ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextयजमान के घर में सुख से बैठे होओ. तुम हमारा यह स्तोत्र सुनो. (१७)
उत स्या श्वेतयावरी वाहिष्ठा वां नदीनाम्. सिन्धुर्हिरण्यवर्तनिः.. (१८)
नदियों में सबसे अधिक बहने वाली एवं सोने के मार्ग वाली श्वेतयावरी नामक नदी
स्तुति के साथ तुम्हारे समीप जाती है. (१८)
स्मदेतया सुकीर्त्याश्विना श्वेतया धिया. वहेथे शुभ्रयावाना.. (१९)
हे शोभन गमन वाले अश्विनीकुमारो! शोभन स्तुति वाली, श्वेत जल वाली एवं दोनों
किनारों पर बसे लोगों का पोषण करने वाली श्वेतयावरी नदी को प्रवाहित करो. (१९)
युक्ष्वा हि त्वं रथासहा युवस्व पोष्या वसो.
आन्नो वायो मधु पिबास्माकं सवना गहि.. (२०)
हे वायु! तुम रथ खींचने योग्य दोनों घोड़ों को रथ में जोड़ो. हे निवासस्थान देने वाले
वायु! उन पोषण-योग्य घोड़ों को संग्राम में मिलाओ. इसके बाद तुम मधु पिओ एवं तीनों
सवनों में आओ. (२०)
तव वायवृतस्पते त्वष्टुर्जामातरद्भुत. अवांस्या वृणीमहे.. (२१)
हे यज्ञपालक कर्त्ता, ब्रह्मा के जमाई एवं विचित्र कर्म करने वाले वायु! हम तुम्हारे पालन
को प्राप्त करते हैं. (२१)
त्वष्टुर्जामातरं वयमीशानं राय ईमहे. सुतावन्तो वायुं द्युम्ना जनासः.. (२२)
हम लोग ब्रह्मा के दामाद एवं सबके स्वामी वायु के प्रति सोमरस निचोड़कर धन मांगते
हैं. वायु द्वारा दिए धन से हम धनी होंगे. (२२)
वायो याहि शिवा दिवो वहस्वा सुस्वश्व्यम्. वहस्व महः पृथुपक्षसा रथे.. (२३)
हे वायु! स्वर्गलोक से कल्याणों को यहां लाओ एवं शोभन गति वाले रथों को चलाओ.
हे महान् वायु! मोटी बगलों वाले घोड़ों को अपने रथ में जोड़ो. (२३)
त्वां हि सुप्सरस्तमं नृषदनेषु हूमहे. ग्रावाणं नाश्वपृष्ठं मंहना.. (२४)
हे अतिशय सुंदर व महिमा से सबको व्याप्त करने वाले वायु! जिस प्रकार सोमरस
निचोड़ने के लिए पत्थर बुलाया जाता है, उसी प्रकार यज्ञों में हम तुम्हें बुलाते हैं. (२४)
स त्वं नो देव मनसा वायो मन्दानो अग्रियः. कृधि वाजाँ अपो धियः.. (२५)
हे देवों में प्रमुख वायु देव! तुम मन से प्रसन्न होकर हमें अन्न, जल एवं यज्ञकर्म प्रदान
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