सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 214, कुल 726 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 214

१९४ पञ्चदशी
बुरा व्यवहार कराता है । यों ईश्वरतत्व प्राणियों का भागी बन
कर रहता है। वह उनसे भिन्न कोई तटस्थ शासक कदापि नहीं है ।
ज्ञात्वा सदा तत्वनिष्ठा ननु मोदामहे वयम् ।
अनुशोचाम एवान्यान्न भ्रान्ते र्विवदामहे ॥२१५॥
उस अद्वितीय ब्रह्मतत्व को जब से हम पहचान गये हैं,
तभी से तत्वनिष्ठ होकर हम तो बड़े ही प्रसन्न रहने लगे हैं ।
जिन मन्द भागियों को इस तत्व का ज्ञान नहीं हुआ है उन पर
तो हमें केवल थोड़ा सा शोक ही होता है । भ्रान्ति में फँसकर
हम उनके साथ विवाद करना पसन्द नहीं करते हैं ।
तृणार्चकादियोगान्ता ईश्वरे भ्रान्तिमाश्रिताः ।
लोकायतादिसांख्यान्ता जीवे विभ्रान्तिमाश्रिताः॥२१६॥
तृणपूजकों से लेकर योग पर्यन्त वादियों को 'ईश्वरतत्व'
के विषय में भ्रान्ति हो रही है । लोकायत से लेकर सांख्य
पर्यन्त वादियों को 'जीव' के विषय में बड़ा भ्रम हो रहा है ।
अद्वितीयब्रह्मतत्वं न जानन्ति यदा तदा ।
भ्रान्ता एवाखिलास्तेषां क्व मुक्तिः क्वेह वा सुखम् ॥२१७॥
जो अद्वितीय ब्रह्मतत्व को नहीं जानते हैं वे तो सभी
भ्रान्त हैं । उनको मर जाने पर न तो विदेहमुक्ति ही मिलती
है और न इस लोक में ही वे सुख पा सकते हैं ।
तत्वज्ञान न होने से इन्हें मुक्ति नहीं मिलेगी तथा वैराग्य-
सम्पन्न होने के कारण इस लोक के सुखों से भी ये लोग स्वयं
ही परहेज कर बैठेंगे । यों ये दोनों सुखों से वंचित होजायंगे ।
उत्तमाधमभावश्चेत् तेषां स्यादस्तु तेन किम् ।
स्वप्नस्वराज्यभिक्षाभ्यां न बुद्धः स्पृश्यते खलु ॥२१८॥