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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1260 of 1855

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Page 1260

वीतिहोत्रा कृतद्वसू दशस्यन्तामृताय कम्. समूधो रोशमं हतो देवेषु कृणुतो दुवः.. (९)
यज्ञ को प्रेम करने वाले पतिपत्नी देवों को हव्य देते हुए उपयुक्त पात्रों को धनदान करते
हैं एवं संतानवृद्धि के लिए पुरुष एवं नारी जननेंद्रियों का संयोग करते हैं. वे देवों की सेवा
करते हैं. (९)
आ शर्म पर्वतानां वृणीमहे नदीनाम्. आ विष्णोः सचोभुवः.. (१०)
हम पर्वतों के सुख, नदियों के सुख एवं समस्त देवों के साथ विष्णु के सुख की कामना
करते हैं. (१०)
ऐतु पूषा रयिर्भर्गः स्वस्ति सर्वधातमः. उरुरध्वा स्वस्तये.. (११)
धन देने वाले, सबके सेवनीय व धनादि द्वारा सबका पोषण करने वाले पूषा रक्षासाधनों
के साथ आवें. पूषा के आने पर विस्तृत मार्ग हमारे लिए सुखकर हो. (११)
अरमतिरनर्वणो विश्वो देवस्य मनसा. आदित्यानामनेह इत्.. (१२)
शत्रुओं द्वारा पराजित न होने वाले पूषादेव के सब स्तोता पर्याप्त श्रद्धा से युक्त होते हैं.
आदित्यों का दान पापरहित ही होता है. (१२)
यथा नो मित्रो अर्यमा वरुणः सन्ति गोपाः. सुगा ऋतस्य पन्थाः.. (१३)
जिस प्रकार मित्र, अर्यमा एवं वरुण हमारे रक्षक हैं, उसी प्रकार हमारे यज्ञ मार्ग सुगम
हों. (१३)
अग्निं वः पूर्व्यं गिरा देवमीळे वसूनाम्. सपर्यन्तः पुरुप्रियं मित्रं न क्षेत्रसाधसम्.. (१४)
हे देवो! मैं तुम्हारे अग्रवर्ती अग्नि देव की स्तुति धनप्राप्ति के लिए करता हूं. तुम्हारे
सबसे श्रेष्ठ आशीष बहुतों के प्रिय मित्र के समान क्षेत्रसाधक होते हैं. (१४)
मक्षू देववतो रथः शूरो वा पृत्सु कासु चित्.
देवानां य इन्मनो यजमान इयक्षत्यभीदयज्वनो भुवत्.. (१५)
शूर का रथ जिस प्रकार सेनाओं में प्रवेश करता है, उसी प्रकार देवों के भक्त का रथ
शीघ्र दुर्गम मार्ग में जाता है. देवों की मनचाही पूजा करने वाला यजमान यज्ञ न करने वाले
को हरा देता है. (१५)
न यजमान रिष्यसि न सुन्वाय न देवयो.
देवानां य इन्मनो यजमान इयक्षत्यभीदयज्वनो भुवत्.. (१६)
हे यजमान, सोमरस, निचोड़ने वाले एवं देवकामी व्यक्ति! तुम नष्ट नहीं होगे. जो
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