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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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Page 722

षष्ठ लम्बक ६६९
घबराहट से मुस्कराती हुई कीर्तिसेना भी उस समय चुप रही। दूसरे दिन देवसेन वल्लभी
को चला गया ॥८४॥
उसके चले जाने के पश्चात् विरह-कष्ट से जर्जरित कीर्तिसेना की सास ने धीरे-धीरे उसकी
दासियों को निकाल दिया ॥८५॥
और, अपने घर की पुरानी दासी के साथ सलाह करके कीर्तिसेना को धोखे से कोठरी के
अन्दर घुसाकर नंगी कर दिया और बोली-॥८६॥
'पापिन ! मेरे लड़के को मुझसे अलग करती है-ऐसा कहकर, उसके केश पकड़कर
उस दासी की सहायता से लातों, घूसों, दाँतों और नखों से मारने, काटने और नोचने लगी ॥८७॥
और, उसे घर के उस तहखाने के अन्दर ढकेलकर बाहर से लकड़ी की दृढ़ अर्गला से बन्द
कर दिया जिस तहखाने से पूर्वजों का सारा संचित धन निकाल लिया गया था ॥८७॥
दिन बीतने पर मिट्टी के एक पात्र में आधा पात्र भात वह उस खाने के लिए दिया
करती थी ॥८८॥
उसे तहखाने में बन्द करके सास ने सोचा कि पति के दूर रहने पर यह इस प्रकार स्वयं
मर जायगी तो कुछ दिनों के बाद कहूँगी कि वह भाग गई ॥८९॥
इस प्रकार पापिन सास द्वारा तहखाने में बन्द की गई कीर्तिसेना सोचने लगी ॥९० ॥
'मेरा पति धनी है और मैं स्वयं अच्छे और ऊँचे कुल में उत्पन्न हुई सौभाग्यवती हूँ और
चरित्र भी शुद्ध है। फिर भी मुझे भाग के प्रभाव से ऐसी विपत्ति भोगनी पड़ रही है ॥९१॥
ठीक है कि परिवारवाले इसीलिए कन्या के जन्म की निन्दा करते हैं क्योंकि कन्या-
जीवन सास, ननद और विधवापन से दूषित हो जाता है' ॥ ९२॥
ऐसी सोचती हुई कीर्तिसेना को उस तहखाने में अकस्मात् एक खुरपी (भूमि खोदने का
औजार विशेष) मिल गई, मानो वह निकाला हुआ उसके हृदय का काँटा हो ॥ ९३॥
उस लोहे की खुरपी से वह तबतक सुरंग खोदती रही जबतक वह शान्त रहन के भवन
में न निकल गई ॥ ९४॥
तदनन्तर उस सुरंगद्वार से अपने कमरे में निकली हुई कीर्तिसेना ने वहाँ पल्लव के रचे हुए
दीपक के सहारे उस घर को देखा, मानो उसने अपने बढ़ते हुए धर्म से उस घर को आलोकित
कर दिया हो ॥९५॥
वहाँ से वह अपने वस्त्र और स्वर्णाभूषण आदि लेकर निशान्त (अत्यन्त प्रभात) में गुप्त
रूप से निकलकर नगर से बाहर चली गई ॥ ९६॥
'ऐसी स्थिति में मुझे पिता के घर न जाना चाहिए-लोग क्या कहेंगे और कौन विश्वास
करेंगे' ॥ ९७॥