ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextयज्ञ में आओ. इंद्र, वरुण तथा युद्ध में शत्रु का शीघ्र वध करने वाले व नेता आदित्य हमारे
द्वारा बिछाए हुए कुशों पर बैठें. (६)
वयं वो वृक्तबर्हिषो हितप्रयस आनुषक्.
सुतसोमासो वरुण हवामहे मनुष्वदिद्धाग्नयः.. (७)
हे वरुण! हम लोग कुश बिछाकर, सुच में हव्य भरने के बाद अग्नि में डालकर, सोमरस
निचोड़ कर एवं अग्नि को प्रज्वलित करके तुम्हें बुलाते हैं. (७)
आ प्र यात मरुता विष्णो अश्विना पूषन्माकीनया धिया.
इन्द्र आ यातु प्रथमः सनिष्युभिर्वृषा यो वृत्रहा गृणे.. (८)
हे मरुद्गण, विष्णु, अश्विनीकुमारो एवं पूषा! मेरी स्तुति सुनने के साथ ही यज्ञ में
आओ. देवों में ज्येष्ठ इंद्र भी आवें. स्तोता कामपूरक इंद्र की स्तुति वृत्रहंता के रूप में करते हैं.
(८)
वि नो देवासो अद्रुहोऽच्छिद्रं शर्म यच्छत.
न यद्द्ूराद्वसवो नू चिदन्तितो वरूथमादधर्षति.. (९)
हे द्रोहहीन देवो! हमें बाधारहित घर दो. हे निवासस्थान देने वाले देवो! समीप अथवा
दूर से आकर हमारे घर को नष्ट नहीं करना. (९)
अस्ति हि वः सजात्यं रिशादसो देवासो अस्त्याप्यम्.
प्र णः पूर्वस्मै सुविताय वोचत मक्षू सुम्नाय नव्यसे.. (१०)
हे शत्रुनाशक देवो! तुम में समान जाति का भाव एवं बंधुता है. प्राचीन अभ्युदय एवं
नवीन धन पाने का साधन शीघ्र एवं भली प्रकार हमें बताओ. (१०)
इदा हि वः उपस्तुतिमिदा वामस्य भक्तये.
उप वो विश्ववेदसो नमस्युराँ असृक्ष्यन्यामिव.. (११)
हे सर्वधनसंपन्न देवो! मैं अन्न पाने की अभिलाषा से इसी समय तुम्हारा उत्तम धन पाने
के लिए ऐसी स्तुति करता हूं, जिसे किसी ने पहले नहीं सुना. (११)
उदु ष्य वः सविता सुप्रणीतियोऽस्थादूर्ध्वो वरेण्यः.
नि द्विपादश्चतुष्पादो अर्थिनोऽविश्रन्पतयिष्णवः.. (१२)
हे शोभन स्तुति वाले मरुतो! तुम लोगों से ऊपर जाने वाले एवं वरणीय सविता जब
उदय होते हैं, तब मनुष्य, पशु, पक्षी एवं याचना करने वाले लोग अपने-अपने काम में लग
जाते हैं. (१२)
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