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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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षष्ठ लम्बक १७३
यदि वस्त्रों का हरण होने पर मेरे स्त्रीत्व का ज्ञान लोगों को हो गया तो इससे मेरी मृत्यु
अच्छी होगी। चरित्र का नाश अच्छा नहीं ॥११३॥
इसलिए मुझे अपने चरित्र की ही रक्षा करनी चाहिए। इस वैश्यमित्र की नहीं।
सतीत्व रक्षा ही स्त्रियों का मुख्य धर्म है मित्र आदि नहीं ॥११४॥
ऐसा निश्चय करके अपने बचने के लिए स्थान ढूँढ़ते हुए उसने एक वृक्ष के बीच बना
हुआ गुफा के समान एक गड्ढा देखा मानो कृपाकर पृथ्वी ने उसे छिपने के लिए स्थान
दिया हो ॥११५॥
उसमें घुसकर और घास-पातों आदि से शरीर को ढँककर, पति मिलन की अभिलाषा
रखती हुई वह वहाँ छिप गई ॥११६॥
तब आधी रात के समय शस्त्र-सज्जित डाकुओं की बड़ी सेना ने व्यापारियों के दल को
घेर लिया ॥११७॥
फलतः वहाँ घोर वर्षाकाल के समान घमासान युद्ध छिड़ गया जिसमें चिल्लाते हुए
डाक काले बादलों के समान थे शस्त्रों के संघर्ष से निकली हुई अग्नि विद्युत् का काम कर रही थी
और रुधिर की घोर वर्षा हो रही थी ॥११८॥
पश्चात् डाक रक्षकों के साथ समुद्रसेन व्यापारी को मारकर उसका सारा धन और
सामान लूटकर ले गये ॥११९॥
उस घमासान युद्ध के समय भीषण चीत्कार सुनकर भी कीर्तिसेना जो मरी नहीं उसमें
केवल उसका भाग्य ही कारण था ॥१२०॥
तब रात बीतने और सूर्य के उदय होने पर वह कीर्तिसेना वृक्ष के बीच के गड्ढे से बाहर
निकली ॥१२१॥
पति की एकमात्र भक्ति और अपने सतीत्व के तेज की दृढ़ता से अपनी रक्षा करनेवाली
पतिव्रताओं की आपत्ति में देवता अवश्य उनकी रक्षा करते हैं ॥१२२॥
क्योंकि उस निर्जन वन में चोर ने भी उसे देखकर छोड़ दिया किन्तु कहीं से आते हुए किसी
तपस्वी ने उसे नहीं छोड़ा ॥१२३॥
तपस्वी ने उसका वृत्तान्त जानकर और उसे धैर्य प्रदान कर कमण्डल से जल पिलाया
तथा उसे आगे जाने का मार्ग बताकर वह कहीं अन्तर्हित हो गया ॥१२४॥
तब मानो अमृत-पान करके तृप्त हुई-सी पतिव्रता कीर्तिसेना भूख और प्यास से रहित
हो गई और तपस्वी द्वारा प्रदर्शित पथ से आगे बढ़ चली ॥१२५॥
कुछ मार्ग चलने पर 'एक रात और क्षमा करो' मानों कर (हाथ और किरण) फैला-
कर इस प्रकार कहते हुए सूर्य के अस्त हो जाने पर वह एक विशाल जंबुकी वृक्ष में घर के समान
बने हुए कोटर भाग में घुस गई और सूखी लकड़ियों से उसका द्वार बन्द कर दिया ॥१२६-१२७॥
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