पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
About this granth
Panchadashi (पञ्चदशी) is the much-loved Advaita Vedanta treatise of Vidyaranya, the fourteenth-century head of the Sringeri matha whom tradition also links with the founding of the Vijayanagara empire. Named for its fifteen chapters, it explains Vedanta through vivid everyday analogies and has long been a favourite of students and seekers.
The chapters fall into three sets of five. The five "discriminations" (vivekas) cover reality, the five elements, the five sheaths, duality and the great sayings of the Upanishads. The five "lamps" (dipas) are the Chitradipa, Triptidipa, Kutasthadipa, Dhyanadipa and Natakadipa. The five "blisses" (anandas) treat the bliss of yoga, of the self, of non-duality, of knowledge and of sense objects. Together they expound Brahman as being, consciousness and bliss.
This edition carries a Hindi translation and commentary by Pandit Ramavatar Vidyabhaskar. It was published by Pandit Krishnakumar Sharma of Ratangarh, Bijnor district, and printed at the Hindi Bhavan Press, Lahore, so it predates Partition. At about 726 pages, it is for serious readers of Vedanta.
चित्रदीपप्रकरणम् १७७
चित्रदीपप्रकरणम् १७७
चोरी करने को उकसाता है, मालिक को सावधान रहने की
प्रेरणा किया करता है। बहादुर से तोप के मुँह में सिर दे देने
को कहता है। भीरु को भाग जाने.की सम्मति देता है। यों सब
जीवों की कर्म की डोर को अन्दर बैठा ही बैठा हिलाता रहता है।
वहीं से सब पर शासन किया करता है।
बुद्धौ तिष्ठन्नान्तरोऽस्या धियानीक्ष्यश्च धीवपुः ।
धियमन्तर्यमयतीत्येवं वेदेन घोषितम् ॥१६४॥
वह अन्तर्यामी बुद्धि के अन्दर रहता है। बुद्धि उसको
देख नहीं सकती। बुद्धि ही उसका शरीर है। वह अन्दर रह
कर इस बुद्धि को नियम में रख रहा है। अन्तर्यामी का ऐसा
वर्णन यो विज्ञाने तिष्ठन् [ बृ० ३-७-२२ ] इत्यादि श्रुतियों ने
स्वयमेव किया है।
तन्तुः पटे स्थितो यद्वदुपादानतया तथा ।
सर्वोपादानरूपत्वात् सर्वत्रायमवस्थितः ॥१६५॥
जिस प्रकार तन्तु उपादानरूप से पट में स्थित रहता
है, इसी प्रकार सब का उपादान होने से यह [ अन्तर्यामी ]
सब जगह स्थित हो रहा है। यह बात यः सर्वेषु तिष्ठन् [ बृ०
३-७-१५ ] इत्यादि श्रुति में कही गयी है।
पटादप्यान्तरस्तन्तु स्तन्तोरप्यंशुगन्तरः ।
आन्तरत्वस्य विश्रान्ति र्यत्रासावानुमीयताम् ॥१६६॥
उपादान रूप से यद्यपि वह सर्वत्र विराज रहा है, परन्तु
उसका सर्वान्तर होना ही उसे उपलब्ध नहीं होने देता। यही
बात इस श्लोक में कही गयी है—देखो, पट से अन्दर तन्तु
होता है। तन्तु से भी आन्तर.अंशु होता है। इस आन्तरपने
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की जहां समाप्ति हो जाती है, वहीं जाकर इस [ अन्तर्यामी ]
को अनुमान से ढूँढ लेना चाहिये ।
द्वित्रान्तरत्वकक्षाणां दर्शनेऽप्ययमान्तरः ।
न वीक्ष्यते, ततो युक्तिश्रुतिभ्यामेव निर्णयः ॥१६७॥
आन्तर भाव की दो तीन कक्षायें लौकिक [बाह्य] पटादि
पदार्थों में दीख भी जायें, परन्तु यह अन्तर्यामी तो आन्तर
[अन्दर का] होने से दीखता नहीं है । इस कारण युक्ति और
श्रुति के सहारे से ही इसकी सत्ता का निर्णय करना पड़ता है ।
[ कोई भी अचेतन पदार्थ किसी चेतन अधिष्ठाता के बिना
प्रवृत्त नहीं हुआ करता, यह युक्ति अन्तर्यामी को सिद्ध कर
देती है । ]
पटरूपेण संस्थानात् पट स्तन्तो र्वपुर्यथा ।
सर्वरूपेण संस्थानात् सर्वमस्य वपुस्तथा ॥१६८॥
पट रूप में आ जाने पर वह पट, उस तन्तु का शरीर
माना जाता है । इसी प्रकार सर्व रूप से स्थित हो जाने के
कारण, यह सब जगत्, उस अन्तर्यामी का देह माना गया है
[ यही बात 'यस्य सर्वाणि भूतानि शरीरम्' [बृ०३-७-१५] इस
श्रुति में कही गयी है । ]
तन्तोः संकोचविस्तारचलनादौ पटस्तथा ।
अवश्यमेव भवति, न स्वातन्त्र्यं पटे मनाक् ॥१६९॥
तथान्तर्याम्ययं यत्र यया वासनया यथा ।
विक्रियेत तथावश्यं भवत्येव न संशयः ॥१७०॥
तन्तु को जब सकोड़ा जाय, फैलाया जाय, या चलाया
जाय, तो पट में भी अवश्य ही संकोच, विस्तार, या चलन
[चित्रदीपप्रकरणम् १७९]
[चित्रदीपप्रकरणम् १७९]
आ जाता है । पट में तो लेशमात्र भी स्वतन्त्रता नहीं है ।
ठीक इसी प्रकार उपादान रूप से पृथ्वी आदियों में रहनेवाला
यह अन्तर्यामी, जिस जिस वासना से, जैसे जैसे घटादि रूप
में विकृत हो जाता है, वह वह कार्य अवश्य ही बन जाते हैं।
इसमें कुछ भी संशय नहीं है । [यही बात यः सर्वाणि भूतान्यन्तरो
यमयति [ बृ० ३-७-१५ ] इत्यादि में कही गयी है ।
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥१७१॥
[ गीता में भी अन्तर्यामी के विषय में यों कहा है] हे
अर्जुन ! ईश्वरतत्व तो सब भूतों के हृदय धाम में घुसा बैठा
है । वह वहाँ बैठा बैठा ही अपनी माया के प्रताप से सब
यन्त्रारूढ भूतों को घुमाता रहता है ।
सर्वभूतानि विज्ञानमयास्ते हृदये स्थिताः ।
तदुपादानभूतेश स्तत्र विक्रियते खलु ॥१७२॥
गीता के इस श्लोक में जो 'सर्वभूतानि' शब्द है उसका
अभिप्राय 'विज्ञानमय' से ही है। वे सब विज्ञानमय हृदय-
कमल में ही रहते हैं । क्योंकि उनका उपादान कारण ईश्वर
वहाँ हृदय में ही तो विकार को प्राप्त हुआ करता है [ वह
अन्तर्यामी हृदय में ही विज्ञानमय का रूप धारण कर लेता है।]
देहादि पञ्जरं यन्त्रं तदारोहोभिमानिता ।
विहितप्रतिषिद्धेषु प्रवृत्ति र्भ्रमणं भवेत् ॥१७३॥
[ गीता के 'यन्त्रारूढ' का अभिप्राय यह है कि] देहादि
नाम का यह पींजरा ही 'यन्त्र' कहाता है । इस पींजरे में अभि-
मान कर बैठना [इसी को 'मैं' मान लेना] ही इस पर 'आरो-
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हण' करना [चढ़ना] कहा जाता है। उसके पश्चात् विहित
और प्रतिषिद्ध बातों में प्रवृत्त हो जाना ही 'भ्रमण' किंवा घूमना
कहाता है।
विज्ञानमयरूपेण तत्प्रवृत्तिस्वरूपतः ।
खशक्त्येशो विक्रियते मायया भ्रामणं हि तत् ॥१७४॥
अपनी ही शक्ति से प्रभावित होकर वह ईश्वरतत्व विज्ञान-
मय रूप होकर तथा उसकी प्रवृत्ति रूप बनकर विकृत हुआ
करता है। गीता के उपर्युक्त श्लोक में इसी को 'माया से जीवों
का भ्रामण, अर्थात् घुमाना कहा जाता है।
अन्तर्यमयतीत्युक्त्याऽयमेवार्थः श्रुतौ श्रुतः ।
पृथिव्यादिषु सर्वत्र न्यायोऽयं योज्यतां धिया ॥१७५॥
यही बात यः पृथिव्यां तिष्ठन् यः पृथिवीमन्तरो यमयति [बृ०
३-७-३] इस श्रुति में कही गयी है। अन्य सब पदार्थों में भी
यही न्याय अपनी बुद्धि से लगा लेना चाहिये।
जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्ति—
जानाम्यधर्मं न च मे निवृत्तिः ।
केनापि देवेन हृदि स्थितेन
यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि ॥१७६॥
मैं धर्म को खूब पहचानता हूँ, परन्तु धर्म म मेरी प्रवृत्ति
ही नहीं होती। मैं अधर्म को भी भले प्रकार जानता हूँ, परन्तु
मैं उससे बच भी नहीं रहा हूँ। असली बात तो यह है कि कोई
देवता मेरे हृदय में मेरा हृदयेश्वर बना बैठा है। वह जैसे जैसे
मुझे आज्ञा देता रहता है मैं वैसा वैसा करता रहता हूँ
चित्रदीपप्रकरणम् १८१
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यह सिद्ध होता है कि सम्पूर्ण प्रवृत्तियें उसी सर्वेश्वर के
अधीन हैं ।]
नार्थः पुरुषकारेणेत्येवं मा शंक्यतां यतः ।
ईशः पुरुषकारस्य रूपेणापि विवर्तते ॥१७७॥
'जब सभी प्रवृत्तियाँ ईश्वर के अधीन हैं तब फिर पुरुष के
प्रयत्न की आवश्यकता ही क्या रह जाती है' ऐसी शंका न
करनी चाहिये । क्योंकि वह ईश्वर ही तो पुरुषकार का रूप भी
धारण कर लेता है [पुरुष का प्रयत्न भी ईश्वर रूप ही है, यों
पुरुषार्थ करना भी सफल हो जाता है । ]
ईदृग्बोधेनेश्वरस्य प्रवृत्तिर्नैव वार्यताम् ।
तथापीशस्य बोधेन स्वात्मासङ्गत्वधीजनिः ॥१७८॥
जब किसी को ऐसा बोध हो जाय [कि ईश्वर ही पुरुष-
कारादि रूप में विवर्त हो जाता है] तब भी ईश्वर की अन्तर्यामी
रूप से प्रेरणा को वारण नहीं करना चाहिये [किंवा अन्तर्यामी
की प्रेरणा को व्यर्थ नहीं मान लेना चाहिये] क्योंकि उस रूप से
जब कोई ईश्वर तत्व को जान लेगा तब उसे अपने आत्मा की
असङ्गता का स्पष्ट ज्ञान उत्पन्न हो जायगा ।
तावता मुक्तिरित्याहुः श्रुतयः स्मृतयस्तथा ।
श्रुतिस्मृती ममैवाज्ञे इत्यपीश्वरभाषितम् ॥१७९॥
"आत्मा की असङ्गता का ज्ञान हो जाने से ही मुक्ति हो
जाती है" यह बात श्रुतियों और स्मृतियों ने कही है । ईश्वर
ने यह भी कहा है कि ये श्रुतियां और स्मृतियां मेरी ही
आज्ञायें हैं। ऐसी अवस्था में इन के कहने को टालना नहीं चाहिये ।
श्रुतिं स्मृतीममैवाज्ञे यस्ते उल्लंघ्य वर्तते । आज्ञोच्छेदी ममद्वेषी न मद्भक्तो
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न मप्रियः। अन्तः प्रविष्टः शास्ता जनानाम् हमारा हाकिम हमारे अन्दर
बैठा हुवा है। जब हम कोई बुरा काम करने लगते हैं तब अन्दर से
घृणा भय और संकोच आदि की आवाज़ आती हैं। जब हम कोई
शुभ कार्य करते हैं तब अन्दर से प्रेम निर्भयता और उत्साह आदि
की स्फूर्ति होती है। ये ही सब ईश्वर की आज्ञायें हैं ! जो लोग
मनुष्यसमाज में अधिक संस्कृत होते हैं उन्हें ये आज्ञायें बड़ी
स्पष्ट सुनाई पड़ा करती हैं। जो निरन्तर पापाचारी होते हैं उन्हें
ये आवाजें सुनाई पड़नी बन्द हो जाती हैं। जिन्हें ये आज्ञायें
स्पष्ट सुनाई पड़ती हैं उन्होंने ही उन आवाज़ों को साधारण लोगों
के उपकार के लिये, उनके अन्दर की मुर्दा आवाज़ को जगाने
के लिए और उसके अनुकूल उनका आचरण कराने के लिये,
पुस्तकों में लिख दिया है। ऐसे ये लेख ही 'श्रुति' और 'स्मृति' हैं।
यों 'श्रुति' और 'स्मृति' ईश्वर की आज्ञायें हैं। वेदों के अपौरुषेय
होने का कारण भी यही है कि ये आवाजें बनायी नहीं जाती
किन्तु ऐसी की ऐसी ही साधक लोगों को—सत्यान्वेषी लोगों
को सुनाई पड़ा करती हैं। सुनाई पड़ने के कारण ही उनको
'श्रुति' कहा है ।
आज्ञाया भीतिहेतुत्वं भीषास्मादिति हि श्रुतम् ।
सर्वेश्वरत्वमेतत् स्यादन्तर्यामित्वतः पृथक् ॥१८०॥
भीषास्माद्वातः पवते तै० २-८ इत्यादि श्रुतियों में आज्ञा के
द्वारा ईश्वर को भय का कारण बताया गया है। [आज्ञा के
कारण] उस ईश्वर में जो 'सर्वेश्वरता' आती है वह 'अन्तर्यामि-
पने' से पृथक् ही एक धर्म है।
'अन्तर्यामी' वह है जो हम सब को अन्दर से अपने बस
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में किये बैठा है। 'सर्वेश्वर' वह है जिसने इस बाह्य जगत् पर
आधिपत्य जमा रक्खा है। वायु को बहने का, अग्नि को जलने
का, सूर्य को चक्कर काटते रहने का, मृत्यु को मारने का आदेश
जो दिया करता है वही 'सर्वेश्वर' है। वही एक तत्व शरीरों के
अन्दर रहकर उनका नियमन करके 'अन्तर्यामी' कहा जाता
है। वही एक तत्व शरीरों से बाहर सब भूत भौतिक पदार्थों का
नियमन करके 'सर्वेश्वर' कहाने लग जाता है।
एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासन इति श्रुतिः ।
अन्तः प्रविष्टः शास्तायं जनानामिति च श्रुतिः ॥१८१॥
एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृते तिष्ठतः
(बृ. ३-८-९) इस श्रुति में ईश्वर को बाह्य नियामक किंवा
'सर्वेश्वर' कहा है। अन्तः प्रविष्टः शास्ता जनानाम् इस श्रुति में
ईश्वर को अन्दर का नियामक किंवा 'अन्तर्यामी' बताया
गया है।
जगद्योनिर्भवेदेष प्रभवाप्ययकृत्वतः ।
आविर्भावतिरोभावावुत्पत्तिप्रलयौ मतौ ॥१८२॥
उत्पत्ति और विनाश दोनों ही को करने वाला होने से,
यही जगत् का योनि है। यहां उत्पत्ति और प्रलय का अभिप्राय
आविर्भाव और तिरोभाव है [यों तो उत्पत्ति और विनाश किसी
वस्तु का होता ही नहीं, केवल इतना ही होता है कि कभी वह
वस्तु प्रकट हो जाती है और कभी तिरोभूत हो जाती है।]
आविर्भावयति स्वस्मिन् विलीनं सकलं जगत् ।
प्राणिकर्मवशादेष पटो यद्वत् प्रसारितः ॥१८३॥
जैसे लपेटा हुआ चित्रपट जब फैला दिया जाता है तब
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अपने में छिपे हुए चित्रों को प्रकट कर देता है [बनाता नहीं]
इसी प्रकार यह ईश्वर अपने में विलीन हुए सम्पूर्ण जगत् को
प्राणियों के कर्मों के अनुसार, आविर्भूत कर दिया करता है।
पुनस्तिरोभावयति स्वात्मन्येवाखिलं जगत् ।
प्राणिकर्मक्षयवशात् संकोचितपटो यथा ॥१८४॥
जिस प्रकार लपेटा हुआ कपड़ा, अपने चित्रों को छिपा लेता
है, इसी प्रकार जब प्राणियों के भोगदायी कर्म क्षीण होजाते हैं
तब फिर यही ईश्वर अपने आपे में ही इस सम्पूर्ण जगत् को
छिपा बैठता है।
रात्रिद्यसौ सुप्तिबोधा वुन्मीलननिमीलने ।
तूष्णींभावमनोराज्ये इव सृष्टिलयाविमौ ॥१८५॥
ये सृष्टि तथा प्रलय तो ठीक ऐसे ही हैं जैसे कि दिन और
रात, स्वप्न तथा जागरण, उन्मेष और निमेष, चुपचाप रहना
और मनोराज्य करना होता है। [ये काम जीव के हैं तथा सृष्टि
प्रलय आदि ईश्वर के काम हैं।]
आविर्भावतिरोभावशक्तिमत्वेन हेतुना ।
आरम्भपरिणामादिचोद्यानां नात्र संभवः ॥१८६॥
आविर्भाव और तिरोभाव दोनों ही शक्तियों वाला होने के
कारण, आरम्भवाद और परिणामवाद आदि की तो संभावना
ही नहीं है। अद्वितीय पदार्थ आरम्भक नहीं हो सकता तथा
निरवयव का परिणाम होना भी सम्भव नहीं है। केवल विवर्त-
वाद ही एक निष्कण्टक मार्ग है।
अचेतनानां हेतुः स्याज्जाड्यांश नेश्वरस्तथा ।
चिदाभासांशतस्त्वेष जीवानां कारणं भवेत् ॥१८७॥
चित्रदीपप्रकरणम् १८५
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वही ईश्वर अपने जाड्यांश से तो अचेतनों का उपादान
है, तथा वही अपने चिदाभासांश से जीवों का कारण हो
जाता है ।
तमःप्रधानः क्षेत्राणां चित्प्रधानश्चिदात्मनाम् ।
परः कारणतामेति भावनाज्ञानकर्मभिः ॥१८८॥
इति वार्तिककारेण जडचेतनहेतुता ।
परमात्मन एवोक्ता नेश्वरस्येति चेच्छृणु ॥१८९॥
भावना [संस्कार] ज्ञान तथा [पुण्यापुण्यरूपी] कर्मों
के निमित्त से, वह परमात्मा जब जब तमःप्रधान होता है तब
तब तो क्षेत्र अर्थात् शरीरादि का कारण हो जाता है तथा जब
जब चित्प्रधान होता है तब तब चिदात्माओं का कारण बन
जाता है । इस प्रकार वार्तिककार सुरेश्वराचार्य ने तो जड और
चेतन का हेतु परमात्मा को ही बताया है, ईश्वर को नहीं,
तो इस का उत्तर भी सुन लो ।
अन्योन्याध्यासमत्रापि जीवकूटस्थयोरिव ।
ईश्वरब्रह्मणोः सिद्धं कृत्वा ब्रूते सुरेश्वरः ॥१९०॥
त्वंपद् के अर्थ जीव और कूटस्थ में जैसे अन्योन्याध्यास
होता है इसी प्रकार तत्पद के अर्थ जो ईश्वर और ब्रह्म हैं
उनमें भी अन्योन्याध्यास की विवक्षा करके ही सुरेश्वराचार्य
ने परमात्मा को जड और चेतन का हेतु कह दिया है [नहीं
तो उनको जड और चेतन का कारण ईश्वर को ही कहना
चाहिये था ।]
सत्यं ज्ञानमनन्तं यद् ब्रह्म तस्मात् समुत्थिताः ।
खं वाय्वग्निजलोर्व्योषध्यन्नदेहा इति श्रुतिः ॥१९१॥
१२
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सुरेश्वर ने ही नहीं श्रुति ने भी तो कहा है कि सत्य ज्ञान
तथा अनन्त जो ब्रह्म है उससे आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथिवी,
ओषधि, अन्न, तथा देह उत्पन्न हो गये हैं [श्रुति ने भी सुरेश्वरा-
चार्य की तरह ही ईश्वर और ब्रह्म तत्व का अन्योन्याध्यास
मानकर ही यह बात कही है।]
आपातदृष्टितस्तत्र ब्रह्मणो भाति हेतुता ।
हेतोश्च सत्यता तस्मादन्योन्याध्यास इष्यते ॥१९२॥
इस श्रुति में बताया हुआ, सत्य आदि लक्षणोंवाला, निर्गुण
ब्रह्म, आपातदृष्टि से [अधिक गम्भीर विचार न करें तो] जगत्
का कारण प्रतीत होता है और यों जगत् को बनाने वाला जो
मायाधीन चिदाभास है, वही आपातदृष्टि से सत्य प्रतीत होता
है। ये दोनों ही बातें [प्रतीतियें] अन्योन्याध्यास के बिना कैसे
बनें ? इसी से इस श्रुति को देखकर अन्योन्याध्यास का होना
हमने माना है।
अन्योन्याध्यासरूपोसावन्नलिप्तपटो यथा ।
घट्टितेनैकतामेति तद्वद् भ्रान्त्यैकतां गतः ॥१९३॥
मांडी लगाया हुआ कपड़ा जैसे कूटने पीटने घोटने मांजने
से एक [गफ़] हो जाता है, इसी प्रकार अन्योन्याध्यासरूप यह
ईश्वर केवल भ्रान्ति के ही कारण एकभाव को प्राप्त हो गया है
[वैसे तो ब्रह्म और माया के अधीन चिदाभास पृथक् पृथक्
ही हैं]।
मेघाकाशमहाकाशौ विविच्येते न पामरैः ।
तद्वद् ब्रह्मेशयोरैक्यं पश्यन्त्यापातदर्शिनः ॥१९४॥
पामर [थोड़ी बुद्धिवाले] लोग जैसे मेघाकाश और महा-
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काश में विवेक नहीं किया करते, इसी प्रकार आपातदर्शी
[ अथवा स्थूल विचारक ] लोग ब्रह्म और ईश्वर को एक ही
समझ बैठते हैं। [ इन दोनों के भेद को वे नहीं जानते ] ।
उपक्रमादिभिर्लिङ्गै स्तात्पर्यस्य विचारणात् ।
असङ्गं ब्रह्म, मायावी सृजत्येष महेश्वरः ॥१९५॥
उपक्रमोपसंहारा वभ्यासोऽपूर्वता फलम् । अर्थवादोपपत्ती च लिङ्गं
तात्पर्यनिर्णये । इन उपक्रम आदि छः लिंगों से जब श्रुति के
तात्पर्य का विचार किया जाता है, तब यह ज्ञात होता है कि
ब्रह्म तो असंग ही है [ यह कुछ भी करता धरता नहीं है ] इस
जगत् का सर्जन तो यह मायावी महेश्वर ही किया करता है ।
सत्यं ज्ञानमनन्तं चेत्युपक्रम्योपसंहृतम् ।
यतो वाचो निवर्तन्त इत्यसङ्गत्वनिर्णयः ॥१९६॥
'सत्यं ज्ञान मनन्तं ब्रह्म' (तै. २-१) यों इस वाक्य से प्रारम्भ
करके 'यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह' (तै. २-४) यहाँ
तक के सन्दर्भ से ब्रह्म की असंगता का निर्णय किया गया है।
[ फिर उस असंग ब्रह्म से जगत् का सर्जन कैसे हो सकेगा ] ?
मायी सृजति विश्वं संनिरुद्धस्तत्र मायया ।
अन्य इत्यपरा ब्रूते श्रुतिस्तेनेश्वरः सृजेत् ॥१९७॥
अस्मान्मायी सृजते विश्वमेतत्तस्मिंश्चान्यो मायया संनिरुद्धः (श्वे.
४-९) इस दूसरी श्रुति ने तो स्पष्ट ही कहा है कि मायी तो
इस जगत् को बनाता है, परन्तु दूसरा बिचारा जीव, माया के
बस इस में क़ैद हो गया है। इस श्रुति से सिद्ध होता है कि
ईश्वर ही इस जगत् का स्रष्टा है ब्रह्म नहीं है [ तथा जीव इस
जगत् में बँध गया है ।]
१८८ पञ्चदशी
आनन्दमय ईशोऽयं बहु स्यामित्यवैक्षत ।
हिरण्यगर्भरूपोऽभूत् सुप्तिः स्वप्नो यथा भवेत् ॥१९८॥
[आनन्दमय ईश्वर ही जगत् का कारण है यह सिद्ध हो
चुका । उससे जगत् की उत्पत्ति कैसे होती है वह रीति अब
बतायी जाती है] गाढ निद्रा का ही जैसे [पिछली रात में]
स्वप्न हो जाता है, इसी प्रकार इस आनन्दमय ईश्वर ने पड़े पड़े
यह विचार किया कि 'अब मैं बहुरूप हो जाऊँ'। इस विचार के
करते ही बस वह हिरण्यगर्भरूप हो गया। मानो सुषुप्ति का
ही सपना बन गया ।
क्रमेण युगपद्वैषा सृष्टिर्ज्ञेया यथाश्रुति ।
द्विविधश्रुतिसद्भावाद् द्विविधस्वप्नदर्शनात् ॥१९९॥
श्रुति के कथनानुसार क्रम से अथवा एक साथ ही यह सृष्टि
उत्पन्न होगयी, यह जान लेना चाहिये। क्योंकि दोनों ही प्रकार
की श्रुतियें विद्यमान हैं, तथा दोनों ही प्रकार के स्वप्न भी देखे
जाते हैं। [तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः (तै. २-१) इत्यादि
श्रुति में क्रमोत्पन्न सृष्टि का वर्णन है । इदं सर्वमसृजत (बृह. १-
२-५) इत्यादियों में युगपत् सृष्टि का वर्णन आता है । श्रुत्यनु-
कूल होने से दोनों ही बातें माननीय हैं। लोक में भी दो तरह
के स्वप्न देखे जाते हैं—किसी स्वप्न में तो क्रम से पदार्थ उत्पन्न
होते हैं, तथा किसी में सब के सब पदार्थ एक साथ उत्पन्न हो
पड़ते हैं] ।
सूत्रात्मा सूक्ष्मदेहाख्यः सर्वजीवघनात्मकः ।
सर्वाहंमानधारित्वात् क्रियाज्ञानादिशक्तिमान् ॥२००॥
• चित्रदीपप्रकरणम् १८९
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में अनुस्यूत रहनेवाले उस] सूत्रात्मा [हिरण्यगर्भ] को सूक्ष्म
देह भी कहते हैं। सम्पूर्ण [व्यष्टि लिंग शरीरों] में अहंभाव
का अभिमान करने के कारण वह सूत्रात्मा [लिंग शरीररूपी
उपाधि वाले] सम्पूर्ण जीवों की समष्टि रूप है, उस सूत्रात्मा में
'इच्छा, ज्ञान, तथा क्रिया' ये तीन शक्तियें रहती हैं। [समष्टि
का स्वभाव हम व्यष्टियों में भी पाया जाता है। हमें पहले किसी
पदार्थ का ज्ञान होता है, फिर उसकी इच्छा होती है फिर उसके
लिये क्रिया या उद्योग किया जाता है। यों यह सारा संसार
ज्ञान, इच्छा और क्रिया के ही अनन्त भँवर में चक्कर काटता
रहता है। तत्त्वज्ञान हो जाने पर ज्ञान इच्छा और क्रिया का यह
चक्कर बन्द हो जाता है।
प्रत्यूषे वा प्रदोषे वा मग्नो मन्दे तमस्ययम् ।
लोको भाति यथा तद्वदस्पष्टं जगदीक्ष्यते ॥२०१॥
जैसे प्रातःकाल या सायंकाल के समय यह जगत् मन्द
अन्धकार में डूबा हुआ धुँधला धुँधला दीखा करता है, इसी प्रकार
इस हिरण्यगर्भावस्था में यह जगत् अस्पष्ट रूप से दीखा करता है।
[हिरण्यगर्भ की अवस्था हमारी मनोराज्य की अवस्था जैसी है]।
सर्वतो लाञ्छितो मष्या यथा स्याद् घट्टितः पटः ।
सूक्ष्माकारै स्तथेशस्य वपुः सर्वत्र लाञ्छितम् ॥२०२॥
जिस प्रकार कलफ़ किये हुए सम्पूर्ण कपड़े पर, [रंग भरने
के लिये] स्याही से आकार बना दिये जाते हैं, इसी प्रकार इस
[मायी हिरण्यगर्भ नाम के] महेश्वर का शरीर भी [अपंची-
कृत भूतों से बने हुए] लिंग शरीरों से सभी जगह लाञ्छित
हुआ रहता है।
१९० पञ्चदशी
सस्यं वा शाकजातं वा सर्वतोऽङ्कुरितं यथा ।
कोमलं तद्वदेवैष पेलवो जगदङ्कुरः ॥२०३॥
अथवा दूसरे दृष्टान्त से इसी बात को यों समझो कि—
जैसे अन्न के पेड़ या शाक के पौधे चारों ओर से बहुतायत से
अंकुर फूटते समय कोमल हो जाते हैं, इसी प्रकार यह [हिरण्य-
गर्भ नाम का ] जगदङ्कुर भी [ सृष्टिनिर्माण के लिये ] नरम हो
जाता है ।
आतपाभातलोको वा पटो वा वर्णपूरितः ।
सस्यं वा फलितं यद्वत् तथा स्पष्टवपुर्विराट् ॥२०४॥
पंचीकृत भूतों या उनके कार्यों की उपाधि वाले विराट् का
शरीर तो इतना विशद हो जाता है, मानो धूप से प्रकाशित होने
वाला जगत् ही हो, अथवा रंगभरा हुआ कोई कपड़ा ही हो,
अथवा किसी सस्य पर फलों के गुच्छे लटक आये हों ।
विश्वरूपाध्याय एष उक्तः सूक्तेऽपि पौरुषे ।
धात्रादिस्तम्बपर्यन्तानेतस्यावयवान् विदुः ॥२०५॥
विश्वरूपाध्याय के पुरुषसूक्त में जो वर्णन है वह इसी
'विराट्' का है । ब्रह्मा से लेकर स्तम्बपर्यन्त जगत् को इसी
वराट् का अवयव बताया जाता है ।
ईशसूत्रविराड्वेधोविष्णुरुद्रेन्द्रवह्नयः ।
विघ्नभैरवमैरालमरिकायक्षराक्षसाः ॥२०६॥
विप्रक्षत्रियविट्शूद्रा गवाश्वमृगपक्षिणः ।
अश्वत्थवटचूताद्या यवव्रीहितृणादयः ॥२०७॥
जलपाषाणमृत्काष्ठवास्यकुद्दालकादयः ।
ईश्वराः सर्व एवैते पूजिताः फलदायिनः ॥२०८॥
चित्रदीपप्रकरणम् १९१
चित्रदीपप्रकरणम् १९१
ईश [ अन्तर्यामी ] हिरण्यगर्भ, विराट्, ब्रह्मा, विष्णु, महेश,
इन्द्र, अग्नि, गणेश, मैराल, मरिका, यक्ष, राक्षस, ब्राह्मण, क्षत्रिय
वैश्य, शूद्र, गौ, घोड़ा, मृग, पक्षी, पीपल, बढ़, आम आदि वृक्ष
जौ, धान, तिनके आदि ओषधियां, जल, पाषाण मिट्टी, काठ,
यहां तक कि बिसोला और कुदाल तक ये सभी ईश्वर हैं। जब
कोई इनकी पूजा करता है तब ये [ अपनी अपनी शक्ति के
अनुसार ] उसको फल दे देते हैं ।
यथायथोपासते तं फलमीयुस्तथा तथा।
फलोत्कर्षापकर्षौ तु पूज्यपूजानुसारतः ॥२०९॥
उस ईश्वर की जैसे जैसे उपासना करते हैं, वैसे वैसे ही फल
मिल जाते हैं। [जब कि ये सभी ईश्वर हैं तब समान ही फल
मिलना चाहिये था। परन्तु] फल की जो न्यूनाधिकता होती है
वह तो पूज्यों और पूजाओं के अनुसार हो जाती है [ घट बढ़
जाती है। पूज्यों और पूजाओं के सात्विक राजस आदि होने
से भिन्न भिन्न फल मिल जाते हैं।]
मुक्तिस्तु ब्रह्मतत्वस्य ज्ञानादेव न चान्यथा।
स्वप्रबोधं विना नैव स्वस्वप्नो हीयते यथा ॥२१०॥
[ सांसारिक फलों की प्राप्ति इन छोटे मोटे ईश्वरों से हुआ
करो, परन्तु ] मुक्ति तो ब्रह्मतत्व के ज्ञान से ही होती है। इस
के अतिरिक्त मुक्ति का कोई भी अन्य मार्ग नहीं है। देखते नहीं
हो कि—अपने जागे बिना [ अपनी निद्रा ने जिस स्वप्न को बना
रखा है उस ] अपने सुपने का भंग नहीं होता है। [ इस
दृष्टान्त से यह बात समझ लेनी चाहिये कि आत्मतत्व को जाने
बिना, आत्मतत्व को न जानने से ही बना हुआ, यह अपना
संसार रूपी सुपना कदापि निवृत्त न हो सकेगा ] ।
१९२ पञ्चदशी
अद्वितीयब्रह्मतत्वे स्वप्नोऽयमखिलं जगत् ।
ईशजीवादिरूपेण चेतनाचेतनात्मकम् ॥२११॥
ईश्वर और जीव आदि के रूप से वर्तमान जो यह जडा-
त्मक और चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत् है यह सब उस अद्वितीय
ब्रह्मतत्व में एक [बड़ा] सुपना है [क्योंकि यह सब अद्वितीय
ब्रह्मतत्व को ही तो अन्यथा समझ लिया गया है ] ।
सुपना 'सुपना' है, यथार्थ ज्ञान नहीं है यह बात जागने
से पहले मालूम नहीं पड़ सकती, जागने पर ही यह मालूम
पड़ा करता है । इसी प्रकार 'यह जगत् एक सुपना है, ऐसा
ज्ञान ब्रह्मविद्या नाम के जागरण के हो जाने पर ही हो सकता
है, पहले नहीं ।
आनन्दमयविज्ञानमया वीश्वरजीवकौ ।
मायया कल्पितावेतौ ताभ्यां सर्वं प्रकल्पितम् ॥२१२॥
आनन्दमय और विज्ञानमय जिनको ईश्वर और जीव भी
कहते हैं, दोनों ही माया के कल्पित किये हुए हैं। [इस कारण ये
ईश्वर तथा जीव यद्यपि ब्रह्म से अभिन्न हैं तौ भी ये जगत् के
अन्दर की ही वस्तुएँ हैं, ये जगत् के बाहर की वस्तुएँ नहीं हैं]।
इन ईश्वर और जीव दोनों ने मिलकर पीछे से यह सब कल्पित
कर डाला है ।
विज्ञान के बाद आनन्द आता है । विज्ञान भिन्न भिन्न होते
हैं । आनन्द सब को एक जैसा ही आता है । शूकर को शूक्री
से जितना आनन्द आता है, राजा को रानी से भी उतना ही—
उस जैसा ही आनन्द आता है । यों आनन्द नाम का जो ईश्वर
तत्व है वह एक जैसा है—एक है । परन्तु आनन्द को प्रकट
करनेवाले—उसका दर्शन करने वाले, जो विज्ञानमय हैं, वे भिन्न
भिन्न हैं। यही तो ईश्वर और जीव का वेदान्तसम्मत भेद है।
ये दोनों ही माया के कल्पित हैं।
ईक्षणादिप्रवेशान्ता सृष्टिरीशेन कल्पिता।
जाग्रदादिविमोक्षान्तः संसारो जीवकल्पितः ॥२१३॥
[ईश्वर और जीव इन दोनों में से किसने कितना जगत्
बनाया है सो भी सुनो] ‘स ऐक्षत लोकान्नु सृजा’ (ऐ. १-१) से
लेकर ‘एतया द्वारा प्रापद्यत’ (ऐतरे. ३-१२) तक कही गयी ईक्षण
से लेकर प्रवेशपर्यन्त सृष्टि तो ईश्वर की बनाई हुई है। तस्य
त्रय आवसथा (ऐत. ३-१२) से लेकर ‘स एतमेव ब्रह्म ततमपश्यत्’
(ऐतरे. ३-१३) तक वर्णन किये हुए जाग्रत् से लेकर मोक्षपर्यन्त
संसार को जीव ने बना लिया है। इसका विशेष विस्तार तृप्ति-
दीप के चतुर्थ श्लोक में है।
अद्वितीयं ब्रह्मतत्त्व मसङ्गं तन्न जानते।
जीवेशयो र्मायिकयो वृथैव कलहं ययुः ॥२१४॥
इस संसार में जो एक अद्वितीय तथा असंग ब्रह्मतत्त्व है
उसको तो ये पहचानते ही नहीं हैं और फिर वृथा ही माया-
कल्पित जीव तथा मायाकल्पित ईश्वर के विषय में परस्पर
लड़े मरे जाते हैं। [इन किसी को भी श्रुतिसिद्ध परमार्थ तत्त्व
का परिज्ञान नहीं हैं। ये तो ईश्वर को अपने से भिन्न राजा की
तरह का एक शासक समझते हैं। विद्वान ज्ञानी नीतिनिपुण
पुरुष उसी ईश्वर के कहने से प्रशंसनीय व्यवहार करता है।
उसका ईश्वर उससे अच्छा व्यवहार कराता है। दूसरे प्रकार
के पुरुष दूसरी तरह का बर्ताव करते हैं। उनका ईश्वर उनसे
१९२ पञ्चदशी
अद्वितीयब्रह्मतत्वे स्वप्नोऽयमखिलं जगत् ।
ईशजीवादिरूपेण चेतनाचेतनात्मकम् ॥२११॥
ईश्वर और जीव आदि के रूप से वर्तमान जो यह जडा-
त्मक और चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत् है यह सब उस अद्वितीय
ब्रह्मतत्व में एक [बड़ा] सुपना है [क्योंकि यह सब अद्वितीय
ब्रह्मतत्व को ही तो अन्यथा समझ लिया गया है ] ।
सुपना 'सुपना' है, यथार्थ ज्ञान नहीं है यह बात जागने
से पहले मालूम नहीं पड़ सकती, जागने पर ही यह मालूम
पड़ा करता है । इसी प्रकार 'यह जगत् एक सुपना है, ऐसा
ज्ञान ब्रह्मविद्या नाम के जागरण के हो जाने पर ही हो सकता
है, पहले नहीं ।
आनन्दमयविज्ञानमया वीश्वरजीवकौ ।
मायया कल्पितावेतौ ताभ्यां सर्वं प्रकल्पितम् ॥२१२॥
आनन्दमय और विज्ञानमय जिनको ईश्वर और जीव भी
कहते हैं, दोनों ही माया के कल्पित किये हुए हैं। [इस कारण ये
ईश्वर तथा जीव यद्यपि ब्रह्म से अभिन्न हैं तौ भी ये जगत् के
अन्दर की ही वस्तुएँ हैं, ये जगत् के बाहर की वस्तुएँ नहीं हैं]।
इन ईश्वर और जीव दोनों ने मिलकर पीछे से यह सब कल्पित
कर डाला है ।
विज्ञान के बाद आनन्द आता है। विज्ञान भिन्न भिन्न होते
हैं । आनन्द सब को एक जैसा ही आता है । शूकर को शूक्री
से जितना आनन्द आता है, राजा को रानी से भी उतना ही-
उस जैसा ही आनन्द आता है। यों आनन्द नाम का जो ईश्वर
तत्व है वह एक जैसा है-एक है। परन्तु आनन्द को प्रकट
चित्रदीपप्रकरणम् १९३
चित्रदीपप्रकरणम् १९३
करनेवाले—उसका दर्शन करने वाले, जो विज्ञानमय हैं, वे भिन्न
भिन्न हैं। यही तो ईश्वर और जीव का वेदान्तसम्मत भेद है।
ये दोनों ही माया के कल्पित हैं।
ईक्षणादिप्रवेशान्ता सृष्टिरीशेन कल्पिता ।
जाग्रदादिविमोक्षान्तः संसारो जीवकल्पितः ॥२१३॥
[ ईश्वर और जीव इन दोनों में से किसने कितना जगत्
बनाया है सो भी सुनो] 'स ऐक्षत लोकान्नु सृजा' (ऐ.१-१) से
लेकर 'एतया द्वारा प्रापद्यत' (ऐतरे. ३-१२) तक कही गयी ईक्षण
से लेकर प्रवेशपर्यन्त सृष्टि तो ईश्वर की बनाई हुई है। तस्य
त्रय आवसथा (ऐत. ३-१२) से लेकर 'स एतमेव ब्रह्म ततमपश्यत्'
(ऐतरे. ३-१३) तक वर्णन किये हुए जाग्रत् से लेकर मोक्षपर्यन्त
संसार को जीव ने बना लिया है। इसका विशेष विस्तार तृप्ति-
दीप के चतुर्थ श्लोक में है।
अद्वितीयं ब्रह्मतत्त्व मसङ्गं तन्न जानते ।
जीवेशयो र्मायिकयो र्वृथैव कलहं ययुः ॥२१४॥
इस संसार में जो एक अद्वितीय तथा असंग ब्रह्मतत्त्व है
उसको तो ये पहचानते ही नहीं हैं और फिर वृथा ही माया-
कल्पित जीव तथा मायाकल्पित ईश्वर के विषय में परस्पर
लड़े मरे जाते हैं। [इन किसी को भी श्रुतिसिद्ध परमार्थ तत्व
का परिज्ञान नहीं हैं। ये तो ईश्वर को अपने से भिन्न राजा की
तरह का एक शासक समझते हैं। विद्वान ज्ञानी नीतिनिपुण
पुरुष उसी ईश्वर के कहने से प्रशंसनीय व्यवहार करता है।
उसका ईश्वर उससे अच्छा व्यवहार कराता है। दूसरे प्रकार
के पुरुष दूसरी तरह का बर्ताव करते हैं। उनका ईश्वर उनसे
१९४ पञ्चदशी
बुरा व्यवहार कराता है । यों ईश्वरतत्व प्राणियों का भागी बन
कर रहता है। वह उनसे भिन्न कोई तटस्थ शासक कदापि नहीं है ।
ज्ञात्वा सदा तत्वनिष्ठा ननु मोदामहे वयम् ।
अनुशोचाम एवान्यान्न भ्रान्ते र्विवदामहे ॥२१५॥
उस अद्वितीय ब्रह्मतत्व को जब से हम पहचान गये हैं,
तभी से तत्वनिष्ठ होकर हम तो बड़े ही प्रसन्न रहने लगे हैं ।
जिन मन्द भागियों को इस तत्व का ज्ञान नहीं हुआ है उन पर
तो हमें केवल थोड़ा सा शोक ही होता है । भ्रान्ति में फँसकर
हम उनके साथ विवाद करना पसन्द नहीं करते हैं ।
तृणार्चकादियोगान्ता ईश्वरे भ्रान्तिमाश्रिताः ।
लोकायतादिसांख्यान्ता जीवे विभ्रान्तिमाश्रिताः॥२१६॥
तृणपूजकों से लेकर योग पर्यन्त वादियों को 'ईश्वरतत्व'
के विषय में भ्रान्ति हो रही है । लोकायत से लेकर सांख्य
पर्यन्त वादियों को 'जीव' के विषय में बड़ा भ्रम हो रहा है ।
अद्वितीयब्रह्मतत्वं न जानन्ति यदा तदा ।
भ्रान्ता एवाखिलास्तेषां क्व मुक्तिः क्वेह वा सुखम् ॥२१७॥
जो अद्वितीय ब्रह्मतत्व को नहीं जानते हैं वे तो सभी
भ्रान्त हैं । उनको मर जाने पर न तो विदेहमुक्ति ही मिलती
है और न इस लोक में ही वे सुख पा सकते हैं ।
तत्वज्ञान न होने से इन्हें मुक्ति नहीं मिलेगी तथा वैराग्य-
सम्पन्न होने के कारण इस लोक के सुखों से भी ये लोग स्वयं
ही परहेज कर बैठेंगे । यों ये दोनों सुखों से वंचित होजायंगे ।
उत्तमाधमभावश्चेत् तेषां स्यादस्तु तेन किम् ।
स्वप्नस्वराज्यभिक्षाभ्यां न बुद्धः स्पृश्यते खलु ॥२१८॥