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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

अष्टम लम्बक १११

Page 342Permalink

अष्टम लम्बक १११
हयग्रीव और विकटाक्ष नाम के जो दो असुर थे वे स्थिरबुद्धि और महाबुद्धि नाम से
इसके मन्त्री उत्पन्न हुए हैं ॥३८३॥
और भी जो सूर्यप्रभ के श्वसुर आदि अन्य बन्धु हैं वे सब पूर्वजन्म के ही असुर हैं जिन्होंने
इन्द्र आदि देवताओं को अनेक बार जीता था ॥३८४॥
इस प्रकार तुम्हारा पक्ष क्रमशः बड़ा है। धैर्य रखो। धर्म का आचरण करने से तुम लोग
परम समृद्धि प्राप्त करोगे' ॥३८५॥
कश्यप ऋषि के इस प्रकार कहते हुए ही अदिति आदि दक्ष की कन्याएँ, जो ऋषि की
पत्नियां थीं वे मध्याह्नकालीन धर्मक्रिया के लिए वहाँ आकर उपस्थित हुईं ॥३८६॥
मय आदि ने मुनि के आशीर्वाद प्राप्त करते हुए प्रणाम करने पर और पत्नियों को
आह्निक क्रिया करने की आज्ञा देने पर लोकपालों के साथ इन्द्र भी वहाँ आ गया ॥३८७॥
पत्नियों के साथ मुनि को प्रणाम करके मय आदि से प्रणाम किया गया इन्द्र सूर्यप्रभ
को देखकर क्रोध से बोला-॥३८८॥
'मालूम होता है यही लड़का है जो विद्याधर चक्रवर्ती बनना चाहता है। तो यह इतने
थोड़े में ही सन्तुष्ट क्यों हो गया इन्द्र-पद क्यों नहीं चाहता ? ॥३८९॥
तब मय ने कहा- 'हे देवराज ईश्वर (शिव) ने तुम्हारे लिए देवताओं का चक्रवर्ती पद
और इसके लिए विद्याधरों का चक्रवर्ती पद बनाया है' ॥३९०॥
मय के इन वचनों को सुनकर ईर्ष्या से जलता हुआ इन्द्र हँसकर बोला- 'इस प्रकार
महापराक्रमी आकृति के लिए विद्याधर चक्रवर्ती का पद बहुत छोटा है' ॥३९१॥
तब मय ने कहा कि 'जहाँ विद्याधरों का चक्रवर्ती श्रुतशर्मा हो सकता है, वहाँ यह आकृति
अवश्य ही निःसन्देह इन्द्र-पद के योग्य है' ॥३९२॥
ऐसा कहते हुए मय पर क्रुद्ध इन्द्र वज्र को उठाकर स्वयं लग्न हो गया। इतने में ही कश्यप
मुनि के क्रोध से हुङ्कार करने पर वह रुका ॥३९३॥
धिक्कार करती हुई और क्रोध से लाल मुखवाली दिति दनु आदि मुनि-पत्नियां भी
क्रुद्ध हो उठीं। तब यह देखकर शाप के भय से डरा हुआ इन्द्र भी नीचे मुँह करके वहीं
बैठ गया ॥३९४॥
पत्नियों के साथ देवों और असुरों के पिता कश्यप मुनि के चरणों में गिरकर उन्हें प्रसन्न
करने के लिए स्तुति करता हुआ इन्द्र बोला-॥३९५॥
'भगवन् मैंने श्रुतशर्मा को जो विद्याधरों का चक्रवर्ती-पद दिया है उसे यह सूर्यप्रभ हरण
करना चाहता है ॥३९६॥