूनाम्. सपर्यन्तः पुरुप्रियं मित्रं न क्षेत्रसाधसम्.. (१४)
हे देवो! मैं तुम्हारे अग्रवर्ती अग्नि देव की स्तुति धनप्राप्ति के लिए करता हूं. तुम्हारे
सबसे श्रेष्ठ आशीष बहुतों के प्रिय मित्र के समान क्षेत्रसाधक होते हैं. (१४)
मक्षू देववतो रथः शूरो वा पृत्सु कासु चित्.
देवानां य इन्मनो यजमान इयक्षत्यभीदयज्वनो भुवत्.. (१५)
शूर का रथ जिस प्रकार सेनाओं में प्रवेश करता है, उसी प्रकार देवों के भक्त का रथ
शीघ्र दुर्गम मार्ग में जाता है. देवों की मनचाही पूजा करने वाला यजमान यज्ञ न करने वाले
को हरा देता है. (१५)
न यजमान रिष्यसि न सुन्वाय न देवयो.
देवानां य इन्मनो यजमान इयक्षत्यभीदयज्वनो भुवत्.. (१६)
हे यजमान, सोमरस, निचोड़ने वाले एवं देवकामी व्यक्ति! तुम नष्ट नहीं होगे. जो
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यजमान देवों की मनपसंद पूजा करना चाहता है, वह यज्ञ न करने वाले को हरा देता है.
(१६)
नकिष्टं कर्मणा नशन्न प्र योषन्न योषति.
देवानां य इन्मनो यजमान इयक्षत्यभीदयज्वनो भुवत्.. (१७)
जो यजमान देवों का मनचाहा यज्ञ करना चाहता है उसे अपने कर्म द्वारा कोई वश में
नहीं कर सकता, उसे कोई स्थान से हटा नहीं सकता तथा वह पुत्रादि द्वारा रहित नहीं होता.
देवों की मनचाही पूजा का अभिलाषी यज्ञ न करने वाले को हराता है. (१७)
असदत्र सुवीर्यमुत त्यदाश्वश्व्यम्.
देवानां य इन्मनो यजमान इयक्षत्यभीदयज्वनो भुवत्.. (१८)
देवों का मनचाहा यज्ञ करने का इच्छुक यजमान शोभन वीर्यवाला पुत्र पाता है एवं
अश्वयुक्त धन प्राप्त करता है. जो यजमान देवों की मनचाही पूजा करता है, वह यज्ञ न करने
वाले को हरा देता है. (१८)
सूक्त—३२ देवता—इंद्र
प्र कृतान्युजीषिणः कण्वा इन्द्रस्य गाथया. मदे सोमस्य वोचत.. (१)
हे कण्वगोत्रीय ऋषियो! जब इंद्र अपनी कहानी सुनकर प्रसन्न हो जावें, तब तुम ऋजीष
वाले सोम का वर्णन करो. (१)
यः सृबिन्दमनर्शानं पिप्रुं दासमहीशुवम्. वधीदुग्रो रिणन्नपः.. (२)
उग्र इंद्र ने जल को बहने के लिए प्रेरित करते हुए सुविन्द, अनर्शानि, पिप्रु, दास और
अहीशुव को मारा था. (२)
न्यर्बुदस्य विष्टपं वर्ष्माणं बृहतस्तिर. कृषे तदिन्द्र पौंस्यम्.. (३)
हे इंद्र! महान् मेघ के जलावरोधक स्थान में छेद करो एवं यह वीरतापूर्ण कार्य पूरा करो.
(३)
प्रति श्रुताय वो धृष्ण्तूर्णाशं न गिरेरधि. हुवे सुशिप्रमूतये.. (४)
हे स्तोताओ! मैं तुम्हारी प्रार्थनाएं सुनने के लिए शत्रुओं का नाश करने वाले एवं शोभन
हनु वाले इंद्र को उसी प्रकार बुलाता हूं, जिस प्रकार बादल से पानी की प्रार्थना की जाती है.
(४)
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स गोरश्वस्य वि व्रजं मन्दानः सोम्येभ्यः. पुरं न शूर दर्धसि.. (५)
हे शूर इंद्र! तुम प्रसन्न होकर सोमरस के योग्य स्तोताओं के लिए गोशाला एवं अश्वशाला
के द्वार उसी प्रकार खोल देते हो, जिस प्रकार शत्रु नागरिकों के द्वार. (५)
यदि मे रारणः सुत उक्थे वा दधसे चनः. आरादुप स्वधा गहि.. (६)
हे इंद्र! तुम मेरे द्वारा निचोड़े गए सोमरस अथवा निर्मित स्तोत्रों से प्रसन्न हो एवं मुझे
अन्न देते हो तो दूर देश से अन्न लेकर मेरे पास आओ. (६)
वयं घा ते अपि ष्मसि स्तोतार इन्द्र गिर्वणः. त्वं नो जिन्व सोमपाः.. (७)
हे स्तुति योग्य इंद्र! हम तुम्हारे स्तोता हैं. हे सोमरस पीने वाले इंद्र! तुम हमें प्रसन्न करते
हो. (७)
उत नः पितुमा भर संरराणो अविक्षितम्. मघवन्भूरि ते वसु.. (८)
हे धनयुक्त इंद्र! तुम प्रसन्न होकर हमें समाप्त न होने वाला अन्न दो. तुम्हारा धन बहुत
है. (८)
उत नो गोमतस्कृधि हिरण्यवतो अश्विनः. इळाभिः सं रभेमहि.. (९)
हे इंद्र! हमें गायों, घोड़ों और सोने वाला बनाओ. हम अन्न से युक्त हो. (९)
बृबदुक्थं हवामहे सृप्रकरस्नमूतये. साधु कृण्वन्तमवसे.. (१०)
हम महान् मंत्रों वाले, भुजाएं फैलाए हुए एवं लोक की रक्षा के लिए भली प्रकार प्रयत्न
करने वाले इंद्र को लोक की रक्षा के लिए बुलाते हैं. (१०)
यः संस्थे चिच्छतक्रतुरादीं कृणोति वृत्रहा. जरितृभ्यः पुरूवसुः.. (११)
इंद्र संग्राम में अनेक वीरतापूर्ण कार्य करने वाले शत्रुवधकर्त्ता, वृत्रहंता एवं स्तोताओं को
अधिक अन्न देने वाले हैं. (११)
स नः शक्रश्चिदा शकद्वानवाँ अन्तराभरः. इन्द्रो विश्वाभिरूतिभिः.. (१२)
वे शक्तिशाली इंद्र हमें भी शक्तिशाली बनावें. दानशील इंद्र अपने सभी रक्षासाधनों द्वारा
हमारे दोषों को दूर करें. (१२)
यो रायो३ वनिर्महान्त्सूपारः सुन्वतः सखा. तमिन्द्रमभि गायत.. (१३)
जो इंद्र, धन के पालक, महान्, शोभनव्रत, समाप्ति वाले एवं सोमरस निचोड़ने वाले के
मित्र हैं, उन्हीं इंद्र की स्तुति करो. (१३)

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आयन्तारं महि स्थिरं पृतनासु श्रवोजितम्. भूरीरीशानमोजसा.. (१४)
इंद्र यज्ञ में आने वाले, युद्धों में अत्यंत स्थिर, अन्न को जीतने वाले एवं शक्ति द्वारा बहुत
धन के स्वामी हैं. (१४)
नकिरस्य शचीनां नियन्ता सूनृतानाम्. नकिर्वक्ता न दादिति.. (१५)
इंद्र के शोभन कर्मों का नियंत्रण करने वाला कोई नहीं है. इंद्र दान नहीं करते, ऐसा कोई
नहीं कह सकता. (१५)
न नूनं ब्रह्मणामृणं प्राशूनामस्ति सुन्वताम्. न सोमो अप्रता पपे.. (१६)
सोमरस निचोड़ने और पीने वाले ब्राह्मणों पर देवऋण नहीं रहता. अधिक धन के बिना
कोई सोमरस नहीं पी सकता है. (१६)
पन्य इदुप गायत पन्य उक्थानि शंसत. ब्रह्मा कृणोत पन्य इत्.. (१७)
हे गायको! स्तुति योग्य इंद्र के लिए गाओ. हे स्तोताओ! इंद्र के लिए मंत्र बोलो एवं
स्तोत्र बनाओ. (१७)
पन्य आ दर्दिरच्छता सहस्रा वाज्यवृतः. इन्द्रो यो यज्वनो वृधः.. (१८)
स्तुति योग्य, बलवान्, यज्ञवर्धक एवं शत्रुओं द्वारा न घिरने वाले इंद्र ने सैकड़ों और
हजारों शत्रुओं को विदीर्ण किया है. (१८)
वि षू चर स्वधा अनु कृष्टीनामन्वाहुवः. इन्द्र पिब सुतानाम्.. (१९)
हे बुलाने योग्य इंद्र! प्रजाओं के हव्य के समीप जाओ एवं निचोड़ा हुआ सोमरस पिओ.
(१९)
पिब स्वधैनवानामृत यस्तुग्रये सचा. उतायमिन्द्र यस्तव.. (२०)
हे इंद्र! अपनी गाय के बदले खरीदे गए एवं जल की सहायता से तैयार किए गए इस
अपने सोमरस को पिओ. (२०)
अतीहि मन्युषाविणं सुषुवांसमुपारणे. इमं रातं सुतं पिब.. (२१)
हे इंद्र! क्रोध के साथ एवं बुरे स्थान में सोमरस निचोड़ने वाले को लांघकर चले जाओ.
हमारे द्वारा दिए हुए इस सोमरस को पिओ. (२१)
इहि तिस्रः परावत इहि पञ्च जनाँ अति. धेना इन्द्रावचाकशतू.. (२२)
हे इंद्र! तुमने हमारी स्तुतियों को समझा है. इसलिए आगे-पीछे तथा आसपास से एवं
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गंधर्वों, पितरों, देवों, असुरों और राक्षसों को लांघकर हमारे पास आओ. (२२)
सूर्यो रश्मिं यथा सृजा ऽऽत्वा यच्छन्तु मे गिरः. निम्नमापो न सध्र्यक्.. (२३)
हे इंद्र! जिस प्रकार सूर्य किरणें देते हैं, उसी प्रकार तुम मुझे धन दो. जैसे जल नीचे
स्थान में पहुंच जाता है उसी प्रकार मेरी स्तुतियां तुम्हारे पास पहुंचें. (२३)
अध्वर्यवा तु हि षिञ्च सोमं वीराय शिप्रिणे. भरा सुतस्य पीतये.. (२४)
हे अध्वर्युगण! शोभन जबड़ों वाले एवं वीर इंद्र के लिए सोमरस दो एवं उन्हें सोमरस
पीने के लिए बुलाओ. (२४)
य उदन्: फलिगं भिनन्य१क्सिन्धूँरवासृजत्. यो गोषु पक्वं धारयत्.. (२५)
इंद्र ने जल के लिए मेघ को विदीर्ण किया, जलधाराओं को नीचे गिराया एवं गायों में
दूध धारण किया. (२५)
अहन्वृत्रमृचीषम और्णवाभमहीशुवम्. हिमेनाविध्यदर्बुदम्.. (२६)
दीप्तिशाली इंद्र ने वृत्र, और्णनाभ एवं अहीशुव को मारा एवं तुषार जल से बादल का
भेदन किया. (२६)
प्र व उग्राय निष्ठुरेऽषाळहाय प्रसक्षिणे. देवत्तं ब्रह्म गायत.. (२७)
हे उद्गाताओ! तुम उग्र, शत्रुनाशक, शत्रुपराभवकारी और शत्रुओं का धन बलपूर्वक
हरण करने वाले इंद्र के लिए देवों की कृपा से स्तुतियां गाओ. (२७)
यो विश्वान्यभि व्रता सोमस्य मदे अन्धसः. इन्द्रो देवेषु चेतति.. (२८)
इंद्र पिए हुए सोमरस का नशा चढ़ने पर समस्त यज्ञकर्म देवों को बताते हैं. (२८)
इह त्या सधमाद्या हरी हिरयण्केश्या. वोळहामभि प्रयो हितम्.. (२९)
सुनहरे बालों वाले एवं हरि नामक घोड़े एक साथ इंद्र को इस यज्ञ में सोमरस रूपी हव्य
के सामने ले आवें. (२९)
अर्वाञ्चं त्वा पुरुष्टुत प्रियमधस्तुता हरी. सोमपेयाय वक्षतः.. (३०)
हे बहुतों द्वारा स्तुत इंद्र! प्रियमेध ऋषि द्वारा प्रशंसित हरि नामक घोड़े तुम्हें सोमरस
पीने के लिए हमारे सामने लावें. (३०)
सूक्त—३३ देवता—इंद्र
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वयं घ त्वा सुतावन्त आपो न वृक्तबर्हिषः.
पवित्रस्य प्रस्रवणेषु वृत्रहन् परि स्तोतार आसते.. (१)
हे इंद्र! सोमरस निचोड़ने वाले हम लोग इस प्रकार तुम्हारे पास आते हैं, जैसे जल नीचे
की ओर जाता है. पवित्र सोमरस निचुड़ जाने पर कुश बिछाने वाले स्तोता तुम्हारी सेवा करते
हैं. (१)
स्वरन्ति त्वा सुते नरो वसो निरेक उक्थिनः.
कदा सुतं तृषाण ओक आ गम इन्द्र स्वब्दीव वंसगः.. (२)
हे निवासदाता एवं नेता इंद्र! उक्थ बोलने वाले लोग सोमरस निचुड़ जाने पर तुम्हारी
स्तुति करते हैं. सोमरस पीने के लिए प्यारे इंद्र बैल के समान शब्द करते हुए यहां कब आएंगे.
(२)
कण्वेभिर्धृष्णवा धृषद्व्राजं दर्षि सहस्रिणम्.
पिशङ्गरूपं मघवन् विचर्षणे मक्षू गोमन्तममीमहे.. (३)
हे शत्रुओं को दबाने वाले इंद्र! कण्ववंशीय ऋषियों को हजारों की संख्या में अन्न दो. हे
धनयुक्त एवं विशेषदृष्टि वाले इंद्र! हम लोग शक्तिशाली, पीले रंग के एवं गायों वाले अन्न को
मांगते हैं. (३)
पाहि गायान्धसो मद इन्द्राय मेध्यातिथे.
यः संमिश्लो हर्योर्यः सुते सचा वज्री रथो हिरण्ययः.. (४)
हे मेधातिथि ऋषि! सोमरस पिओ एवं उसका नशा होने पर हरि नामक घोड़ों को रथ में
जोड़ने वाले सोमरस निचोड़ने में सहायक, वज्रधारी एवं सोने के रथ वाले इंद्र के स्तोत्र पढ़ो.
(४)
यः सुषव्यः सुदक्षिण इनो यः सुक्रतुर्गृणे.
य आकरः सहस्रा यः शतामघ इन्द्रो यः पूर्विदारितः.. (५)
जिनका दायां एवं बायां दोनों हाथ सुंदर हैं, जो स्वामी, शोभन कर्म करने वाले एवं
हजारों कर्म करने वाले हैं तथा जो सैकड़ों संपत्तियों वाले, शत्रुनगरियों को तोड़ने वाले एवं
यज्ञ में स्थिर हैं, उन्हीं इंद्र की स्तुति करो. (५)
यो धृषितो योऽवृतो यो अस्ति श्मश्रुषु श्रितः.
विभूतद्युम्नश्च्यवनः पुरुष्टुतः क्रत्वा गौरिव शाकिनः.. (६)
जो शत्रुओं को दबाने वाले शत्रुओं के घेरे से रहित, युद्धों में आश्रय देने वाले, अधिक
धन वाले, बहुतों द्वारा स्तुत एवं यज्ञकर्म में लगे यजमान के लिए दूध देने वाली गाय के समान
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अभिलाषापूरक हैं, उन्हीं इंद्र की स्तुति करो. (६)
क ईं वेद सुते सचा पिबन्तं कद्धयो दधे.
अयं यः पुरो विभिनत्त्योजसा मन्दानः शिप्रयन्धसः.. (७)
सुंदर जबड़े वाले, सोमरस पीकर मतवाले, शत्रुनगरियों को तोड़ने वाले व सोमरस के
निचोड़ जाने पर ऋत्विजों के साथ सोम पीने वाले इंद्र को कौन जानता है और कौन उनके
लिए अन्न देता है? (७)
दाना मृगो न वारणः पुरुत्रा चरथं दधे.
नकिष्ट्वा नि यमदा सुते गमो महाँश्चरस्योजसा.. (८)
जैसे शत्रुहाथियों की खोज करने वाला हाथी मदजल धारण करता है, उसी प्रकार इंद्र
बहुत से यज्ञों में जाने के लिए मद धारण करते हैं. हे इंद्र! तुम्हें कोई वश में नहीं कर सकता.
तुम निचोड़े हुए सोमरस की ओर आओ. हे महान् इंद्र! तुम अपने बल से सभी जगह घूमते
हो. (८)
य उग्रः सन्ननिष्टृतः स्थिरो रणाय संस्कृतः.
यदि स्तोतुर्मघवा शृणवद्धवं नेन्द्रो योषत्या गमत्.. (९)
जब उग्र, शत्रुओं के घेरे से रहित, स्थिर, युद्ध के लिए शस्त्रों से सुशोभित एवं धनवान्
इंद्र स्तोता की पुकार सुन लेते हैं तो अन्यत्र न जाकर वहीं जाते हैं. (९)
सत्यमित्था वृषेदसि वृषजूतिर्नोऽवृत्ः.
वृषा ह्युग्र शृण्विषे परावति वृषो अर्वावति श्रुतः.. (१०)
हे उग्र इंद्र! यह सत्य है कि तुम अभिलाषापूरक, अभिलाषापूरकों द्वारा आकृष्ट व शत्रु
से बिना घिरे हुए हो. हे उग्र इंद्र! तुम अभिलाषापूरक सुने जाते हो. तुम दूर एवं समीप के
स्थानों में अभिलाषापूरक के रूप में प्रसिद्ध हो. (१०)
वृषणस्ते अभीशवो वृषा कशा हिरण्ययी.
वृषा रथो मघवन्वृषणा हरी वृषा त्वं शतक्रतो.. (११)
हे धनस्वामी इंद्र! तुम्हारे घोड़ों की लगामें अभिलाषापूरक हैं. तुम्हारा सोने का हंटर
अभिलाषापूरक है. हे शतक्रतु! तुम्हारा रथ, तुम्हारे घोड़े एवं तुम स्वयं अभिलाषापूरक हो.
(११)
वृषा सोता सुनोतु ते वृषन्नृजीपिन्ना भर.
वृषा दधन्वे वृषणं नदीष्वा तुभ्यं स्थातर्हरीणाम्.. (१२)
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हे अभिलाषापूरक इंद्र! तुम्हारे लिए सोमरस निचोड़ने वाला अभिलाषापूरक होकर
सोमरस निचोड़े. हे सरल गति वाले इंद्र! हमें धन दो. हे हरि नामक अश्वों के सामने स्थित होने
वाले एवं अभिलाषापूरक इंद्र! जल में सोम निचोड़ने वाले ने उसे तुम्हारे लिए धारण किया है.
(१२)
एन्द्र याहि पीतये मधु शविष्ठ सोम्यम्.
नायमच्छा मधवा शृणवद् गिरो ब्रह्मोक्था च सुक्रतुः.. (१३)
हे अतिशय बलवान् इंद्र! मधुर सोमरस पीने के लिए यहां आओ. धनवान् एवं शोभन
यज्ञकर्म वाले इंद्र बिना आए हुए स्तुतियां स्तोत्र एवं मंत्र नहीं सुनते. (१३)
वहन्तु त्वा रथेष्ठामा हरयो रथयुजः.
तिरश्चिदर्यं सवनानि वृत्रहन्नन्येषां या शतक्रतो.. (१४)
हे वृत्रहंता एवं सैकड़ों बुद्धियों वाले इंद्र! रथ में जुते हुए घोड़े अन्य लोगों के यज्ञों का
तिरस्कार करके तुझ रथ में स्थिर स्वामी को हमारे यज्ञ में लावें. (१४)
अस्माकमद्यान्तं स्तोमं धिष्व महामह.
अस्माकं ते सवना सन्तु शन्तमा मदाय द्युक्ष सोमपाः.. (१५)
हे परमपूज्य इंद्र! आज अत्यंत समीपवर्ती हमारे स्तोम नामक यज्ञ को धारण करो. हे
दीप्तिशाली एवं सोमरस पीने वाले इंद्र! तुम्हारे मद के लिए होने वाले हमारे यज्ञ
कल्याणकारक हों. (१५)
नहि षस्तव नो मम शास्त्रे अन्यस्य रण्यति. यो अस्मान्वीर आनयत्.. (१६)
जो शूर इंद्र हमारा नेतृत्व करते हैं. वे मेरे, तुम्हारे अथवा किसी अन्य के शासन में प्रसन्न
नहीं होते. (१६)
इन्द्रश्चिद्घा तदब्रवीत्स्त्रिया अशास्यं मनः. उतो अह क्रतुं रघुम्.. (१७)
इंद्र ने ही कहा था—"स्त्री के मन पर शासन संभव नहीं है स्त्री की बुद्धि छोटी होती है."
(१७)
सप्ती चिद्घा मदच्युता मिथुना वहतो रथम्. एवेदधूर्वृष्ण उत्तरा.. (१८)
सोमरस की ओर जाने वाले इंद्र के दोनों घोड़े रथ को वहन करते हैं. इस प्रकार
कामवर्षक इंद्र का रथ सबसे श्रेष्ठ है. (१८)
अधः पश्यस्व मोपरि सन्तरां पादकौ हर.
मा ते कशप्लकौ दृशन्त्स्त्री हि ब्रह्मा बभूविथ.. (१९)
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इंद्र ने कहा—"हे प्रायोगि! तुम नीचे देखो, ऊपर मत देखो. तुम पैरों को आपस में
मिलाओ. तुम्हारे होंठों एवं कमर को कोई न देखे. तुम स्तोता होते हुए भी स्त्री हो.” (१९)
सूक्त—३४ देवता—इंद्र
एन्द्र याहि हरिभिरुप कण्वस्य सुष्टुतिम्.
दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (१)
हे इंद्र! तुम अपने हरि नामक घोड़ों के द्वारा कण्वगोत्रीय ऋषियों की सुंदर स्तुति के
सामने आओ. हे दीप्तहवि वाले इंद्र! तुम द्युलोक का शासन करते हो, इसलिए द्युलोक में
जाओ. (१)
आ त्वा ग्रावा वदन्निह सोमी घोषेण यच्छतु.
दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (२)
हे इंद्र! इस यज्ञ में सोमलता कुचलने के पत्थर तुम्हें सोम वाला कहते हुए तुम्हारे लिए
सोम दें. हे दीप्त हवि वाले इंद्र! तुम द्युलोक का शासन करते हो, इसलिए द्युलोक में जाओ.
(२)
अत्रा वि नेमिरेषामुरां न धूनुते वृकः.
दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (३)
इस यज्ञ में सोमलता कुचलने वाले पत्थर सोमलता को इस प्रकार कंपित करते हैं,
जिस प्रकार भेड़िया भेड़ को कंपाता है. हे दीप्त हवि वाले इंद्र! तुम द्युलोक का शासन करते
हो, इसलिए द्युलोक में जाओ. (३)
आ त्वा कण्वा इहावसे हवन्ते वाजसातये.
दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (४)
हे इंद्र! कण्वगोत्रीय ऋषि तुम्हें रक्षा एवं अन्न पाने के लिए इस यज्ञ में बुलाते हैं. हे दीप्त
हवि वाले इंद्र! तुम द्युलोक का शासन करते हो, इसलिए द्युलोक में जाओ. (४)
दधामि ते सुतानां वृष्णे न पूर्वपाय्यम्.
दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (५)
हे इंद्र! यज्ञ के प्रारंभ में जिस प्रकार अभिलाषापूरक वायु को सोमरस दिया जाता है,
उसी प्रकार तुम्हें निचोड़ा हुआ सोमरस मैं दूंगा. हे दीप्त हवि वाले इंद्र! तुम द्युलोक का शासन
करते हो, इसलिए द्युलोक में जाओ. (५)
स्मत्पुरन्धिर्न आ गहि विश्वतोधीर्न ऊतये.
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दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (६)
हे स्वर्ग कुटुंबी इंद्र! तुम हमारे पास आओ. हे विश्वरक्षक इंद्र! हमारी रक्षा के लिए
आओ. हे दीप्त हवि वाले इंद्र! तुम द्युलोक का शासन करते हो इसलिए द्युलोक में जाओ.
(६)
आ नो याहि महेमते सहस्रोते शतामघ.
दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (७)
हे महाबुद्धिशाली, हजार रक्षासाधनों वाले तथा अधिक धनयुक्त इंद्र! तुम हमारे समीप
आओ. हे दीप्त हवि वाले इंद्र! तुम द्युलोक का शासन करते हो, इसलिए द्युलोक में जाओ.
(७)
आ त्वा होता मनुर्हितो देवत्रा वक्षदीड्यः.
दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (८)
हे इंद्र! देवताओं में स्तुति योग्य देवों को बुलाने वाला एवं मनुष्यों द्वारा गृह में स्थापित
अन्न तुम्हें अन्न वहन करे. हे दीप्त हवि वाले इंद्र! तुम द्युलोक का शासन करते हो, इसलिए
द्युलोक में जाओ. (८)
आ त्वा मदच्युता हरी श्येनं पक्षेव वक्षतः.
दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (९)
हे इंद्र! जिस प्रकार बाज अपने दोनों पंखों को ढोता है, उसी प्रकार मतवाले हरि नामक
घोड़े तुम्हें वहन करें. हे दीप्त हवि वाले इंद्र! तुम द्युलोक का शासन करते हो, इसलिए द्युलोक
में जाओ. (९)
आ याह्यर्य आ परि स्वाहा सोमस्य पीतये.
दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (१०)
हे स्वामी इंद्र! तुम चारों ओर से आओ. तुम्हारे पीने के लिए मैं स्वाहा बोलकर सोमरस
देता हूं. हे दीप्त हवि वाले इंद्र! तुम द्युलोक का शासन करते हो, इसलिए द्युलोक में जाओ.
(१०)
आ नो याह्युपश्रुत्युक्थेषु रणया इह.
दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (११)
हे इंद्र! उक्थ मंत्रों के पाठ के समय तुम इस यज्ञ के समीप आओ एवं हमें प्रसन्न करो.
(११)
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आ याहि पर्वतेभ्यः समुद्रस्याधि विष्टपः.

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सरूपैरा सु नो गहि संभृतैः सम्भृताश्वः.
दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (१२)
हे पुष्ट अश्वों वाले इंद्र! तुम अपने पुष्ट एवं समानरूप वाले घोड़ों के द्वारा आओ. हे दीप्त
हवि वाले इंद्र! तुम द्युलोक का शासन करते हो, इसलिए द्युलोक में जाओ. (१२)
आ याहि पर्वतेभ्यः समुद्रस्याधि विष्टपः.
दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (१३)
हे इंद्र! तुम पर्वत, अंतरिक्ष एवं स्वर्ग से आओ. हे दीप्त हवि वाले इंद्र! तुम द्युलोक का
शासन करते हो, इसलिए द्युलोक में जाओ. (१३)
आ नो गव्यान्यश्व्या सहस्रा शूर दर्दिहि.
दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (१४)
हे शूर इंद्र! तुम हमें हजार गाएं एवं घोड़े भली प्रकार दो. हे दीप्त हवि वाले इंद्र! तुम
द्युलोक का शासन करते हो, इसलिए द्युलोक में जाओ. (१४)
आ नः सहस्रशो भरायुतानि शतानि च.
दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (१५)
हे इंद्र! हमें हजार, दस हजार एवं सौ मनचाही वस्तुएं दो. हे दीप्त हवि वाले इंद्र! तुम
द्युलोक का शासन करते हो, इसलिए द्युलोक में जाओ. (१५)
आ यदिन्द्रश्च दद्द्हे सहस्रं वसुरोचिषः. ओजिष्ठमश्व्यं पशुम्.. (१६)
धन द्वारा दीप्त हम हजारों लोग और हमारे नेता इंद्र शक्तिशाली घोड़ों को ग्रहण करते
हैं. (१६)
य ऋञ्ज्रा वातरंहसोऽरुषासो रघुष्यदः. भ्राजन्ते सूर्या इव.. (१७)
वे सरल गति वाले, वायु के समान तीव्रगामी, तेजस्वी एवं थोड़े भीगे हुए घोड़े सूर्य के
समान शोभा पाते हैं. (१७)
पारावतस्य रातिषु द्रवच्चक्रेष्वाशुषु. तिष्ठं वनस्य मध्य आ.. (१८)
रथ के पहियों को चलाने वाले इन घोड़ों को पारावत ने जिस समय दिया था, उस समय
मैं वन में था. (१८)
सूक्त—३५ देवता—अश्विनीकुमार
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अग्निनेन्द्रेण वरुणेन विष्णुनादित्यै रुद्रैर्वसुभिः सचाभुवा.
सजोषसा उषसा सूर्येण च सोमं पिबतमश्विना.. (१)
हे अश्विनीकुमारो! तुम अग्नि, इंद्र, वरुण, विष्णु, आदित्यों, रुद्रों, वसुओं उषा तथा सूर्य
के साथ मिलकर सोमरस पिओ. (१)
विश्वाभिर्धीभिर्भुवनेन वाजिना दिवा पृथिव्याद्रिभिः सचाभुवा.
सजोषसा उषसा सूर्येण च सोमं पिबतमश्विना.. (२)
हे शक्तिशाली अश्विनीकुमारो! तुम समस्त बुद्धियों, सब प्राणियों, द्युलोक, पृथ्वी, पर्वतों,
उषा तथा सूर्य के साथ मिलकर सोमरस पिओ. (२)
विश्वैर्देवैस्त्रिभिरेकादशैरहाद्भिर्मरुद्भिर्भृगुभिः सचाभुवा.
सजोषसा उषसा सूर्येण च सोमं पिबतमश्विना.. (३)
हे अश्विनीकुमारो! तुम इस यज्ञ में हव्य भक्षण करने वाले तैंतीस देवों, मरुतों, भृगुओं,
उषा एवं सूर्य के साथ सोमरस पिओ. (३)
जुषेथां यज्ञं बोधतं हवस्य मे विश्वेह देवौ सवनाव गच्छतम्.
सजोषसा उषसा सूर्येण चेषं नो वोळहमश्विना.. (४)
हे अश्विनीकुमारो! तुम इस यज्ञ का सेवन करो एवं मेरी पुकार सुनो. तुम इस यज्ञ के
तीनों सवनों में आओ एवं उषा व सूर्य के साथ मिलकर अन्न स्वीकार करो. (४)
स्तोमं जुषेथां युवशेव कन्यानां विश्वेह देवौ सवनाव गच्छतम्.
सजोषसा उषसा सूर्येण चेषं नो वोळहमश्विना.. (५)
हे देव अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार युवक कन्याओं की पुकार पर ध्यान देते हैं, उसी
प्रकार तुम हमारे यज्ञ में स्तोत्रों को स्वीकार करो. तुम इस यज्ञ के तीनों सवनों में आओ एवं
उषा व सूर्य के साथ मिलकर हमारा अन्न स्वीकार करो. (५)
गिरो जुषेथामध्वरं जुषेथां विश्वेह देवौ सवनाव गच्छतम्.
सजोषसा उषसा सूर्येण चेषं नो वोळहमश्विना.. (६)
हे देव अश्विनीकुमारो! तुम हमारी स्तुति सुनो, यज्ञ को स्वीकार करो, इस यज्ञ के तीनों
सवनों में आओ एवं उषा व सूर्य के साथ मिलकर हमारा अन्न ग्रहण करो. (६)
हारिद्रवेव पतथो वनेदुप सोमं सुतं महिषेवाव गच्छथः.
सजोषसा उषसा सूर्येण च त्रिवर्तिर्यातमश्विना.. (७)
हे अश्विनीकुमारो! हारिद्रव पक्षी जिस प्रकार जल पर गिरते हैं, उसी प्रकार तुम सोमरस
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