पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 197, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें[चित्रदीपप्रकरणम् १७९]
आ जाता है । पट में तो लेशमात्र भी स्वतन्त्रता नहीं है ।
ठीक इसी प्रकार उपादान रूप से पृथ्वी आदियों में रहनेवाला
यह अन्तर्यामी, जिस जिस वासना से, जैसे जैसे घटादि रूप
में विकृत हो जाता है, वह वह कार्य अवश्य ही बन जाते हैं।
इसमें कुछ भी संशय नहीं है । [यही बात यः सर्वाणि भूतान्यन्तरो
यमयति [ बृ० ३-७-१५ ] इत्यादि में कही गयी है ।
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥१७१॥
[ गीता में भी अन्तर्यामी के विषय में यों कहा है] हे
अर्जुन ! ईश्वरतत्व तो सब भूतों के हृदय धाम में घुसा बैठा
है । वह वहाँ बैठा बैठा ही अपनी माया के प्रताप से सब
यन्त्रारूढ भूतों को घुमाता रहता है ।
सर्वभूतानि विज्ञानमयास्ते हृदये स्थिताः ।
तदुपादानभूतेश स्तत्र विक्रियते खलु ॥१७२॥
गीता के इस श्लोक में जो 'सर्वभूतानि' शब्द है उसका
अभिप्राय 'विज्ञानमय' से ही है। वे सब विज्ञानमय हृदय-
कमल में ही रहते हैं । क्योंकि उनका उपादान कारण ईश्वर
वहाँ हृदय में ही तो विकार को प्राप्त हुआ करता है [ वह
अन्तर्यामी हृदय में ही विज्ञानमय का रूप धारण कर लेता है।]
देहादि पञ्जरं यन्त्रं तदारोहोभिमानिता ।
विहितप्रतिषिद्धेषु प्रवृत्ति र्भ्रमणं भवेत् ॥१७३॥
[ गीता के 'यन्त्रारूढ' का अभिप्राय यह है कि] देहादि
नाम का यह पींजरा ही 'यन्त्र' कहाता है । इस पींजरे में अभि-
मान कर बैठना [इसी को 'मैं' मान लेना] ही इस पर 'आरो-