ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextइंद्र ने कहा—"हे प्रायोगि! तुम नीचे देखो, ऊपर मत देखो. तुम पैरों को आपस में
मिलाओ. तुम्हारे होंठों एवं कमर को कोई न देखे. तुम स्तोता होते हुए भी स्त्री हो.” (१९)
सूक्त—३४ देवता—इंद्र
एन्द्र याहि हरिभिरुप कण्वस्य सुष्टुतिम्.
दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (१)
हे इंद्र! तुम अपने हरि नामक घोड़ों के द्वारा कण्वगोत्रीय ऋषियों की सुंदर स्तुति के
सामने आओ. हे दीप्तहवि वाले इंद्र! तुम द्युलोक का शासन करते हो, इसलिए द्युलोक में
जाओ. (१)
आ त्वा ग्रावा वदन्निह सोमी घोषेण यच्छतु.
दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (२)
हे इंद्र! इस यज्ञ में सोमलता कुचलने के पत्थर तुम्हें सोम वाला कहते हुए तुम्हारे लिए
सोम दें. हे दीप्त हवि वाले इंद्र! तुम द्युलोक का शासन करते हो, इसलिए द्युलोक में जाओ.
(२)
अत्रा वि नेमिरेषामुरां न धूनुते वृकः.
दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (३)
इस यज्ञ में सोमलता कुचलने वाले पत्थर सोमलता को इस प्रकार कंपित करते हैं,
जिस प्रकार भेड़िया भेड़ को कंपाता है. हे दीप्त हवि वाले इंद्र! तुम द्युलोक का शासन करते
हो, इसलिए द्युलोक में जाओ. (३)
आ त्वा कण्वा इहावसे हवन्ते वाजसातये.
दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (४)
हे इंद्र! कण्वगोत्रीय ऋषि तुम्हें रक्षा एवं अन्न पाने के लिए इस यज्ञ में बुलाते हैं. हे दीप्त
हवि वाले इंद्र! तुम द्युलोक का शासन करते हो, इसलिए द्युलोक में जाओ. (४)
दधामि ते सुतानां वृष्णे न पूर्वपाय्यम्.
दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (५)
हे इंद्र! यज्ञ के प्रारंभ में जिस प्रकार अभिलाषापूरक वायु को सोमरस दिया जाता है,
उसी प्रकार तुम्हें निचोड़ा हुआ सोमरस मैं दूंगा. हे दीप्त हवि वाले इंद्र! तुम द्युलोक का शासन
करते हो, इसलिए द्युलोक में जाओ. (५)
स्मत्पुरन्धिर्न आ गहि विश्वतोधीर्न ऊतये.
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