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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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षष्ठ लम्बक ६६१
यह देखकर उसकी माता ने रोग की शंका से उसे आनन्द नामक वैद्य को दिखाया और
आनन्द ने उसकी भली भाँति परीक्षा करके बताया ॥२४॥
'किसी अत्यन्त हर्ष के कारण इसकी भूख नष्ट हो गई, रोग से नहीं। विकसित नयनों-
वाला हँसता हुआ इसका मुख भी यही बताता है ॥२५॥
ऐसा सुनकर उसकी माता ने उससे हर्ष का कारण पूछा तो उसने सारी घटना अपनी माता
को सुना दी ॥२६॥
तदनन्तर अच्छी सहेली की मित्रता से प्रसन्न कलिंगसेना का अभिनन्दन करके माता ने
समयानुकूल भोजन कराया ॥२७॥
अनन्तर एक दिन इस घटना को जाननेवाली सोमप्रभा एकान्त में कलिंगसेना से मिलकर
कहने लगी ॥२८॥
मैंने अपने सर्वज्ञ पति से तेरा सारा वृत्तान्त सुनाकर प्रति दिन तेरे पास आने की आज्ञा
ले ली है ॥२९॥
इसलिए तू भी अपने माता-पिता से आज्ञा लेकर मेरे यहाँ चलने की तैयारी कर। ऐसा
होने पर तू भी मेरे साथ स्वच्छन्दतापूर्वक भ्रमण कर सकेगी ॥३०॥
ऐसा कहती हुई सोमप्रभा कलिंगसेना का हाथ पकड़कर उसे अपने माता-पिता के पास
ले गई ॥३१॥
वहाँ जाकर उसने अपनी सहेली सोमप्रभा के नाम और कुल आदि का परिचय देते हुए
अपने माता-पिता को दिखलाया ॥३२॥
माता तारादत्ता को भी उसे दिखाया और वे दोनों कलिंगसेना के कथनानुसार सोमप्रभा
को देखकर प्रसन्न हुए ॥३३॥
सोमप्रभा की आकृति से प्रसन्न वे दोनों अत्यन्त स्नेह से सोमप्रभा का स्वागत-सत्कार
करके बोले—'बेटी ! इस कलिंगसेना को हमने तुम्हारे हाथ सौंप दिया है। अब तुम दोनों अपनी
इच्छानुसार खेलो' ॥३४-३५॥
उनके वचनों से प्रसन्न होकर सोमप्रभा और कलिंगसेना वहाँ से निकली ॥३६॥
तदनन्तर वह राजा द्वारा बनवाये गये विहार का विहार (सैर) करने चली और मायामय
यन्त्रों की डोलची भी लाई। वहाँ विहार में सोमप्रभा ने यन्त्र के बने यक्ष को बुद्ध की पूजा का
सामान लाने की आज्ञा दी। वह यन्त्र सोमप्रभा के आज्ञानुसार लम्बा रास्ता तय करके रत्न,
मोती और सोने के कमल आदि लेकर आ गया ॥३७-३९॥