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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

६५६ कथासरित्सागर

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६५६ कथासरित्सागर
इत्यादि राजतनया हृदि चिन्तयन्ती
तां यामिनीमनयद्यत्र कलिङ्गसेना ।
सोमप्रभा च निजवेश्मनि भूय एव
तद्दर्शनोत्सुकमना रजनीं निनाय ॥१९३॥
इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे ।
मदनमञ्चुकालम्बके द्वितीयस्तरङ्गः ।
तृतीयस्तरङ्गः
कलिङ्गसेनायाः कथा (पूर्वतोऽनुवृत्ता)
ततः सोमप्रभा प्रातस्तद्विनोदोपपादिनीम् ।
न्यस्तदारुमयानेकमायायन्त्रपुत्रिकाम् ॥१॥
करण्डिकां समादाय सा नभस्तलचारिणी ।
सख्याः कलिङ्गसेनाया निकटं पुनराययौ ॥२॥
कलिङ्गसेनाप्यालोक्य तांमानन्दाश्रुनिर्भरा ।
उत्थाय कण्ठे जग्राह पार्श्वसीनामुवाच च ॥३॥
त्वदीयमुखपूर्णेन्दुदर्शनेन विना सखि !
तमोमयी त्रियामाद्य शतयामेव मे गता ॥४॥
सज्जन्मान्तरसम्बन्धः कीदृशः स्यात्सख्या मम ।
यस्यायं परिणामोऽद्य त्वं देवि ! वेत्सि चेद् वद ॥५॥
तच्छ्रुत्वा राजपुत्रीं तामेवं सोमप्रमाब्रवीत् ।
ईदृशं मे नास्ति विज्ञानं नहि जातिं स्मराम्यहम् ॥६॥
न चात्र मनसोऽभिज्ञा बोधितं यदि जानते ।
तौ कृतं तादृशं पूर्वे परतस्त्वविदश्च त ॥७॥
एवमुक्तवतीं भूयः प्रेमचिह्नम्प्रणश्यलम् ।
कलिङ्गसेना पप्रच्छ विह्वले तां सुरारिपुम् ॥८॥
ब्रूहि मे सखि कस्येह देवजातेः पितुस्त्वया ।
जन्मनाऽलङ्कृतो वंशो मुक्तयेव सुवृत्तया ॥९॥
जगत्कर्णामृतं किं च तव नाम ससद्गुणे ।
करण्डिका किमर्थेयमस्यामस्ति च वस्तु किम् ॥११॥

मदनमंचुका लम्बक का दूसरा तरंग समाप्त

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वह राजकुमारी कलिङ्गसेना इस प्रकार की विविध बातें सोचती-सोचती कठिनाई से
रात व्यतीत कर सकी। उधर सोमप्रभा ने भी राजकुमारी के पुनर्सङ्गम की लालसा में उत्कण्ठित
रहकर रात बिताई॥१९३॥

मदनमंचुका लम्बक का दूसरा तरंग समाप्त

तीसरा तरंग
कलिङ्गसेना का वृत्तान्त क्रमशः

तदनन्तर प्रातः काल होते ही सोमप्रभा ने सखी के मनोविनोद के लिए एक डोलची में
सरकी की पुतलियों तथा विविध प्रकार के यन्त्रमय खिलौनों को सजाया और उसे साथ लेकर
आकाश में विहार करती हुई वह राजकुमारी कलिङ्गसेना के घर पर पहुँची ॥१-२॥

कलिङ्गसेना भी उसे आती हुई देखकर आनन्द के आँसुओं से भरी हुई उठकर उसके
पास गई और उसे गले लगाकर पास में बैठाकर कहने लगी—'हे सखि ! तुम्हारे मुख-रूपी
पूर्ण चन्द्रमा के दर्शन के बिना आज की मेरी सारी त्रियामा (तीन प्रहरोंवाली रात) शतयामा
(सौ प्रहरोंवाली रात) के समान व्यतीत हुई ॥३-४॥

न जाने तुम्हारे साथ मेरा पूर्वजन्म का कौन-सा सम्बन्ध है जिसका कि यह परिणाम है।
हे देवि यदि जानती हो तो कहो' ॥५॥

यह सुनकर सोमप्रभा उस राजपुत्री से इस प्रकार कहने लगी—'मुझे इसका ज्ञान नहीं
है। मैं पूर्वजन्म को स्मरण करनेवाली नहीं हूँ ॥६॥

इस विषय को मुनि लोग भी नहीं जानते जो जानते भी हैं तो उन्होंने पूर्वजन्म में ऐसा
ही पुण्य किया होता है कि जिससे वे दूसरों के पूर्वजन्म की बात जानते हैं ॥७॥

इस प्रकार प्रेम और विश्वास से सोमप्रभा को मधुर कहती हुई कलिङ्गसेना ने एकान्त में
कौतुक के साथ पूछा ॥८॥

'हे गुणरूप हे सखि यह तो बता कि सुन्दर चरित्रवाली तूने अपने जन्म से किस देवआदि
के वंश को मोती के समान धन्य किया है। संसार के कानों के लिए सुनने में अमृत के समान तेरा
नाम क्या है? इस बाँस की डोलची को क्यों लाई है और इनमें क्या वस्तु है ॥९-१०॥
८३

१६० कथासरित्सागर

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१६० कथासरित्सागर
तद्दृष्ट्वा च ततस्तस्या जननी रोगशङ्किनी।
आनन्दास्येन भिषजा निरूप्याविकलोदिता ॥२४॥
कुतोऽपि हेतोर्हर्षेण नष्टास्याः क्षुन्न रोगतः।
उत्फुल्लनेत्रं वक्त्र्येतदस्या हसदिवाननम् ॥२५॥
इत्युक्ता भिषजा हर्षहेतुं सञ्जननी च सा।
पप्रच्छ तां यथावृत्तं सापि तस्यै तदब्रवीत् ॥२६॥
सतः श्लाघ्यसखीसङ्गहृष्टा मत्वाभिनन्द्य च।
आहारं कारयामास जननी तां यथोचितम् ॥२७॥
अथान्येद्युरुपागत्य विदितार्था क्रमेण सा।
कलिङ्गसेनां तामेव रह सोमप्रभाम्यधात् ॥२८॥
मया स्वसख्यमावेद्य त्वत्पाश्र्वौगमनोऽवहम्।
अनुज्ञा ज्ञानिनो भर्तुर्गृहीता विदिताथतः ॥२९॥
तस्मात्त्वमप्यनुज्ञासा पितृभ्यां भव साम्प्रतम्।
येन स्वैरं मया साकं निःशङ्का विहरिष्यसि ॥३०॥
एवमुक्तवती हस्ते तो गृहीत्वैव तत्क्षणम्।
कलिङ्गसेना स्वपितुर्मातुश्च निकटं ययौ ॥३१॥
तत्र नामान्वयाख्यानपूर्व चैतामवर्णयत्।
पित्रे कलिङ्गदत्ताय राज्ञे सोमप्रभां सखीम् ॥३२॥
मात्रे च तारादत्तायै सर्ववैतामवर्णयत्।
तौ च दृष्ट्वा यथास्यानमेनामभिननन्दतुः ॥३३॥
ऊचतुश्चाकृतिप्रीती दम्पती साधुभो दृढ।
सस्कृत्य दुहितृस्नेहात्तां महासुरसुन्दरीम् ॥३४॥
वत्स कलिङ्गसेनेयं हस्ते तव समर्पिता।
तदिदानीं यथाकाममुभे विहरतां युवाम् ॥३५॥
एतत्तयोर्वचो द्वे साप्यभिनन्द्य निर्ययुः।
समं कलिङ्गसेना च सा च सोमप्रभा ततः ॥३६॥
जग्मतुश्च विहाराय बिहारं राजनिनिर्मितम्।
आनिन्यतुश्च तां तत्र मायायन्त्रकरण्डिकाम् ॥३७॥
ततो यन्त्रमयं यक्षं गृहीत्वा प्राहिणोत्तदा।
सोमप्रभा स्वप्रयोगाद् बुद्धावनियताय सा ॥३८॥
स यक्षो नभसा गत्वा दूरमम्लानमानसः।
आदाय मुक्तासङ्गलहमाम्बुरुहमञ्जरम् ॥३९॥

षष्ठ लम्बक ६६१

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षष्ठ लम्बक ६६१
यह देखकर उसकी माता ने रोग की शंका से उसे आनन्द नामक वैद्य को दिखाया और
आनन्द ने उसकी भली भाँति परीक्षा करके बताया ॥२४॥
'किसी अत्यन्त हर्ष के कारण इसकी भूख नष्ट हो गई, रोग से नहीं। विकसित नयनों-
वाला हँसता हुआ इसका मुख भी यही बताता है ॥२५॥
ऐसा सुनकर उसकी माता ने उससे हर्ष का कारण पूछा तो उसने सारी घटना अपनी माता
को सुना दी ॥२६॥
तदनन्तर अच्छी सहेली की मित्रता से प्रसन्न कलिंगसेना का अभिनन्दन करके माता ने
समयानुकूल भोजन कराया ॥२७॥
अनन्तर एक दिन इस घटना को जाननेवाली सोमप्रभा एकान्त में कलिंगसेना से मिलकर
कहने लगी ॥२८॥
मैंने अपने सर्वज्ञ पति से तेरा सारा वृत्तान्त सुनाकर प्रति दिन तेरे पास आने की आज्ञा
ले ली है ॥२९॥
इसलिए तू भी अपने माता-पिता से आज्ञा लेकर मेरे यहाँ चलने की तैयारी कर। ऐसा
होने पर तू भी मेरे साथ स्वच्छन्दतापूर्वक भ्रमण कर सकेगी ॥३०॥
ऐसा कहती हुई सोमप्रभा कलिंगसेना का हाथ पकड़कर उसे अपने माता-पिता के पास
ले गई ॥३१॥
वहाँ जाकर उसने अपनी सहेली सोमप्रभा के नाम और कुल आदि का परिचय देते हुए
अपने माता-पिता को दिखलाया ॥३२॥
माता तारादत्ता को भी उसे दिखाया और वे दोनों कलिंगसेना के कथनानुसार सोमप्रभा
को देखकर प्रसन्न हुए ॥३३॥
सोमप्रभा की आकृति से प्रसन्न वे दोनों अत्यन्त स्नेह से सोमप्रभा का स्वागत-सत्कार
करके बोले—'बेटी ! इस कलिंगसेना को हमने तुम्हारे हाथ सौंप दिया है। अब तुम दोनों अपनी
इच्छानुसार खेलो' ॥३४-३५॥
उनके वचनों से प्रसन्न होकर सोमप्रभा और कलिंगसेना वहाँ से निकली ॥३६॥
तदनन्तर वह राजा द्वारा बनवाये गये विहार का विहार (सैर) करने चली और मायामय
यन्त्रों की डोलची भी लाई। वहाँ विहार में सोमप्रभा ने यन्त्र के बने यक्ष को बुद्ध की पूजा का
सामान लाने की आज्ञा दी। वह यन्त्र सोमप्रभा के आज्ञानुसार लम्बा रास्ता तय करके रत्न,
मोती और सोने के कमल आदि लेकर आ गया ॥३७-३९॥

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तेनाभिपूज्य सुगता मासमाभास तत्र सा।
सोमप्रभा सनिख्यान्सर्वाश्चर्यप्रदायिना ॥४०॥
तद्बुद्ध्वागत्य दृष्ट्वा च विस्मितो महिषीसखः।
राजा कलिङ्गदत्तस्तामपृच्छत्तच्चेष्टितम् ॥४१॥
सत सोमप्रभावादीद्भाजन्नेतान्यनेकधा।
मायायन्त्रादिशिल्पानि पित्रा सृष्टानि मे पुरा ॥४२॥
यथा चेद जगद्यन्त्रं पञ्चभूतात्मक तथा।
यन्त्राण्येतानि सर्वाणि शृणु तानि पृथक् पृथक् ॥४३॥
पृथ्वीप्रधान यन्त्र यद्द्वारादि विवक्षाति तत्।
विहित तेन शक्नोति न चोद्घाटयितु पर ॥४४॥
आकारस्तोयमन्त्रोत्थः सजीव इव दृश्यते।
तेजोमय तु यद्यन्त्र तज्ज्वाला परिमुञ्चति ॥४५॥
वातयन्त्रं च कुरुते चेष्टागत्यागमाविकाः।
व्यक्तीकरोति चालाप यन्त्रमाकाशसम्भवम् ॥४६॥
मया चैतान्यवाप्तानि तातात् किं त्वमृतस्य यत्।
रक्षक चक्रमन्त्रं धत्तातौ जानाति नापर ॥४७॥
इति तस्या वदन्त्यास्तद्वचः श्रद्दधतामिव।
मध्याह्न पूर्यमाणानां शङ्खानामुदभूद्ध्वनिः ॥४८॥
तत स्वोधितमाहार वातु विज्ञाप्य तं नृपम्।
प्राप्यानुज्ञां विमाने तां सामुर्गा यन्त्रनिर्मिते ॥४९॥
कलिङ्गसेनामादाय प्रतस्थे गगनेन सा।
सोमप्रभा पितृगृहं ज्येष्ठाया स्वसुरन्तिकम् ॥५०॥
क्षणाच्च प्राप्य विन्ध्याद्रिवर्ति तत्पितृमन्दिरम्।
रम्या स्वयंप्रभायाश्च पार्श्वं सानयत्स्वस ॥५१॥
तत्रापश्यज्जटाजूटभासिनीं तां स्वयंप्रभाम्।
कलिङ्गसेना रुद्राक्षमार्ला सा ब्रह्मचारिणीम् ॥५२॥
सुसिताम्बरसवीता हसन्तीमिव पार्वतीम्।
कामभोगमहाभोगगृहीतोन्नतप श्रियाम् ॥५३॥
सापि सोमप्रभाख्यातो प्रणतो तो नृपात्मजाम्।
स्वयंप्रभा गृहातिथ्या संविभेजे फलाशन ॥५४॥

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१६४ कथासरित्सागर

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१६४ कथासरित्सागर
सखि भुक्तैः फलैरेतैर्जरा ते न भविष्यति ।
हिमात्ययस्य रूपस्य पद्मस्येव हिमाहृतिः ॥५५॥
एतदर्थमिह स्नेहादानीता भवती मया ।
इति सोमप्रभा चैतां राजपुत्रीमभाषत ॥५६॥
ततः कलिङ्गसेनात्र तान्यभुङ्क्त फलानि सा ।
सद्योऽमृतरसासार सिक्ताङ्गीव बभूव च ॥५७॥
ददर्श च पुरोद्यानं भ्रमन्ती तत्र कौतुकात् ।
ससुवर्णाब्जवापीकं सुधास्वादुफलद्रुमम् ॥५८॥
हेमचित्रलगाकीर्णं समणिस्तम्भविक्रमम् ।
भित्तिबुद्धिकरं शून्ये भित्तौ शून्यप्रतीतितम् ॥५९॥
जले स्थलधियं कुर्वत्स्थले च जलसङ्किकृत् ।
लोकान्तरमिवापूर्वं मयमायाविनिर्मितम् ॥६०॥
प्रविष्टपूर्वं प्लवगैः पुरा सीतागवेषिभिः ।
स्वयम्प्रभाप्रसादेन चिरात्सम्प्राप्तनिर्गमैः ॥६१॥
ततस्तदद्भुतपुरप्रकामालोकविस्मिताम् ।
मजरामाजनीभूतां तामापृच्छ्य स्वयम्प्रभाम् ॥६२॥
कलिङ्गसेनामारोप्य यन्त्रे भूयो विहायसा ।
सोमप्रभा तक्षशिलामानिनाय स्वमन्दिरम् ॥६३॥
तत्र सा तद्यथावस्तु पित्रोः सर्वमवर्णयत् ।
कलिङ्गसेना सा चापि परं सन्तोषमीयतुः ॥६४॥
इत्थं तयोर्द्वयोः सख्योर्गच्छत्सु दिवसेष्वथ ।
ऊचे कलिङ्गसेनां तामेव सोमप्रभैकदा ॥६५॥
यावन्न परिणीता त्वं तावत्सख्यं मम त्वया ।
श्वशूभर्तृभवने पश्चान्मम स्याद्वागमः कुतः ॥६६॥
न दृश्यो हि सखीभर्त्ता नाङ्गीकार्यः कश्चन्धनः ।
श्ववेर्वृकीव स्नुषायाः श्वश्रूर्मांसानि खादति ॥६७॥
तथा च शृणु वक्ष्यैतां कीर्तिसेनाकथां तव ।
— ॥६८॥
१ मुद्रपुस्तके त्रुटितोऽत्र पाठः ।

षष्ठ लम्बक १६५

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षष्ठ लम्बक १६५
तब सोमप्रभा ने कहा—'सखि इन फलों के खाने से कमलिनी को नष्ट करनेवाली
हिमवर्षा के समान तुम्हारे सुन्दर रूप को नष्ट करनेवाली वृद्धावस्था कभी नहीं आयेगी ॥५५॥
इसीलिए मैं तुम्हें यहाँ लाई हूँ। तब तुरन्त अमृतवर्षा से सींची हुई-सी कलिङ्गसेना ने उन
फलों को खाया ॥५६॥
वहाँ कौतुक से घूमते हुए उसने उस नगर के उद्यान को देखा जिसमें सोने के कमलों से
बिछी हुई बावलियाँ थीं अमृत के समान स्वादिष्ट फलोंवाले वृक्ष थे हंस आदि विचित्र पक्षियों
से वह उद्यान भरा था। वह उद्यान शून्य में मणियों के स्तम्भों का भ्रम उत्पन्न कर रहा था और
शून्य में दीवारों की तथा तथा दीवारों में शून्यता का भ्रम उत्पन्न कर रहा था। पानी में स्थल की
और स्थल में पानी की प्रतीति उत्पन्न कर रहा था। मय दानव की माया से निर्मित इस प्रकार का
वह नगर एक अपूर्व नवीन संसार के समान था ॥५८-६० ॥
इस नगर में किसी समय सीता को ढूँढ़ते हुए वानर घुस आये थे किन्तु स्वयंप्रभा की कृपा
से चिरकाल के पश्चात् उन्हें बाहर निकलने का अवसर मिला था ॥६१॥
इस नगर को भली-भाँति देखने से चकित और वृद्धावस्था से मुक्त कलिङ्गसेना को लेकर
और स्वयंप्रभा से आज्ञा लेकर, सोमप्रभा यन्त्रनिर्मित वाययान द्वारा तक्षशिला को गई ॥६२-६३॥
वहाँ जाकर कलिङ्गसेना ने सब वृत्तान्त माता-पिता को सुनाया इससे वे दोनों और
कलिङ्गसेना भी अत्यन्त सन्तुष्ट हुए ॥६४॥
इस प्रकार उन दोनों सखियों के मिलन करके अनेक दिनों के बीतने पर एक बार सोमप्रभा
ने कलिङ्गसेना से कहा ॥६५॥
जबतक तू विवाहिता नहीं है तभी तक मेरी तेरी मित्रता है। फिर तेरे पतिगृह में चल
जाने पर मेरी तेरी मित्रता कैसे रहेगी। मैं वहाँ कैसे आऊँगी ॥६६॥
सहेली के पति को न देखना चाहिए और न उस पर प्यार ही करना चाहिए। दूसरी बात
यह है कि भेड़ के मांस को भेड़िये के समान सास बहू के मांस को खा जाती है। मैं इस सम्बन्ध में
तुझे कलिङ्गसेना की एक कथा सुनाती हूँ ॥६७-६८॥
८४

६६६ कथासरित्सागर

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६६६ कथासरित्सागर

कीर्त्तिसेनादेवसेनयोः कथा

पुरे पाटलिपुत्राख्ये धुर्यो धनवतां वणिक्।
नाम्ना यथार्थेन पुरा धनपालित इत्यभूत् ॥६९॥
कीर्त्तिसेनाभिधाना च तस्याजायत कन्यका।
रूपेणानन्यसदृशी प्राणभ्योऽप्यधिकप्रिया ॥७०॥
सा च तेन समानाय मगधेषु महद्धये।
देवसेनाभिधानाय दत्ताभूद् वणिजे सुता ॥७१॥
तस्य चातिसुवृत्तस्य देवसेनस्य दुर्जनी।
विपक्षजनकस्यासीज्जननी स्वामिनी गृहे ॥७२॥
सा स्नुषां कीर्त्तिसेनां तां पश्यन्ती पतिसम्मिताम्।
क्रुधा ज्वलन्ती पुत्रस्य परोक्षमकदर्थयत् ॥७३॥
कीर्त्तिसेना च सा भर्तुर्वक्तु नैव शशाक तत्।
कष्टा हि कुटिलश्वश्रूपरतन्त्रवधूस्थितिः ॥७४॥
एकदा स पतिस्तस्या देवसेनो वणिज्यया।
गन्तुं प्रवृते बन्धुप्रेरितो वलभीं पुरीम् ॥७५॥
ततः सा कीर्त्तिसेना च पतिमेवमभाषत।
इयच्चिरं मया नैतदार्यपुत्र तवोदितम् ॥७६॥
कदर्ययति मामेषा तवाम्बा त्वय्यपि स्थिते।
त्वयि तु प्रोषिते किं मे कुर्यादिति न वेद्म्यहम् ॥७७॥
तच्छ्रुत्वा स समुद्भ्रान्तस्तत्स्नेहात्संभयः शनैः।
देवसेनस्तदा गत्वा मातरं प्रणतोऽब्रवीत् ॥७८॥
कीर्त्तिसेनाधुना हस्ते तवाम्ब! प्रस्थितस्य मे।
मास्या निस्नेहता कार्या कुलीमतनया ह्यसौ ॥७९॥
तच्छ्रुत्वा कीर्त्तिसेनां तामाहूयोद्वृत्तितक्षणा।
तं देवसेनं माता सा तत्काल समभाषत ॥८०॥
दृष्टा मया किं पृच्छन्तामेव त्वां प्रेरयत्यसौ।
गृहमेवकरी पुत्र मम तु द्वौ युवां समौ ॥८१॥
श्रुत्वैतच्छान्तचित्तोऽभूत्तत्कृते स वणिश्वरः।
व्याजसप्रणयैर्वाक्यैर्जनन्या को न वञ्च्यते? ॥८२॥

षष्ठ लम्बक ६६७

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षष्ठ लम्बक ६६७
कीर्तिसेना की कथा
पाटलिपुत्र में धनिकों में श्रेष्ठ यथार्थ नामवाला धनपालित नाम का एक वणिक रहता था।
उसकी कीर्तिसेना नाम की एक कन्या थी जो रूप में असाधारण और बनिये को प्राणों से भी
अधिक प्यारी थी॥६९-७०॥
धनपालित ने अपने ही समान धनी मगध के वैश्य देवसेन को वह कन्या दे दी॥७१॥
अत्यन्त सज्जन और सच्चरित्र देवसेन की माता बड़ी दुर्जन थी और देवसेन के पिता
के मर जाने के कारण वही गृहस्वामिनी थी॥७२॥
वह सास देवसेन की पत्नी अर्थात् अपनी बहू कीर्तिसेना से जलती रहती थी और पति के
पीछे उसे कष्ट दिया करती थी॥७३॥
बेचारी कीर्तिसेना अपनी उस दुर्दशा को अपने पति से नहीं कह सकती थी। दुष्ट सास
के वश में पड़ी हुई बहू की स्थिति अत्यन्त दुःखद होती है॥७४॥
एक बार उसका पति बन्धुओं की प्रेरणा से व्यापार करने के लिए वलभी नगरी को जाने
के लिए उद्यत हुआ॥७५॥
तब कीर्तिसेना ने पति से कहा—'आर्यपुत्र! इतने दिनों तक तो तुमसे मैंने नहीं
कहा॥७६॥
अब माता (सास) तुम्हारे यहाँ रहते हुए मेरी दुर्दशा करती रहती है तब तुम्हारे परदेश
जाने पर मुझ पर क्या-क्या अत्याचार करेगी यह मैं नहीं कह सकती'॥७७॥
यह सुनकर घबराया हुआ और उसके प्रेम में डग हुआ वैश्य अपनी माता को प्रणाम करता
हुआ कहने लगा—॥७८॥
'माता मेरे जाने पर अब कीर्तिसेना तुम्हारे हाथ है। उससे रूखा व्यवहार न करना
क्योंकि यह ऊँचे कुल की कन्या है॥७९॥
यह सुनते ही त्योरी चढ़ाकर माता देवसेन से बोली—॥८०॥
'तू ही इससे पूछ! मैंने इसका क्या किया है। यह मद विरुद्ध मुझ उजाड़ती है और
वह स्त्री हमारे घर में फूट डालनेवाली है। मेरे लिए तो तुम दोनों समान हो ॥८१॥
यह सुनकर वह सज्जन वैश्य चुप हो गया। सच है प्रेम और कपट से भरे हुए माता के
वाक्य से कौन नहीं ठगा जाता॥८२॥

१६८ कथासरित्सागर

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१६८ कथासरित्सागर
कीर्त्तिसेना तुसा तूष्णीमासीदुद्वेगसस्मिता ।
देवसेनस्तु सोऽन्येद्यु प्रतस्थे वलभीं वणिक् ॥८३॥
सासस्तद्विरहक्लेशजुपस्तस्याः क्रमेण सा।
तन्माता कीर्तिसेनाया दासी- पार्श्वान्न्यवारयत् ॥८४॥
कृत्वा च गृहचारिण्या स्वचेष्ट्या सह संविदम्।
आनाय्याभ्यन्तरं गुप्तं तां विवस्त्रां चकार सा ॥८५॥
पापे रहसि मे पुत्रमित्युक्त्वा सकचग्रहम्।
पादेवन्तैर्नखैश्चैतां पेट्या सममपाटयत् ॥८६॥
चिक्षेप चैनां भूगेहे सपिधाने दृढार्गले।
तत्रत्येडम्युद्धताशेषपूर्वजातार्थसञ्चये ॥८७॥
न्यधाच्च तस्यास्तत्रान्तः प्रत्यहं सा विनात्यये।
पापा तादृगवस्थाया भक्तस्यार्धशरावकम् ॥८८॥
व्यचिन्तयच्च दूरस्थे पत्यावेष मृता स्वयम्।
इमां मृत्वाप्य यातेति वक्ष्यामि दिवसैरिति ॥८९॥
इत्य भूमिगृहे क्षिप्ता रद्ध्वा पापकता तया।
सुखार्हा रुती तत्र कीर्त्तिसेना व्यचिन्तयत् ॥९ ०॥
आद्यः पतिः कुले जन्म सौभाग्यं साधुवृत्तता।
तदप्यहो मम श्वश्रूप्रसादादीदृशी विपत् ॥९१॥
एतदर्थं च निन्दन्ति कन्यानां जन्म बान्धवाः ।
श्वशूननन्दृसत्रासमसौभाग्याविवृद्धितम् ॥९२॥
इति शोचन्त्यकस्मात्सा कीर्त्तिसेना खनित्रकम्।
लेभेऽस्गाद् भूगृहाद्यात्रा मन शल्यमिवावरम् ॥९३॥
अयोमयेन तेनात्र सुरुङ्गां निचखान सा।
तावद्यावतयोतस्ये दैवात्स्वाहासवेश्मनः ॥९४॥
ददर्श च प्रदीपेन प्राक्तेनेनाथ तद्गृहम्।
अक्षीणं कृतालोका धर्मेणेव निजेन सा॥९५॥
आदायातश्च वस्त्राणि स्वं वर्णं च निशाक्षये।
निर्गत्यैव ततो गुप्तं जगाम नगराद् बहिः ॥९६॥
एवंविधाया गन्तुं मे न युक्तं पितुर्वेश्मनि।
किं वक्ष्ये तत्र लोकश्च प्रत्येव्यति कथं मम ॥९७॥

षष्ठ लम्बक ६६९

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षष्ठ लम्बक ६६९
घबराहट से मुस्कराती हुई कीर्तिसेना भी उस समय चुप रही। दूसरे दिन देवसेन वल्लभी
को चला गया ॥८४॥
उसके चले जाने के पश्चात् विरह-कष्ट से जर्जरित कीर्तिसेना की सास ने धीरे-धीरे उसकी
दासियों को निकाल दिया ॥८५॥
और, अपने घर की पुरानी दासी के साथ सलाह करके कीर्तिसेना को धोखे से कोठरी के
अन्दर घुसाकर नंगी कर दिया और बोली-॥८६॥
'पापिन ! मेरे लड़के को मुझसे अलग करती है-ऐसा कहकर, उसके केश पकड़कर
उस दासी की सहायता से लातों, घूसों, दाँतों और नखों से मारने, काटने और नोचने लगी ॥८७॥
और, उसे घर के उस तहखाने के अन्दर ढकेलकर बाहर से लकड़ी की दृढ़ अर्गला से बन्द
कर दिया जिस तहखाने से पूर्वजों का सारा संचित धन निकाल लिया गया था ॥८७॥
दिन बीतने पर मिट्टी के एक पात्र में आधा पात्र भात वह उस खाने के लिए दिया
करती थी ॥८८॥
उसे तहखाने में बन्द करके सास ने सोचा कि पति के दूर रहने पर यह इस प्रकार स्वयं
मर जायगी तो कुछ दिनों के बाद कहूँगी कि वह भाग गई ॥८९॥
इस प्रकार पापिन सास द्वारा तहखाने में बन्द की गई कीर्तिसेना सोचने लगी ॥९० ॥
'मेरा पति धनी है और मैं स्वयं अच्छे और ऊँचे कुल में उत्पन्न हुई सौभाग्यवती हूँ और
चरित्र भी शुद्ध है। फिर भी मुझे भाग के प्रभाव से ऐसी विपत्ति भोगनी पड़ रही है ॥९१॥
ठीक है कि परिवारवाले इसीलिए कन्या के जन्म की निन्दा करते हैं क्योंकि कन्या-
जीवन सास, ननद और विधवापन से दूषित हो जाता है' ॥ ९२॥
ऐसी सोचती हुई कीर्तिसेना को उस तहखाने में अकस्मात् एक खुरपी (भूमि खोदने का
औजार विशेष) मिल गई, मानो वह निकाला हुआ उसके हृदय का काँटा हो ॥ ९३॥
उस लोहे की खुरपी से वह तबतक सुरंग खोदती रही जबतक वह शान्त रहन के भवन
में न निकल गई ॥ ९४॥
तदनन्तर उस सुरंगद्वार से अपने कमरे में निकली हुई कीर्तिसेना ने वहाँ पल्लव के रचे हुए
दीपक के सहारे उस घर को देखा, मानो उसने अपने बढ़ते हुए धर्म से उस घर को आलोकित
कर दिया हो ॥९५॥
वहाँ से वह अपने वस्त्र और स्वर्णाभूषण आदि लेकर निशान्त (अत्यन्त प्रभात) में गुप्त
रूप से निकलकर नगर से बाहर चली गई ॥ ९६॥
'ऐसी स्थिति में मुझे पिता के घर न जाना चाहिए-लोग क्या कहेंगे और कौन विश्वास
करेंगे' ॥ ९७॥

१७ कथासरित्सागर

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१७ कथासरित्सागर
अतः स्वयुक्त्या गन्तव्यं पत्युरेवान्तिकं मया।
इहामुत्र च साध्वीनां पतिरेका गतिर्यतः ॥९८॥
इत्यालोच्य भयाद्रात्रौ तडागाम्बुधृताप्लवा।
राजपुत्रस्य वेषं सा कौशिखना मुमुहितम् ॥९९॥
ततो गत्वापणे दत्वा किञ्चिन्मूल्येन काञ्चनम्।
कस्यापि वणिजो गेहे दिने तस्मिन्नुवास सा॥१००॥
अन्येद्युस्तत्र चक्रे च वलभीं गन्तुमिच्छता।
समुद्रदत्तनाम्ना सा वणिजा सह संस्तवम्॥१०१॥
तेन साकं सभृत्येन प्राप्तुं प्राक्प्रस्थितं पतिम्।
सन्द्राजपुत्रवेषा सा प्रतस्थे वलभीं प्रति॥१०२॥
जगाद स च वणिजं गोत्रजैरस्मि बाधिनः।
तत्त्वया सह गच्छामि वलभीं स्वजनान्तिकम्॥१०३॥
तच्छ्रुत्वा स वणिक्पुत्रो मार्गे परिचरंश्च ताम्।
राजपुत्रो ध्रुवं मध्यं सोऽप्यसाविति गौरवात् ॥१०४॥
ययौ च स वणिक्सार्थं पुरस्कृत्याटवीपथम्।
बहुशुल्कभयत्यक्तमार्गान्तरजनाश्रितम् ॥१०५॥
दिनैः प्राप्याटवीद्वारं सायं सार्थे कृतस्थितौ।
चत्रे कृतान्तदूतीव द्यन्द्रे भयङ्करं शिवा॥१०६॥
तदभिश्रे वणिग्साथै चौराद्यापातशङ्किनि।
हस्ते गृहीतशस्त्रेषु सर्वतो रिपुरक्षिषु॥१०७॥
ध्वान्तं धावति दम्प्यूनामप्रयायिवलोपमे।
भीतिमना तदाश्लेष्यं पुरुषा सा व्यचिन्तयत्॥१०८॥
अहो दुष्कृतिनां कर्म मन्तानामंव वर्द्धने।
यद्य दश्युहूता व्यापदिहापि फलिता मम॥१०९॥
प्रथमं मृत्युनग्राहं दवश्वश्वापन भक्षिता।
प्रविष्टा भूगृहं पश्चाद् गर्भवाममिवापरम्॥११०॥
दैवात्ततोऽपि निष्क्रान्ता जातव पुनरप्यहम्।
इहाद्यागत्य सम्प्राप्ता भूयो जीवितसंशयम्॥१११॥
चौरैर्यदि हतास्मीह मच्छेदयूममं वरिणी।
अन्यामनक्ता मना यक्षारीरधमियास्यति म पतिम्॥११२॥

षष्ठ लम्बक ६७१

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षष्ठ लम्बक ६७१
इसलिए मुझे अपनी युक्ति से पति के पास ही जाना चाहिए क्योंकि पतिव्रताओं के लिए
पति ही इस लोक में और परलोक में गति है॥१०८॥
उसने ऐसा सोचकर वहीं तालाब में स्नान करके पूर्णरूप से राजपुत्र का वेश बनाया और
बाजार में सोना बेचकर, उसका मूल्य लेकर उस दिन उसी नगर के किसी बनिये के घर में रात्रि
व्यतीत की॥१०९॥
दूसरे दिन वल्लभी जाने के लिए उद्यत समुद्रसेन नामक वैश्य से उसने बात की और सेवक
के साथ जाते हुए समुद्रसेन के साथ राजकुमार का वेष धारण की हुई कीर्तिसेना
पहले गये हुए पति को प्राप्त करने के लिए वल्लभी को चली गई ॥११०-११२॥
अपना परिचय देती हुई वह उस वैश्य से कहने लगी कि 'कुटुम्ब के लोगों से तंग आकर
तुम्हारे साथ अपने बान्धव व्यक्ति के पास जा रहा हूँ' यह सुनकर उस वैश्यपुत्र ने भी 'यह कोई
कुलीन और भद्र राजपुत्र है' ऐसा समझकर मार्ग में उसकी यथोचित सहायता की ॥११३-११४॥
व्यापारी वैश्यों का वह दल मार्ग-शुल्क अथवा चुंगीकर की अधिकता से बचने के लिए
उस मार्ग को छोड़कर अन्य जंगली मार्ग को पकड़कर, चलनेवाले अधिक व्यक्तियों के मार्ग से
चला ॥११५॥
कुछ दिनों के पश्चात् वह दल घोर जंगल के मुहाने पर पहुँचकर ठहर गया। उसी समय
यमराज की दूती के समान एक शृगाली ने भयंकर रूप से रोना प्रारम्भ किया ॥११६॥
उस अपशकुन को समझनेवाले वैश्य व्यापारियों ने चोर डाकुओं आदि के आक्रमण
की शंका से सावधान होकर, रक्षकदल के सिपाहियों के शस्त्र लेकर तैयार हो जाने पर, शत्रुओं की
प्रथम सेना-पंक्ति के समान अन्धकार के चारों ओर फैल जाने पर, पुरुषवेषधारिणी कीर्तिसेना
सोचने लगी—॥११७-११८॥
पापियों के कर्म सन्तान द्वारा बढ़ते हैं। अर्थात् उनके पापों का फल सन्तान को भोगना
पड़ता है। देखो सास द्वारा लाई गई विपत्ति इस समय मेरे प्रति फलित हो रही है ॥११९॥
मैं सबसे पहले मृत्यु के समान सास के क्रोध से खाई गई फिर दूसरे गर्भवास के समान
तहखाने में बन्द की गई ॥१२१॥
दैववश पुनर्जन्म के समान वहाँ से निकली। अब आज यहाँ आकर पुनः जीवन के ही
सन्देह में पड़ गई ॥१२२॥
यदि मैं चोर डाकुओं द्वारा मारी गई तो मेरी बैरिन सास मेरे पति से कहेगी कि वह किसी
पर आसक्त होकर घर से निकल गई थी ॥१२३॥

६७२ कथासरित्सागर

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६७२ कथासरित्सागर
स्त्रीति ज्ञातास्मि केनापि हृतवस्त्रान्तरा यदि।
ततो मृत्युर्मम श्रेयान्न पुनः शील विप्लवः ॥११३॥
तेन धर्मेव मे रक्ष्यौ नापेक्ष्योऽय सुहृद् वणिक्।
सतीधर्मो हि सुस्त्रीणां चिन्यो न सुहृदादयः ॥११४॥
इति निश्चित्य सा प्राप छिन्वती तरुमध्यगम्।
गर्तं गुहाकृतिं दत्तं कृपयेवान्तरं भुवा ॥११५॥
तत्र प्रविश्य छाच्छाद्य तृणपर्णादिभिस्तनुम्।
तस्थौ संधार्यमाणा सा पतिसङ्गमवाञ्छया ॥११६॥
ततो निशीथे सहसा विपत्येवोद्यतायुधा।
चौरसेना सुमहती सार्थं वष्टपति स्म तम् ॥११७॥
निनदद्दस्युशस्त्राग्रं शस्त्रज्वालाचिरप्रभम्।
सत्तं ससृगिरासारं तथाभूद्युद्धदुर्दिनम् ॥११८॥
हत्वा समुद्रसेनं च सानुगं तं वणिक्पतिम्।
बलिनोऽथ ययुश्चौरा गृहीतधनसञ्चयाः ॥११९॥
तदा च भीतिसेना सा श्रुतकोलाहला बलात्।
यन्न मुक्तासुमिरतत्र कारणं केवलो विधिः ॥१२०॥
ततो निशायां यातायामुदिते तिग्मतेजसि।
निर्जगाम च सा तस्माद् गर्ताद् विटपमध्यतः ॥१२१॥
कामं भर्त्रेकभक्तानामविस्रंसिततेजसाम्।
देवता एव साध्वीनां त्राणमापदि कुर्वते ॥१२२॥
यत्तत्र निर्जनेऽरण्ये सिंहो दृष्ट्वापि तां जहौ।
न परं यावदभ्येत्य कुतश्चित्कोऽपि तापसः ॥१२३॥
पृष्टोदन्तां समाश्वास्य जलपानं कमण्डलोः।
दत्त्वोपविश्य पन्थानं तस्याः क्वापि तिरोदधे ॥१२४॥
ततस्तुप्तामृतेनेव क्षत्पिपासाविनाकृता।
तापसोक्तेन मार्गेण प्रतस्थे सा पतिव्रता ॥१२५॥
प्रभास्तशिखराण्डं प्रसारिसकरं रविम्।
रात्रिमेकां क्षमस्वेति वदन्तमिव वीक्ष्य सा ॥१२६॥
महतोऽरण्यवृक्षस्य गुहाम भूरिकोठरम्।
विवेश पिदधे चास्य द्वारमन्येन दारुणा ॥१२७॥

षष्ठ लम्बक १७३

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षष्ठ लम्बक १७३
यदि वस्त्रों का हरण होने पर मेरे स्त्रीत्व का ज्ञान लोगों को हो गया तो इससे मेरी मृत्यु
अच्छी होगी। चरित्र का नाश अच्छा नहीं ॥११३॥
इसलिए मुझे अपने चरित्र की ही रक्षा करनी चाहिए। इस वैश्यमित्र की नहीं।
सतीत्व रक्षा ही स्त्रियों का मुख्य धर्म है मित्र आदि नहीं ॥११४॥
ऐसा निश्चय करके अपने बचने के लिए स्थान ढूँढ़ते हुए उसने एक वृक्ष के बीच बना
हुआ गुफा के समान एक गड्ढा देखा मानो कृपाकर पृथ्वी ने उसे छिपने के लिए स्थान
दिया हो ॥११५॥
उसमें घुसकर और घास-पातों आदि से शरीर को ढँककर, पति मिलन की अभिलाषा
रखती हुई वह वहाँ छिप गई ॥११६॥
तब आधी रात के समय शस्त्र-सज्जित डाकुओं की बड़ी सेना ने व्यापारियों के दल को
घेर लिया ॥११७॥
फलतः वहाँ घोर वर्षाकाल के समान घमासान युद्ध छिड़ गया जिसमें चिल्लाते हुए
डाक काले बादलों के समान थे शस्त्रों के संघर्ष से निकली हुई अग्नि विद्युत् का काम कर रही थी
और रुधिर की घोर वर्षा हो रही थी ॥११८॥
पश्चात् डाक रक्षकों के साथ समुद्रसेन व्यापारी को मारकर उसका सारा धन और
सामान लूटकर ले गये ॥११९॥
उस घमासान युद्ध के समय भीषण चीत्कार सुनकर भी कीर्तिसेना जो मरी नहीं उसमें
केवल उसका भाग्य ही कारण था ॥१२०॥
तब रात बीतने और सूर्य के उदय होने पर वह कीर्तिसेना वृक्ष के बीच के गड्ढे से बाहर
निकली ॥१२१॥
पति की एकमात्र भक्ति और अपने सतीत्व के तेज की दृढ़ता से अपनी रक्षा करनेवाली
पतिव्रताओं की आपत्ति में देवता अवश्य उनकी रक्षा करते हैं ॥१२२॥
क्योंकि उस निर्जन वन में चोर ने भी उसे देखकर छोड़ दिया किन्तु कहीं से आते हुए किसी
तपस्वी ने उसे नहीं छोड़ा ॥१२३॥
तपस्वी ने उसका वृत्तान्त जानकर और उसे धैर्य प्रदान कर कमण्डल से जल पिलाया
तथा उसे आगे जाने का मार्ग बताकर वह कहीं अन्तर्हित हो गया ॥१२४॥
तब मानो अमृत-पान करके तृप्त हुई-सी पतिव्रता कीर्तिसेना भूख और प्यास से रहित
हो गई और तपस्वी द्वारा प्रदर्शित पथ से आगे बढ़ चली ॥१२५॥
कुछ मार्ग चलने पर 'एक रात और क्षमा करो' मानों कर (हाथ और किरण) फैला-
कर इस प्रकार कहते हुए सूर्य के अस्त हो जाने पर वह एक विशाल जंबुकी वृक्ष में घर के समान
बने हुए कोटर भाग में घुस गई और सूखी लकड़ियों से उसका द्वार बन्द कर दिया ॥१२६-१२७॥
८५

६७४ कथासरित्सागर

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६७४ कथासरित्सागर
प्रदापे च ददर्शात्र द्वारच्छिद्रान्तरेण सा ।
राक्षसीमागतो घोरां बालकैर्न्विता सुतैः ॥१२८॥
तीर्णान्यविपदद्याहमनया भक्षितेति सा ।
त्रस्ता यावत्तरो तावदारूढा सत्र राक्षसी ॥१२९॥
अन्वारुढाश्च तत्पुत्रास्तत्र तां किल राक्षसीम् ।
अब्रुवन्म्व न किञ्चिद् भक्ष्यं देहीति तत्क्षणम् ॥१३०॥
ततः सा राक्षसी बालांस्तानुवाचाथ पुत्रकाः ।
महाश्मशानं गत्वापि भक्ष्यं नासादितं मया ॥१३१॥
याचितो डाकिनीसङ्घपाश्च्यत्र भागमदान् मे ।
तत्सेनादप विज्ञप्य याचितो भैरवो मया ॥१३२॥
स च मामान्वयो पृष्ट्वा दमो मामेषमादिशत् ।
भयङ्करि कुगेनासि तरदूपणर्यपजा ॥१३३॥
तन्निंतो मानिदूरम्य वसुदत्तपुरं व्रज ।
तत्रास्त बम्मसाग्यो राजा धर्मपरो महान् ॥१३४॥
य क्रूरस्माटवीमेतां पर्यन्तस्थोऽभिरक्षति ।
स्वयं गृह्णाति गुख्य च निगृह्णाति च तस्करान् ॥१३५॥
तस्याभ्या च मृग्याधममृजस्य भूपते ।
अधामद्य प्रविष्टाम्त कर्णे शतपदी ल्पु ॥१३६॥
सा च बाल्न बहुश प्रसूतास्य शिरस्तरे ।
तेन रोगेण सद्रामो म्वायुनेषा च यक्षत ॥१३७॥
वैद्याश्चाम्य न तं व्याधि विद्म्यन्योऽपि कोऽपि चेत् ।
स शास्यति मत्रम्भंग दिनैरस्त्रैर्विपत्स्यत ॥१३८॥
तस्य मांसानि भुङ्क्ष्वीषा विगतस्य त्वमायया ।
मशिर्तम्मश्चि षण्मागापर्णिमृजा भविष्यसि ॥१३९॥
इत्य स भैरवणादि गरिभाग गतः ।
बालवाम्बाद्य तिहितस्तत्पुत्रा किं ददाम्यहम् ॥१४०॥
इय नयाक्या गराश्या पुत्रास्त सामयाब्रुवन् ।
शाशारनाडे गन्टर्निरि न राजाम्ब जीवति ॥१४१॥
कथ च शास्ता रोगा द्य तस्यारनीयाः ।
एवमवत्ताऽगाया शन्शान् गपशी व्रयो ॥१४२॥
शाशारनाड गन्तव्यम्भारदेव न भार्ता ।
धूत्वा च यथा शास्त्रं महागेगात्प्रतीया ॥१४३॥

षष्ठ लम्बक १६५

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षष्ठ लम्बक १६५
प्रदोषकाल में उसने द्वार के छिद्र से झाँककर देखा कि एक भीषण राक्षसी छोटे-छोटे
बच्चों के साथ आई ॥ १२८॥
उसे देखकर कीत्तिसेना जैसे ही यह सोचने लगी कि अन्यान्य सभी विपत्तियों से पार हो
मात्र मैं इससे खाई जाऊँगी इतने में ही वह राक्षसी वृक्ष पर चढ़ गई ॥ १२९॥
उसके बच्चे भी उसके पीछे चढ़ गये और माँ से कहने लगे— 'हम लोगों को कुछ भोजन
दो' ॥ १३० ॥
तब वह राक्षसी उन छोटे बच्चों से बोली— 'बेटा ! मैंने महाश्मशान में जाकर भी आज
कुछ भोजन नहीं पाया। डाकिनियों के दल से भी माँगा। इस दुःख से मैंने भैरव से भी प्रार्थना
की ॥ १३१ १३२॥
उस भैरव ने मेरा नाम-गोत्र पूछकर यह आज्ञा दी कि 'हे भयंकरि, तू करङ्कषण के वंश में
उत्पन्न हुई और कुलीन है। अतः यहाँ से समीप-स्थित वसुदत्तपुर को जा। वहाँ वसुदत्त नाम का
महा धार्मिक राजा है, जो इस जंगल के पास रहकर इस सारे जंगल की रक्षा करता है, मार्ग-शुल्क
लेता है और चोरों को पकड़ता है ॥ १३३-१३५॥
एक बार शिकार खेलने की थकावट से वह जंगल में सो गया। उस समय अज्ञात अवस्था
में एक गोजर (कनखजूरा मादा) उसके कान में शीघ्रता से घुस गया ॥ १३६॥
उसने बहुत दिनों के बाद राजा के सिर के भीतर प्रसव किया। इस रोग से गलते-गलते
उस राजा की केवल हड्डियाँ और नसें ही शेष रह गई हैं, अर्थात् शीघ्र ही मरने
वाला है ॥ १३७॥
वैद्य उसके रोग को नहीं जानते। यदि और भी कोई उसे न जानेगा तो राजा शीघ्र ही
मर जायगा ॥ १३८॥
तुम उस मरे हुए राजा का मांस अपनी माया से प्राप्त करके खाना। उसके खाने से छह
महीनों तक तृप्त रहोगी भूख न लगेगी ॥ १३९॥
इस प्रकार भैरव ने भी मुझे शाप दिया। लेकिन वह लम्बी अवधि का है। तो बताओ
बेटा आज मैं क्या करूँ ? ॥ १४० ॥
राक्षसी के इस प्रकार कहने पर वे बच्चे कहने लगे— 'माता ! क्या उस रोग को जान
लेने पर और उसके दूर हो जाने पर राजा जीवित रहेगा ? ॥ १४१॥
और यह भी बताओ कि राजा का ऐसा रोग कैसे दूर हो सकता है। तब वह राक्षसी
बच्चों से कहने लगी— 'रोग को जानकर उसे दूर कर देने पर राजा अवश्य जी जायगा। यह
भी सुनो कि यह महारोग कैसे दूर होगा ॥ १४२-१४३॥

६७८ कथासरित्सागर

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६७८ कथासरित्सागर

तथेत्युक्तवतीं तां च कीर्तिसेनां तदैव सः।
वसुदत्तपुरं गोपः पुंवेषां नयति स्म ताम् ॥१६०॥
तच्च तत्र यथावस्तु निवेद्यार्त्याय तत्क्षणात्।
प्रतीहाराय कल्याणलक्षणां तां समर्पयत् ॥१६१॥
प्रतीहारोऽपि राजानं विज्ञप्यैव तदाज्ञया।
प्रवेशयामास स तां तस्यान्तःपुरमनिन्दिताम् ॥१६२॥
राजा च सोऽत्र रोगातंस्तां दृष्ट्वैवामृतदृष्टिम।
आश्वस्तो वसुदत्तोऽभूद्वेधेत्यात्मेव हिवाहितम् ॥१६३॥
उवाच चैतां पुंवेषां यदिमामपनेष्यसि।
रुजमेतत्प्रदास्यामि राज्यार्धं ते सुलक्षण ॥१६४॥
जाने जहार पृष्ठात्मे स्वप्ने स्त्री कृष्णकम्बलम्।
सन्निश्चितमिमं रोगं हरिष्यति भवानमम् ॥१६५॥
तच्छ्रुत्वा कीर्तिसेना तं जगादाथ दिनम् गतः।
देव ध्वस्तेऽपनेष्यामि रोगं मा स्मार्षृछिं कृथाः ॥१६६॥
इत्यक्त्वा मूर्ध्नि राज्ञोऽस्य गव्यं घृतमवापयत्।
तेन तस्याययौ निद्रा ययौ सा चातियेदना ॥१६७॥
भिषग्रूपेण देवोऽयं पुण्यैर्नः कोऽप्युपागतः।
इति तत्र च तां सर्वे कीर्तिसेनां ततोऽस्तुवन् ॥१६८॥
महादेवी च तैस्तैस्तामुपचारैरुपचरत्।
नक्तं वेश्म पृथक्चास्याः सवासीकमकल्पयत् ॥१६९॥
अथापरेद्युर्मध्याह्ने मन्त्रिश्वन्तःपुरेषु च।
पश्यत्सु तस्य भूपस्य कीर्तिसेना चकार सा ॥१७०॥
शिरसः कर्णमार्गेण सार्धं शतपदीशतम्।
राक्षस्युदितया पूर्वं युक्त्याभ्यवहृतया तया ॥१७१॥
स्नापयित्वा च घटके सा ताः शतपदीस्ततः।
घृतक्षीराभिषेकेण च नृपं समतर्पयत् ॥१७२॥
क्रमात्तस्मिन्समाश्वस्ते रोगमुक्ते महीपतौ।
घटे तान्राजिमो दृष्ट्वा को न तत्र विसिस्मये ॥१७३॥

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कीर्तिसेना न कहा—'ठीक है। तब वह ग्वाला पुरुष-वेषधारिणी कीर्तिसेना को वसुदत्त
पुर में ले गया ॥१६०॥
ग्वाले ने वहाँ जाकर दुःखित द्वारपाल से सब कुछ निवेदन किया और उस शुभलक्षणा को
उसे सौंप दिया ॥१६१॥
द्वारपाल ने भी राजा से निवेदन किया और उसकी आज्ञा से उस सर्वाङ्गसुन्दरी को वह
राजा के पास ले गया ॥१६२॥
रोगाक्रान्त राजा वसुदत्त भी उस अद्भुत वैद्य को देखकर प्रसन्न और विश्वस्त हो
गया ॥१६३॥
'यदि तुम मेरे इस रोग को दूर करोगे तो मैं तुम्हें इस राज्य का आधा भाग दे दूंगा ॥१६४॥
स्वप्न में मैंने देखा है कि एक स्त्री मेरे शरीर पर से काला कम्बल हटा रही है।
इससे समझता हूँ कि तुम निश्चय ही मेरी बीमारी दूर करोगी' ॥१६५॥
यह सुनकर कीर्तिसेना कहने लगी—'राजन् आज तो दिन चला गया। कल प्रातः
तुम्हारा रोग दूर करूँगा अधीर न होना' ॥१६६॥
ऐसा कहकर उसने राजा के सिर पर गाय का घी मलवाया उससे उसे नींद आ गई
और तीव्र वेदना कम हो गई ॥१६७॥
'वैद्य के रूप में यह कोई देवता आया है'—इस प्रकार कहकर सभी राजपुरुष उसकी
प्रशंसा करने लगे ॥१६८॥
महारानी ने भी अनेक प्रकार से उसका स्वागत-सम्मान किया और रात को उस वैद्य
के लिए पृथक गेह का प्रबन्ध कर दिया ॥१६९॥
दूसरे दिन मध्याह्न में मन्त्रियों और राजाओं के सामने ही दासी से सुनी हुई उस
आश्चर्यजनक युक्ति से कीर्तिसेना ने कान के मार्ग से सभी गांडरों या कनखजूरों को बाहर निकाल
दिया और घी-दूध आदि से राजा को हृष्ट-पुष्ट बना दिया ॥१७०-१७२॥
क्रमशः राजा के रोगमुक्त और स्वस्थ होने पर और घड़े में उन जीवों को देखकर किसे
आश्चर्य नहीं हुआ? ॥१७३॥