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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

अष्टम लम्बक १९१

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अष्टम लम्बक १९१
अतः मैं विदेशी बनकर आया और आपसे 'भोजन-निर्माण में दक्ष हूँ' ऐसा कह कर आपके
रसोईघर में प्रविष्ट हुआ ॥४४॥
हे राजन्, आज ही भोजन में विष देते हुए इस बुद्धिमान् ने मुझे पकड़ लिया। इसके आगे
जो कुछ हुआ आप जानते हैं ॥४५॥
ऐसा सुनकर राजा ने उस पाचक को दंडित करके प्राण देनेवाले उस गुणधर्मा को एक
हजार ग्राम पुरस्कार में दिये ॥४६॥
किसी दूसरे दिन रानी के बार-बार आग्रह किये जाने पर राजा के प्रयत्न से गुणधर्मा द्वारा
रानी को वीणा सिखाने का कार्य प्रारम्भ कर दिया गया ॥४७॥
वीणा-वादन सिखाते हुए गुणधर्मा के सामने रानी अधोक्षवती सदा कायचेष्टाएँ किया
करती थी ॥४८॥
एक बार एकान्त में नाखूनों को गड़ाती हुई कामातुरा रानी गुणधर्मा द्वारा रोके जाने
पर बोली- 'हे सुन्दर, वीणा बजाने के बहाने से मैंने तुम्हें पाया है। तुम्हारे प्रति मेरा घनिष्ठ प्रेम
हो गया है। अतः मेरा उपभोग करो' ॥४९-५०॥
इस प्रकार कहती हुई रानी से गुणधर्मा ने कहा- 'ऐसा न कहो। तुम मेरे स्वामी की
स्त्री हो, मुझ जैसा व्यक्ति इस प्रकार का स्वामिद्रोह नहीं कर सकता।' ऐसा कहते हुए गुणधर्मा
से रानी ने फिर कहा- 'हे नीरस तुम्हारे इस सुन्दर रूप और कला-कौशल का क्या महत्त्व जब
तुम मुझ जैसी कामातुरा प्रेयसी की उपेक्षा कर रहे हो' ॥५१-५३॥
यह सुनकर गुणधर्मा हँसी करता हुआ उससे बोला- 'ठीक कहा उस चातुर्य का क्या फल
जो परदारा के अपहरण से निन्दित और मलिन हो और जो इस लोक तथा परलोक में भी नरक में
पतन का कारण बने' ॥५४-५५॥
गुणधर्मा के ऐसा कहने पर वह रानी क्रोध के साथ उससे बोली- 'यदि तुम मेरी बात न
मानोगे तो अवश्य ही मेरी मृत्यु हो जायगी किन्तु अपमानिता मैं पहले तुम्हें मारकर मरूँगी।
मेरी बात न मानने पर तुम अपना भी मरण निश्चित समझो। गुणधर्मा ने उत्तर में कहा- 'भले
ही मृत्यु हो जाय। धर्म के बन्धन से बँधकर एक क्षण का भी जीवन उत्तम है, किन्तु अधर्म के साथ
प्रलयकाल तक का भी जीवन अच्छा नहीं ॥५६-५८॥
५

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श्लाघ्यश्चाकृतपापस्य मम मृत्युरगर्हितः।
न पुनः कृतपापस्य गर्हितं राजशासनम्॥५९॥
एतच्छ्रुत्वापि सा राज्ञी पुनरेवमुवाच तम्।
आत्मनो मम च द्रोहं मा कृथाः शृणु वच्मि ते॥६०॥
नातिक्रामति राजायामशक्यमपि मद्वचः।
तदस्य कृत्वा विज्ञप्तिं विषयान्दापयामि ते॥६१॥
कारयामि च सामन्तान्सर्वांस्तवनुयायिनः।
तेन सम्पत्स्यसे राजा स्वमेवेह गुणोज्ज्वलः॥६२॥
ततस्ते किं भयं कस्त्वां कथं परिभविष्यति।
तन्मां भजस्व निःशङ्कमन्यथा न भविष्यसि॥६३॥
इति तां ब्रुवतीं मत्वा सानुबन्धां नृपाङ्गनाम्।
गुणशर्माब्रवीद्युक्त्या तत्क्षणं स व्यपोहितुम्॥६४॥
यदि तेऽत्यन्तनिर्वन्धस्तत्करिष्ये वचस्तव।
प्रतिषेधमयाद्देवि सहसा तु न युज्यते॥६५॥
सहस्व दिवसान्कांश्चित्सत्यं जानीहि मद्वचः।
सर्वनाशफलेनानार्थेस्तवैतद्विरोधेन को मम॥६६॥
इत्याशया तां सन्तोष्य प्रतिपन्नवचास्तया।
गुणशर्मा स निर्गत्य ययावुच्छ्वसितस्ततः॥६७॥
ततो दिनेषु गच्छत्सु स महासेनभूपतिः।
गत्वैव वेष्टयामास कोट्टस्थं सोमकेश्वरम्॥६८॥
तत्र प्राप्तं विदित्वा च गौडनाथः स भूपतिः।
एत्य विक्रमशक्तिस्तं महासेनमवेष्टयत्॥६९॥
ततः स गुणशर्माणं महासेननृपोऽब्रवीत्।
एकं रुद्ध्वा स्थिताः सन्तो रुद्धा स्मोऽन्येन शत्रुना॥७०॥
तदिदानीमपर्याप्ताः कथं युध्यामहे द्वयोः।
अयुग्मे रुद्धके वीर स्थास्यामश्च कियच्चिरम्॥७१॥
तदस्मिन्त्सङ्कटेऽस्माभिः किं कार्यमिति तं सः।
पृष्टः पार्श्वस्थितो राज्ञा गुणशर्माभ्यभाषत॥७२॥
धीरो भव करिष्यामि देवोपायं तथाविधम्।
येनास्माभिस्तरिष्यामः सङ्कटादपि कार्यतः॥७३॥