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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

चतुर्थ लम्बक ४७७

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चतुर्थ लम्बक ४७७
वाद्यों के शब्द घरों से निकलकर आकाश में फैलने लगे मानों समस्त विद्याधरों को नवीन
राजा के जन्म लेने की सूचना दे रहे हों॥७७॥
ऊँचे-ऊँचे महलों पर फहराती हुई सात रंग की पताकाएँ मानां प्रसन्नता से आपस में
गुलाल उड़ा रही हों—ऐसी प्रतीत होती थी॥७८॥
घर-घर में प्रसन्नता से वेश्याओं के नाच-गान चल रहे थे। ऐसा लगता था मानों स्वर्ग
की सुन्दरियाँ प्रसन्नता से भूमि पर उतर आई हों॥७९॥
उत्सव के उपलक्ष में राजा द्वारा बाँटे गये एक समान वस्त्रों और आभूषणों से सारी नगरी
एक समान वैभवशाली मालूम होती थी॥८०॥
जब राजा ने उत्सव के उपलक्ष में अपने सेवकों को धन लुटाना प्रारंभ किया तब खजाने
के अतिरिक्त और कोई भी खाली न रहा॥८१॥
पुरुष ही नहीं स्त्रियाँ भी मंगलगान करती हुई रीति-रिवाजों को जाननेवाली नाचती
गाती और विविध प्रकार के उपहार हाथों में ली हुई अपने लड़कों के साथ-साथ रनिवास में
एकत्र हुईं, तो ऐसा लगता था मानों स्वर्ग की स्त्रियाँ प्रसन्नता से राजभवन में उतर
आई हों॥८२-८३॥
उस समय सभी की चेष्टाएँ नृत्यमयी सभी के वचन पूर्णपात्रमय सभी का व्यवहार
त्यागमय और सभी का स्वर वाद्यमय हो रहा था॥८४॥
आनन्दमयी उस नगरी में सभी जन अबीर-गुलालमय और सारी भूमि रुचियों से भरी
हुई थी॥८५॥
इस प्रकार अनेक दिनों तक चलता हुआ यह उत्सव नागरिकों के मनोरथ के समान
पूर्ण हुआ॥८६॥
आकाशवाणी के आज्ञानुसार पिता द्वारा दिये गये नरवाहनदत्त नामवाला वह राजकुमार
कुछ दिनों में ही प्रतिपदा के चन्द्रमा के समान क्रमशः बड़ा हुआ॥८७॥
चमकते चिकने और सुन्दर गलों की कान्तिवाले दो-चार निकलते हुए आगे के सुन्दर दाँतों-
वाले उस राजकुमार के मुँह से निकलते हुए कुछ अस्पष्ट और तुतले बोलों तथा लीलापूर्वक दो-चार
डग भरने की उसकी चालों को देखकर उसका पिता मन ही मन अत्यन्त प्रसन्नता अनुभव
करता था॥८८॥
इस प्रकार, उसके कुछ बड़े होने पर सभी मन्त्रियों ने हृदयों को आनन्द देनेवाले अपने-
अपने बालकों को सादर खेलने के लिए राजकुमार को सौंप दिया॥८९॥

४०८ कथासरित्सागर

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४०८ कथासरित्सागर
यौगन्धरायणः प्राङ्मरुभूतिं हरिशिखं रुमण्वानथ ।
गोमुखमित्येकनामा तपन्तकाख्यं वसन्तकश्च सुतम् ॥१९०॥
शान्तिकरोऽपि पुरोधा भ्रातृसुतं शान्तिसोममपरं च।
वैश्वानरमर्पितवान्पिङ्गलिकापुत्रकौ यमजौ ॥१९१॥
तस्मिन्क्षणे च नभसो निपपात दिव्या
नान्दीनिनादसुभगा सुरपुष्पवृष्टिः ।
राजा ननन्द च तथा महिषीसमेत-
सत्कृत्य तत्र सचिवात्मजमण्डल तद् ॥१९२॥
बाल्योऽपि तैरभिमतैश्च मन्त्रिपुत्रै
पञ्चभिस्तदेकनिरतैश्च स राजपुत्रः ।
युक्तः सदैव नरवाहनदत्त आसी-
द्युक्तो गुणैरिव महोदयहेतुभूतैः ॥१९३॥
तं च क्रीडाञ्चलितललिताम्यक्तनर्माभिलापं
यान्तं प्रीतिप्रवणमनसामङ्कतोऽङ्कं नृपाणाम्।
पुत्रं स्मेराननसरसिज सादरं पश्यतस्ते
सदानन्दाः किमपि दिवसा वत्सराजस्य जग्मुः ॥१९४॥
इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे
नरवाहनदत्तजनन लम्बके तृतीयस्तरङ्गः।
समाप्तश्चायं नरवाहनदत्तजनन लम्बकश्चतुर्थः।

चतुर्थ लम्बक ४७९

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चतुर्थ लम्बक ४७९
सबसे पहले यौगन्धरायण ने अपने पुत्र मरुभूति का इसी प्रकार क्रमशः रुमण्वान् ने हरि-
शिख को इत्यक (नित्यादित) ने गोमुख का वसन्तक ने तपन्तक का और पुरोहित शान्तिस्वर ने
अपने दोनों जुड़वाँ भतीजे शान्तिसोम और वैश्वानर नामक पिंगलिका के पुत्रों को लाकर
समर्पित कर दिया ॥९०-९१॥
उस समय सुन्दर मंगलवाद्यों के साथ आकाश से दिव्य पुष्पों की वृष्टि हुई और राजा
तथा रानी नवीन मन्त्रिमण्डल का सत्कार करके अत्यन्त आनन्दित हुए ॥९२॥
बाल्यकाल में उन छह अनन्य प्रेमी मन्त्रिपुत्रों के साथ युक्त वह राजकुमार नरवाहनदत्त
अभ्युदय के कारणभूत गुणों के समान शोभित हो रहा था ॥९३॥
अपनी विविध और सुन्दर बाल-क्रीड़ाओं से प्रेमपूर्ण हृदयवाले राजाओं की एक गोद से
दूसरी गोद में जाते हुए, एवं मुस्कुराते हुए उस राजकुमार के मुखकमल को देखते हुए वत्सराज
के दिन सानन्दपूर्वक व्यतीत होने लगे ॥९४॥
तृतीय तरंग समाप्त
महाकवि सोमदेवभट्ट-रचित कथासरित्सागर का नरवाहनदत्त-जनन नामक
चतुर्थ लम्बक समाप्त

चतुर्दारिका नाम पञ्चमो लम्बकः

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चतुर्दारिका नाम पञ्चमो लम्बकः
इद गुरुगिरीन्द्रजाप्रणयमन्वराम्बोलना
त्पुरा किल कथामृतं हरमुखाम्बुधेरुद्गतम्।
प्रसङ्ग रसयन्ति य विगतविघ्नलब्धद्धयो
धुरं दधति वैबुधीं भुवि भवप्रसादेन त ॥
प्रथमस्तरङ्गः
मदघूर्णितवक्त्रोत्थै सिन्दूरस्फुरयन् महीम्।
हेरम्ब पातु वो विघ्नान् स्वतेजोभिर्बहूत्क्षिपन् ॥१॥
एवं स देवीसहितस्तस्थौ वत्सेश्वरस्तदा।
नरवाहनदत्तं तमेकपुत्रं विवर्धयन् ॥२॥
तत्राशाकातरं तं च दृष्ट्वा राजानमेकदा।
यौगन्धरायणो मन्त्री विजनस्थितमब्रवीत् ॥३॥
राजन् राजपुत्रस्य कृते चिन्ता त्वयाधुना।
नरवाहनदत्तस्य विधातव्या कदाचन ॥४॥
असौ भगवता भावी भर्गेण हि भवद्गृहे।
सर्वविद्याधराधीशचक्रवर्ती विनिर्मितः ॥५॥
विद्याप्रभावावेक्षञ्च बुद्ध्वा विद्याधराधिपाः।
गताः पापेच्छया क्षोभं हन्तुंरमहिप्सवः ॥६॥
तद्विदित्वा च देवेन रक्षार्थं शशिमौलिना।
एतस्य स्तम्भको नाम गणेशः स्थापितो निजः ॥७॥
स च तिष्ठत्यदृश्यः सम् रक्षतेतं सुतं तव।
एतच्च क्षिप्रमभ्येत्य नारदो मे न्यवेदयत् ॥८॥
वत्सराजसभायां शशिनदैवस्यावगमनकथा
इति तस्मिन् वदत्येव मन्त्रिणि व्योममध्यतः।
किरीटी कुण्डली दिव्यः खड्गी चावातरत्पुमान् ॥९॥

चतुर्दारिका नामक पंचम लम्बक

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चतुर्दारिका नामक पंचम लम्बक
[मंगलश्लोक का अर्थ प्रथम लम्बक के प्रथम तरंग के प्रारम्भ में देखें ।]
प्रथम तरंग
वत्सराज की सभा में शक्तिवेग का आगमन
मद-मृषित मुख से छिटकते हुए सिन्दूर से सुशोभित मानों अपने तेज से विघ्नों को नष्ट
करते हुए और सिन्दूरी आभा से पृथ्वी को रंजित करते हुए गजानन आपकी रक्षा करें।।१।।
इस प्रकार उस एकमात्र कुमार नरवाहनदत्त का पालन-पोषण करता हुआ वत्सराज
उदयन महारानी वासवदत्ता के साथ सुखपूर्वक रहने लगा।।२।।
एकबार पुत्र की रक्षा के लिए व्याकुल राजा को देखकर मन्त्री यौगन्धरायण ने एकान्त
में राजा से कहा ।।३।।
'राजन्! तुम्हें राजकुमार नरवाहनदत्त के लिए अब किसी प्रकार की चिन्ता नहीं
करनी चाहिए।।४।।
इस राजकुमार का भगवान् शिव ने होनेवाले विद्याधरों के चक्रवर्ती के रूप में तुम्हारे
घर में उत्पन्न किया है।।५।।
विद्याधरों के राजा अपनी विद्याओं के प्रभाव से इस बात को जानकर ईर्ष्या (जलन)
के कारण अत्यन्त क्षुब्ध हो गये हैं ।।६।।
इस बात को जानकर शिवजी ने उसकी रक्षा के लिए अपने स्तम्भक नामक गणों के सरदार
को नियुक्त किया है।।७।।
वह हमेशा इस तुम्हारे बालक की रक्षा करता हुआ अप्रत्यक्ष रूप से यहाँ निवास
करता है। यह बात नारदमुनि ने शीघ्र ही आकर मुझसे कही है ॥८॥
जब मन्त्री यौगन्धरायण यह बात राजा से कह रहा था कि उसी समय किरीट और कुंडल
धारण कर और हाथ में खड्ग लिये हुए एक दिव्य पुरुष आकाश से उतरा ।।९।।
९१

४८२ कथासरित्सागर

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४८२ कथासरित्सागर

प्रणतं कल्पितातिथ्यं क्रमाद् वत्सेश्वरोऽथ तम्।
कस्त्वं किमिह ते कार्यमित्यपृच्छत् सकौतुकम् ॥११०॥
सोऽप्यवादीदहं मर्त्यो भूत्वा विद्याधराधिपः।
सम्पन्नः शक्तिवेगाख्यः प्रभूताश्च ममारयः ॥१११॥
सोऽहं प्रभावाद् विज्ञाय भाव्यस्मच्चक्रवर्तिनम्।
भवतस्तनयं द्रष्टुमागतोऽस्म्यवनीपते ॥११२॥
इत्युक्तवन्तं तं दृष्ट्वा भाव्यञ्चक्रवर्तिनम्।
प्रीतः वत्सेश्वरो हृष्टः पुनः पप्रच्छ विस्मयात् ॥११३॥
विद्याधरत्वं प्राप्येत कथं कीदृग्विधं च तत्।
त्वया च सत्कथं प्राप्तमेतत् कथय नः सखे ! ॥११४॥
तच्छ्रुत्वा वचनं राज्ञः स तदा विनयानतः।
विद्याधरः शक्तिवेगस्तमेवं प्रत्यबोधत ॥११५॥
राजन्निहैव पूर्वे वा जन्मन्याराध्य शङ्करम्।
विद्याधरपदं धीरा लभन्ते तदनुग्रहात् ॥११६॥
तच्चानेकविधं विद्याखड्गमालादिसाधनम्।
मया च तद्यथा प्राप्तं वक्ष्यामि तथा शृणु ॥११७॥
एवमुक्त्वा स्वसम्बद्धां शक्तिवेगः स सन्निधौ।
देव्या वासवदत्तायाः कथामाख्यातवानिमाम् ॥११८॥

कनकपुरी शक्तिवेगयोः कथा

अभवद् वर्धमानाख्यं पुरं भूचक्रभूषणम्।
नाम्ना परोपकारीति पुरा राजा परन्तपः ॥११९॥
तस्याप्रतिमरूपाभून्महिषी कनकप्रभा।
त्रिदिवादागतेवेव सा तु निर्मुक्तशापना ॥१२०॥
तस्यां तस्य च कालेन श्यामाजायत कन्यका।
रूपेणोपेक्ष्यान्येव या रूप्या धातृव निर्मिता ॥१२१॥
अवर्धत शनैः सा च शारदाभ्रगता यथा।
पित्रा कनकलेखेति यथार्थाख्या कृतात्मजा ॥१२२॥
अथ सा यौवनं प्राप्ता दृष्ट्वा राजा स विस्मितः।
विस्मेरो रागिणां देव्या जगाद कनकप्रभाम् ॥१२३॥

पंचम लम्बक ४८१

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पंचम लम्बक ४८१
प्रणाम करके आतिथ्य सत्कार किये गये उस पुरुष को वत्सराज उदयन ने उत्सुकता से
पूछा कि 'तुम कौन हो ? और 'तुम्हारा यहाँ क्या कार्य है। अर्थात् किसलिए आय हो' ॥११ ॥
उसने कहा मैं मनुष्य होकर भी शक्तिवेग नाम से विद्याधरों का राजा बन गया।
अतः मेरे बहुत शत्रु हैं ॥१२॥
इसलिए हे राजन् ! मैं अपनी विद्या के प्रभाव से यह जानकर कि तुम्हारा पुत्र भविष्य
में हम विद्याधरों का चक्रवर्ती होगा इसलिए उसे देखने के लिए आया हूँ ॥१२॥
ऐसा कहकर भावी विद्याधर चक्रवर्ती का दर्शन कर प्रसन्न शक्तिवेग ने राजा से आश्चर्य
के साथ पूछा—॥१३॥
'मित्र ! विद्याधरत्व कैसे प्राप्त होता है। वह कैसा होता है और तुमने विद्याधरत्व
को कैसे प्राप्त किया'। यह सब मुझसे कहो ॥१४॥
राजा की बातें सुनकर विनय से नम्र शक्तिवेग नामक विद्याधर बोला ॥१५॥
'राजन् ! इस जन्म में या अगले जन्म में शिवजी की आराधना करने पर धैर्यशाली
व्यक्ति उनकी कृपा से विद्याधर-पद को प्राप्त होता है ॥१६॥
वह विद्याधर-पद, अनेक प्रकार का होता है जो विद्या खड्ग या माला आदि की सिद्धि
द्वारा प्राप्त होता है। मैंने उसे जिस प्रकार पाया कहता हूँ सुनो ॥१७॥
ऐसा कहकर शक्तिवेग ने महारानी वासवदत्ता के समक्ष राजा से अपनी कथा कहनी
प्रारम्भ की ॥१८॥
कनकपुरी और शक्तिवेग की कथा
प्राचीन काल में वर्धमान¹ नाम का नगर था जो भूतल का भूषण था। उस नगर
में परोपकारी नामक वीर राजा हुआ ॥१९॥
उस उन्नतिशील राजा की महारानी मेघ की रानी विद्युत् के समान 'कनकप्रभा' नाम
की थी। वह चंचलता से रहित अर्थात् अति गंभीर थी ॥२० ॥
कुछ समय के पश्चात् उस राजा को रानी कनकप्रभा के गर्भ से एक कन्या उत्पन्न हुई,
जो विधाता ने मानों लक्ष्मी के रूप का अभिमान नष्ट करने के लिए निर्मित की थी ॥२१॥
लोकों की आँखों के लिए चाँदनी के समान वह राजकुमारी धीरे-धीरे बढ़ने लगी।
पिता ने माता के ही नाम पर उसका नाम कनकरेखा रख दिया ॥२२॥
कन्या के युवती होने पर एक बार राजा ने एकान्त में आई हुई महारानी कनकप्रभा से
कहा—॥२३॥
१ बंगाल का प्रसिद्ध वर्द्धमान (वर्धमान) नगर।

४८४ कथासरित्सागर

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४८४ कथासरित्सागर
वर्धमाना सहैवैतत्समानोद्वाहचिन्तया।
एषा कनकरेखा मे हृदयं देवि बाधते ॥२४॥
स्थानप्राप्तिविहीना हि गीतिवत् कुलकन्यका।
उद्वेजिनी परस्यापि श्रूयमाणव कणयो ॥२५॥
विद्येव कन्यका मोहादपात्रे प्रतिपादिता।
यशसे न न धर्माय जातानुशयाय तु ॥२६॥
सत्कस्मै दीयतां ह्येषा मया नृपतये सुता।
कोऽस्याः समः स्यादिति मे चिन्ता देवि १ गरीयसी ॥२७॥
तच्छ्रुत्वा सा विहस्यैव बभाषे कनकप्रभा।
स्वमेवमात्थ कन्या तु नेच्छत्युद्वाहमेव सा ॥२८॥
अद्यैव मर्मणा सा हि कृतकृत्रिमपुत्रका।
वत्स कदा विवाहं ते द्रक्ष्यामीत्युदिता मया ॥२९॥
सा तच्छ्रुत्वैव साक्षेपमथ मां प्रत्यभाषत।
मा मवमम्ब दातव्या नैव कस्मैचिदप्यहम् ॥३०॥
मद्वियोगो न भविता कन्यावास्मि सुशोभना।
अन्यथा मां मृतां विद्धि किञ्चिदस्त्यत्र कारणम् ॥३१॥
एवं तयोक्ता त्वत्पार्श्वं राजन् विग्नाहमागता ।
तन्निषिद्धविवाहायाः का वरस्य विचारणा ॥३२॥
इति राज्ञीमुखाच्छ्रुत्वा समुद्विग्नोऽथ स नृपतिः।
कन्याकान्तःपुरं गत्वा तामभाषीत्तदा सुताम् ॥३३॥
प्रार्थयन्तेऽपि तपसा यं सुरासुरकन्यकाः।
प्रसूंस्तथा कथं वत्से स निषिद्धः किल त्वया ॥३४॥
एतत्पितुर्वचः श्रुत्वा भूतलन्यस्तलोचना।
तदा कनकरेखा सा निजगाद नृपात्मजा ॥३५॥
तात नैवेप्सितस्तावद् विवाहो मम साम्प्रतम्।
ततातस्यापि किं तन कार्यं यश्चात्र वो ग्रहः ॥३६॥
इत्युक्तः स तया राजा पृष्ट्वा धीमतां वरः।
परोपकारी च पुनरेवमेतामभाषत ॥३७॥
१ व्याकुला।

पंचम लम्बक ४८९

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पंचम लम्बक ४८९
'यह कन्या कनकरेखा विवाह की चिन्ता के साथ समान रूप से बढ़ती हुई मेरे हृदय को
व्यथित कर रही है॥२४॥
समुचित स्थान से भ्रष्ट गीति (गान) के समान कन्या पराये व्यक्ति के भी कानों में
उद्वेग उत्पन्न करती है॥२५॥
अज्ञान से कुपात्र में दी हुई विद्या के समान कुपात्र को दी हुई कन्या न यश के लिए
होती है, न धर्म के लिए ही प्रत्युत पश्चात्ताप के लिए होती है॥२६॥
अतः मैं इस कन्या को किस राजा के लिए दूँ। इसके योग्य वर कौन होगा यह मेरे
हृदय में भारी चिन्ता हो रही है' ॥२७॥
यह सुनकर महारानी कनकप्रभा हँसकर राजा से बोली कि 'आप तो इस प्रकार
चिन्तित हैं किन्तु वह कनकरेखा तो विवाह ही नहीं करना चाहती' ॥२८॥
'आज ही खेल में गुड़िया बनाती हुई उससे मैंने कहा कि 'मैं तुम्हारा विवाह कब
देखूँगी' ॥२९॥
मेरे ऐसा प्रश्न करते ही उसने रोष के साथ मुझसे कहा 'माँ ऐसा मत कहो ऐसा
मत कहो मुझे किसी के लिए भी न दो॥३०॥
तुम्हारे साथ मेरा वियोग न होगा। मैं अविवाहित ही ठीक हूँ। यदि तुमने मेरा विवाह
किया तो मुझे मरी ही समझो। इसमें कुछ कारण है'॥३१॥
यह सुनकर व्याकुल मैं तुम्हारे पास आई हूँ। विवाह न करनेवाली कन्या के लिए
वर का शोधना ही व्यर्थ है॥३२॥
रानी के मुख से ऐसा सुनकर घबराया हुआ राजा कन्या के भवन में जाकर उससे
बोला—'बेटी जिस पति की प्राप्ति के लिए देवताओं और दैत्यों की कन्याएँ तपस्या करके
भगवान् से प्रार्थना करती हैं उसे तू ने मना कर दिया ॥३३ ३४॥
पिता की बातें सुनकर भूमि पर दृष्टि गड़ाए हुई राजकुमारी कनकरेखा
बोली—॥३५॥
'पिताजी मुझे विवाह की चाह नहीं है तो इसमें आपको इतना आग्रह क्यों है ? ॥३६॥
पुत्री के इस प्रकार कहने पर बुद्धिमान् और परोपकारी राजा इस तरह
कहने लगा—बेटी कन्यादान के बिना गृहस्थ की फलप्राप्ति के लिए दूसरा कौनसा
उपाय है ? ॥३७॥

४८४ कथासरित्सागर

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४८४ कथासरित्सागर
वर्धमाना सहैवैतत् समानोद्वाहचिन्तया।
एषा कनकरेखा मे हृदयं देवि बाधते ॥२४॥
स्थानप्राप्तिविहीना हि गीतिवत् कुलकन्यका।
उद्वेगिनी परस्यापि श्रूयमाणैव कर्णयोः ॥२५॥
विद्येव कन्यका मोहादपात्रे प्रतिपादिता।
यशसे न न धर्माय जातानुशयाय तु ॥२६॥
तत्कस्मै दीयते ह्येषा मया नृपतम सुता।
योऽस्याः सम स्यादिति मे चिन्ता देवि ! गरीयसी ॥२७॥
तच्छ्रुत्वा सा विहस्यैव बभाषे कनकप्रभा।
त्वमेवमात्थ कन्या तु नेच्छत्युद्वाहमेव सा ॥२८॥
अद्यैव नर्मणा सा हि कृतकृत्रिमपुत्रका।
वत्से कदा विवाहं ते द्रक्ष्यामीत्युदिता मया ॥२९॥
सा तच्छ्रुत्वैव साक्षेपमेव मां प्रत्यबोधत।
मा मैवमम्ब दातव्या नैव कस्मैचिदप्यहम् ॥३०॥
मद्वियोगो न चादिष्टः कस्यचास्मि सुशोभना।
अन्यथा मां मृतां विद्धि किञ्चिदस्त्यत्र कारणम् ॥३१॥
एव तयोक्ता त्वत्पार्श्वं राजन् विग्नाहमागता ।
सन्निषिद्धविवाहायाः का वरस्य विचारणा ॥३२॥
इति राज्ञीमुखाच्छ्रुत्वा समुद्भ्रान्तः स नृपतिः।
कन्यकान्तः पुरं गत्वा तामवादीत्तदा सुताम् ॥३३॥
प्रार्थ्यन्तेऽपि तपसा यं सुरासुरकन्यकाः।
भर्तृकामः कथं वत्से स निषिद्धः किल त्वया ॥३४॥
एतत्पितुर्वचः श्रुत्वा भूतलन्यस्तलोचना।
तदा कनकरेखा सा निजगाद नृपात्मजा ॥३५॥
तात नैवेप्सितस्तावद् विवाहो मम साम्प्रतम्।
तत्तादृश्यापि किं तेन कार्यं कश्चात्र वो ग्रहः ॥३६॥
इत्युक्तः स तया राजा दुहित्रा धीमतां वरः।
परोपकारी स पुनरेवमेतामभाषत ॥३७॥


१ प्याश्रुत्वा।

पंचम लम्बक ४८९

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पंचम लम्बक ४८९
"यह कन्या कनकरेखा विवाह की चिन्ता के साथ समान रूप से बढ़ती हुई मेरे हृदय को
व्यथित कर रही है॥२४॥
समुचित स्थान से भ्रष्ट मोति(मान) के समान कन्या पराये व्यक्ति के भी कानों में
उद्वेग उत्पन्न करती है॥२५॥
अज्ञान से कुपात्र में दी हुई विद्या के समान कुपात्र को दी हुई कन्या न यश के लिए
होती है, न धर्म के लिए ही, प्रत्युत पश्चात्ताप के लिए होती है॥२६॥
अतः मैं इस कन्या को किस राजा के लिए दूँ। इसके योग्य वर कौन होगा यह मेरे
हृदय में भारी चिन्ता हो रही है" ॥२७॥
यह सुनकर महारानी कनकप्रभा हँसकर राजा से बोली कि 'आप तो इस प्रकार
चिन्तित हैं किन्तु वह कनकरेखा तो विवाह ही नहीं करना चाहती' ॥२८॥
आज ही खेल में गुड़िया बनाती हुई उससे मैंने कहा कि 'मैं तुम्हारा विवाह कर
दूँगी' ॥२९॥
मेरे ऐसा प्रश्न करते ही उसने भय के साथ मुझसे कहा 'माँ ऐसा मत कहो ऐसा
मत कहो, मुझे किसी के लिए भी न दो॥३०॥
तुम्हारे साथ मेरा वियोग न होगा। मैं अविवाहित ही ठीक हूँ। यदि तुमने मेरा विवाह
किया तो मुझे मरी ही समझो। इसमें कुछ कारण है' ॥३१॥
यह सुनकर व्याकुल मैं तुम्हारे पास आई हूँ। विवाह न करनेवाली कन्या के लिए
वर का सोचना ही व्यर्थ है॥३२॥
रानी के मुख से ऐसा सुनकर घबराया हुआ राजा कन्या के भवन में जाकर उससे
बोला—'बेटी जिस पति की प्राप्ति के लिए देवमाता और दैत्यों की कन्याएँ तपस्या करके
भगवान् से प्रार्थना करती हैं, उसे तू ने मना कर दिया' ॥३३-३४॥
पिता की बातें सुनकर भूमि पर दृष्टि गड़ाए हुई राजकुमारी कनकरेखा
बोली—॥३५॥
'पिताजी जब विवाह की चाह नहीं है तो इसके कारण इतना आग्रह क्यों है? ॥३६॥
पुत्री के इस प्रकार कहने पर बुद्धिमान् और परोपकारी राजा इस तरह
कहने लगा—'बेटी कन्यादान के बिना पुरुष की पारशान्ति के लिए दूसरा कौनसा
उपाय है?' ॥३७॥

४८६ कथासरित्सागर

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४८६ कथासरित्सागर

० यादानादृते पुत्रि ! किं स्यात् किल्बषशान्तये ।
न च बन्धुपराधीना कन्या स्वातन्त्र्यमर्हति ॥३८॥
जातैव हि परस्यार्थे कन्यका नाम रक्ष्यते ।
बाल्यावृते विना भर्त्तृ कीदृक्तम्या पितुर्गृहम् ॥३९॥
ऋतुमत्य हि कन्यायां बान्धवा मान्त्यधोगतिम् ।
वृषली' सा वरश्यास्या वृषलीपति रुच्यते ॥४०॥
इति तेनोदिता पित्रा राजपुत्री मनोगताम् ।
वाचं कनकरेखा सा तत्क्षण ममुवरयत् ॥४१॥
यद्येव तात तद्येन विप्रेण क्षत्रियेण वा ।
दृष्टा कनकपुर्याख्या नगरी कृतिना किर ॥४२॥
तस्म त्वयाहं दातव्या स मे भर्त्ता भविष्यति ।
नान्यथा तात मिथ्यैव कर्त्तव्या मे कवर्षना ॥४३॥
एव तयोक्ते सुतया स राजा समचिन्तयत् ।
विष्टमोद्वाहस्य तसावत् प्रसङ्गोऽङ्गीकृतोऽनया ॥४४॥
नूनं च कारणोत्पन्ना देवीय कापि मवगृहे ।
इतरकथं विजानाति बाला भूत्वान्यथा दृसौ ॥४५॥
इति सञ्चिन्त्य तत्कालं तमत्युक्त्वा च तां सुताम् ।
उत्थाय विनवस्तंभ्य स चकार महीपति ॥४६॥
अन्यद्युरास्थानगतो जगाद स च पार्श्वगान् ।
दृष्टा कनकपुर्याख्या पुरी युष्मासु केनचित् ॥४७॥
येन दृष्टा च सा तस्मै विप्राय क्षत्रियाय वा ।
मया कनकरेखा च यौवराज्यं च दीयते ॥४८॥
श्रुतापि नैव सास्माभिर्दर्शने वेव का कथा ।
इति ते चावदन् सर्वे अन्योन्याननदर्शिन ॥४९॥
ततो राजा प्रतीहारमानीयाविशति स्म सः ।
गच्छ भ्रमय कुरम्मेऽथ पुरं पटहघोपणाम् ॥५०॥
जानीहि यदि केनापि दृष्टा सा नगरी न वा ।
इत्यादिष्ट प्रतीहार स तद्यति विनिर्ययौ ॥५१॥


१ शूद्री।

पंचम लम्बक ४८७

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पंचम लम्बक ४८७
माता पिता और बन्धु (भाई) से पराधीन कन्या स्वतन्त्र नहीं रह सकती ॥४१॥
कन्या उत्पन्न होते ही दूसरे के लिए पालित पोषित और रक्षित की जाती है। बाल्या-
वस्था के अनन्तर पति के बिना पिता के घर पर कन्या का जीवन क्या है? अर्थात् कुछ
नहीं ॥४२॥
पितृगृह में कन्या के ऋतुमती होने पर उसके बन्धु-बान्धव अधोगति को प्राप्त
होते हैं। वह कन्या वृषली' हो जाती है और उसके पति को वृषलीपति कहा जाता है ॥४३॥
राजा के इस प्रकार कहने पर वह कनकरेखा अपने मन की बात राजा से
कही—॥४३॥
'पिता यदि ऐसी बात है तो जिस वीर ब्राह्मण या क्षत्रिय ने कनकपुरी नाम की नगरी
देखी हो, उसे आप मुझे दे दीजिए और वही मेरा पति होगा। अन्यथा व्यर्थ में आप मेरी
दुश्चिन्ता न करें' ॥४३४॥
कन्या के ऐसा कहने पर राजा ने सोचा भला भाग्य से इस कन्या ने विवाह करना तो
स्वीकार किया ॥४४॥
अवश्य ही किसी कारण से मेरे घर में यह कोई देवी उत्पन्न हुई है। अन्यथा यह छोटी
कन्या होकर भी यह सब कैसे जानती है ॥४५॥
उस समय ऐसा सोचकर और उसकी बात स्वीकार करके राजा उठकर चला गया और
अपने दैनिक कार्य में व्यस्त हो गया ॥४६॥
दूसरे ही दिन दरबार में बैठकर राजा ने दरबारियों से कहा—'क्या आप लोगों में से
किसी ने कनकपुरी नाम की नगरी देखी है ? ॥४७॥
जिसने देखी हो वह ब्राह्मण हो या क्षत्रिय उसे अपनी कन्या कनकरेखा और उसके
साथ युवराज-पद प्रदान करूँगा ॥४८॥
परस्पर एक दूसरे का मुख देखते हुए सभासदों ने कहा— महाराज उसे देखने की बात
कौन कहे, हमलोगों ने यह नाम तक सुना नहीं ॥४९॥
तब राजा ने प्रतिहार को यह आज्ञा दी कि— जाओ इस नगर में ढिंढोरा पीटकर घोषणा
कर दो कि किसी ने कनकपुरी देखी है या नहीं? और तुम इस बात का पता
लगाओ ॥५०॥
राजा से आज्ञा पाकर प्रतिहार 'जो आज्ञा' कहकर चला गया ॥५१॥
१ वृषली—शूद्र जाति की स्त्री—शङ्ख।

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पंचम लम्बकः ४८९

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पंचम लम्बकः ४८९
और लौटकर उसने राजकर्मचारियों को आदेश दिया कि वे नगर में सुनाने के लिए
आश्चर्यजनक इस घोषणा का डिंडिम-घोष के साथ कर दें ॥५२॥
'कोई भी ब्राह्मण या क्षत्रिययुवक जिसने कनकपुरी नाम की नगरी देखी हो, वह राज-
दरबार में उपस्थित हो जाय राजा उसे अपनी कन्या और युवराज-पद देना ही देंगे' ॥५३॥
सारे नगर में व्यापक रूप से आश्चर्यजनक यह घोषणा होने लगी ॥५४॥
आज कनकपुरी की यह क्या घोषणा की जा रही है, जो हम वृद्धों ने भी कभी न देखी और
सुनी ॥५५॥
नगर-निवासी वृद्धजन इस घोषणा को सुनकर परस्पर इस प्रकार वार्तालाप करने लगे।
नगर में एक भी व्यक्ति यह नहीं कह सका कि मैंने वह कनकपुरी देखी है ॥५६॥
इतने में ही उस नगर-निवासी बलदेव के पुत्र शक्तिदेव ने भी यह घोषणा सुनी ॥५७॥
वह व्यसनी युवक उस समय जूए में दरिद्र हो चुका था। वह राजकुमारी की प्राप्ति
के समाचार से उत्साहित होकर सोचने लगा ॥५८॥
मैं जूए में सब कुछ हार चुका हूँ अतः अब मैं पिता के घर में प्रवेश नहीं पा सकता और
न वेश्या के घर में ही जाकर रह सकता हूँ ॥५९॥
इसलिए अब मैं कहीं का भी न रहा अतः अब अवसर है कि मैं झूठ बोलूँ कि मैंने वह
नगरी देखी है ॥६०॥
मुझे झूठा कौन समझेगा। वह नगरी किसने देखी है। अतः सम्भव है, राजकुमारी से
मेरा समागम होजाय ॥६१॥
ऐसा सोचकर उसने राजपुरुषों के समीप जाकर झूठ कह दिया कि मैंने कनकपुरी नगरी
देखी है ॥६२॥
तब उन्होंने कहा—आओ द्वारपाल उसके पास चलें। उनके ऐसा कहने पर उनके
साथ वह द्वारपाल के पास गया ॥६३॥
घोषणा करनेवालों ने कहा कि 'इसने कनकपुरी देखी है'। यह सुनकर द्वारपाल उस
स्वागत-सत्कार के साथ राजा के पास ले गया ॥६४॥
राजा के सम्मुख उपस्थित होकर भी उस धूर्त जुआरी ने ऐसे ही मिथ्या भाषण किया।
सच है, द्यूत में हारे हुए धूर्त जुआरी के लिए कौनसा कार्य दुष्कर है ॥६५॥
१२

४८८ कथासरित्सागर

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४८८ कथासरित्सागर

निर्गत्य च समादिश्य तत्क्षणं राजपूरुषान् ।
भ्रामयामास पटहं कृतश्रवणकौतुकम् ॥५२॥
विप्रः क्षत्रयुवा वा कनकपुरी योऽत्र दृष्टवाश्नगरीम् ।
वदतु स तस्मै राजा ददाति तनयां च यौवराज्यं च ॥५३॥
इति श्रुतस्ततस्तन्नगरं दत्तविस्मयम् ।
उदघोष्यत सर्वत्र पटहानन्तरं बुधैः ॥५४॥
केयं पुरेऽस्मिन्कनकपुरीनामाद्य घोष्यत ।
या वृद्धैरपि नास्माभिदृष्टा जातु न च श्रुता ॥५५॥
इत्येव धावन्पौराः श्रुत्वा सो तंन घोषणाम् ।
न पुन कश्चिदेकोऽपि मया दृष्टेत्यभाषत ॥५६॥
तावच्च तन्निवास्त्येकः शक्तिदेव इति द्विजः।
बसुदेवतनुजस्तामश्रृणोत्तत्र घोषणाम् ॥५७॥
स युवा व्यसनी सद्यो द्यूतेन विवनीकृतः ।
अचिन्तयद्राजसुताप्राथनाकर्णनोन्मनाः ॥५८॥
द्यूतहारितनिश्शेषवित्तस्य मम नाधुना ।
प्रवेशोऽस्ति पितुर्गेहे नापि पण्याङ्गनागृहे ॥५९॥
तस्मादगतिकस्तावद् वरं मिथ्या ब्रवीम्यहम् ।
मया सा नगरी दृष्टेत्येव पटहघोषकान् ॥६०॥
को मां प्रत्येष्यभिज्ञानं केन दृष्टा कदा हि सा ।
स्यादेव च कदाचिन्मे राजपुत्र्या समागमः ॥ ६१॥
इति सञ्चिन्त्य गत्वा तान् स राजपुरुषांस्तदा ।
शक्तिदेवो मया दृष्टा सा पुरीत्यबवन्मृषा ॥६२॥
विष्टया तर्हि प्रतीहारपार्श्वमेहीहि सत्वरम् ।
उक्तस्तद्भूभिश्च तैः साकं स प्रतीहारमभ्यगात् ॥६३॥
तस्मै तथैव प्राशंसत्त्तुरीदर्शनं मृषा ।
तेनापि सस्कृत्य ततो राजात्तिकमनीयत ॥६४॥
राजाग्रेऽप्यविकत्थ्य सन्तथैव च तदब्रवीत् ।
द्यूतदान्तस्य किं नाम कितबस्य हि दुष्करम् ॥६५॥

पञ्चम लम्बक ४८९

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पञ्चम लम्बक ४८९
और लौटकर उसने राजकर्मचारियों को आदेश दिया कि वे नगर में सुनने के लिए
आश्चर्यजनक इस घोषणा को डिंडिम-घोष के साथ कर दें ॥५२॥
'कोई भी ब्राह्मण या क्षत्रिययुवक जिसने कनकपुरी नाम की नगरी देखी हो, वह राज-
दरबार में उपस्थित हो जाय, राजा उसे अपनी कन्या और युवराज-पद दोनों ही देंगे' ॥५३॥
सारे नगर में व्यापक रूप से आश्चर्यजनक यह घोषणा होने लगी ॥५४॥
'आज कनकपुरी की यह क्या घोषणा की जा रही है, जो हम बूढ़ों ने भी कभी न देखी और
सुनी' ॥५५॥
नगर-निवासी वृद्धजन इस घोषणा को सुनकर परस्पर इस प्रकार वार्तालाप करने लगे।
नगर में एक भी व्यक्ति यह नहीं कह सका कि मैंने वह कनकपुरी देखी है ॥५६॥
इतने में ही उस नगर-निवासी वसुदेव के पुत्र शक्तिदेव ने भी यह घोषणा सुनी ॥५७॥
वह व्यसनी युवक उस समय जुए म दरिद्र हो चुका था। वह राजकुमारी की प्राप्ति
के समाचार से उत्साहित होकर सोचने लगा ॥५८॥
'मैं जुए में सब कुछ हार चुका हूँ, अतः अब मैं पिता के घर में प्रवेश नहीं पा सकता और
न वेश्या के घर में ही जाकर रह सकता हूँ ॥५९॥
इसलिए जब मैं कहीं का भी न रहा, अतः अब अवसर है कि मैं झूठ बोलूँ कि मैंने यह
नगरी देखी है ॥६०॥
मुझे झूठा कौन समझेगा। वह नगरी किसने देखी है। अतः सम्भव है राजकुमारी से
मेरा समागम हो जाय ॥६१॥
ऐसा सोचकर उसने राजपुरुषों के समीप जाकर झूठ कह दिया कि मैंने कनकपुरी नगरी
देखी है ॥६२॥
तब उन्होंने कहा—'आओ द्वारपाल उसके पास चलें'। उनके ऐसा कहने पर उनके
साथ वह द्वारपाल के पास गया ॥६३॥
घोषणा करनेवालों ने कहा कि 'इसने कनकपुरी देखी है'। यह सुनकर द्वारपाल उसे
स्वागत-सत्कार के साथ राजा के पास ले गया ॥६४॥
राजा के सम्मुख उपस्थित होकर भी उस धूर्त जुआरी ने ऐसे ही मिथ्या भाषण किया।
सच है, जुए में हारे हुए धूर्त जुआरी के लिए कौन-सा कार्य दुष्कर है ॥६५॥
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४९ कथासरित्सागर

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४९ कथासरित्सागर

राजापि निश्चय ज्ञात्वा ब्राह्मणं स विसृष्टवान्।
तस्याः कनकरेखाया दुहितुर्निकटं तदा॥६६॥
तया च स प्रतीहारमुखाज्ज्ञात्वाऽन्तिकागतः।
कञ्चित्त्वया सा कनकपुरी दृष्टेत्यपृच्छ्यत॥६७॥
बाढं मया सा नगरी दृष्टा विद्याथिना सता।
भ्रमता भुवमित्येवं सोऽपि तां प्रत्यभाषत॥६८॥
केन मार्गेण तत्र त्वं गतवान् कीदृशी च सा।
इति भूयस्तया पृष्टः स विप्रोऽप्येवमब्रवीत्॥६९॥
इतो हस्तिपुरं नाम नगरं गतवानहम्।
ततोऽपि प्राप्तवानस्मि पुरीं वाराणसीं क्रमात्॥७०॥
वाराणस्याश्च विवर्द्धनगरं पौण्ड्रवर्धनम्।
तस्मात् कनकपुर्याख्यां नगरीं तां गतोऽभवम्॥७१॥
दृष्टा मया च साभोगभूमिः सुकृतकर्मणाम्।
अनिमेषैक्षणस्वाद्यशोभा शक्रपुरी यथा॥७२॥
तत्राधिगतविद्यश्च कालनाहमिहागमम्।
इति तनास्मि गतवान् यथा सापि पुरीदृशी॥७३॥
एवं विरचितोक्तौ च धूर्ते तस्मिन्द्द्विजन्मनि।
शक्तिदेवे महासं सा व्याजहार नृपात्मजा॥७४॥
अहो सत्यं महाब्राह्मण् दृष्टा सा नगरी त्वया।
ब्रूहि ब्रूहि पुनस्तावत्केनासि गतवान् पथा॥७५॥
तच्छ्रुत्वा स यथा चाद्यं शक्तिदेवोऽकरोत् पुनः।
तदा तं राजपुत्री सा चटीभिर्निरवासयत्॥७६॥
निर्वासिते ययौ चास्मिन्पितुः पार्श्वं तदब सा।
किं सत्यमाह विप्रोऽसाविति पित्राप्यपृच्छ्यत॥७७॥
ततश्च सा राजसुता जगाद निजगाद तम्।
तात राजापि भूत्वा त्वमविचार्येव चेष्टसे॥७८॥
किं न जानासि धूर्ता यद् वञ्चयन्त जनान्बहून्।
स हि मिथ्यैव विप्रो मां प्रतारयितुमीहते॥७९॥
न पुनर्नगरी तेन दृष्टा सालोकवादिना।
धूर्तेरनाकाशादद्य म्रियन्ते भुवि वञ्चनाः॥८०॥

पंचम लम्बक ४९१

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पंचम लम्बक ४९१
राजा ने भी उसकी सत्यता जाँचने के लिए उसे राजकुमारी के पास भेज दिया ॥६६॥
राजकन्या ने द्वारपाल से समाचार सुनकर पास आये हुए उस ब्राह्मण से पूछा 'क्या
तुमने कनकपुरी देखी है ? ॥६७॥
उसने स्वीकार करते हुए कहा कि विद्यार्थी-अवस्था में घूमते हुए उस नगरी को मैंने
देखा था॥६८॥
'किस प्रकार तुम वहाँ गये थे और वह कैसी नगरी है? राजकुमारी के पुनः इस प्रकार
पूछने पर उस ब्राह्मण ने इस प्रकार कहा॥६९॥
यहाँ से मैं हरपुर नामक नगर में गया और वहाँ से चलकर क्रमशः वाराणसी पहुँचा ॥७०॥
वाराणसी से चलकर मैं पौण्ड्रवर्धन नामक नगर में पहुँचा और उसके पश्चात् मैं उस
कनकपुरी नगरी में पहुँचा ॥७१॥
पुण्यात्माओं के लिए इन्द्रपुरी के समान वह भोगभूमि है। उसकी शोभा अपलक नेत्रों
से देखने योग्य है॥७२॥
वहाँ विद्या प्राप्त कर कुछ समय पश्चात् मैं यहाँ आ गया ! इस प्रकार इस मार्ग से
मैं गया और वह ऐसी नगरी है' ॥७३॥
उस धूर्त ब्राह्मण शक्तिदेव की इस प्रकार की बनावटी बातों को सुनकर राजकन्या
मुस्कराती हुई बोली—'हे ब्राह्मण ! यह सत्य है कि तुमने वह नगरी देखी। किन्तु यह तो
बताओ कि तुम उस नगरी में किस मार्ग से गये थे फिर से एक बार बताओ' ॥७४-७५॥
राजकुमारी के इस प्रकार पूछने पर जब शक्तिदेव पुनः धृष्टता करने पर उतारू हुआ
तब राजकुमारी ने दासियों से कहकर उसे बाहर निकलवा दिया ॥७६॥
उसके निकल जाने पर राजपुत्री पिता के पास गई। पिता ने उससे पूछा कि 'वह ब्राह्मण
सत्य कहता था अथवा नहीं ॥७७॥
तब वह राजपुत्री कहने लगी—'पिताजी आप राजा होकर भी ऐसी अविवेकपूर्ण बातें
क्यों करते हैं? क्या आप नहीं जानते कि धूर्त जन सरल व्यक्तियों को ठग लेते हैं। यह ब्राह्मण
झूठ बोलकर मुझे ठग लिया चाहता था। इस धूर्त ने कनकपुरी नहीं देखी है। धूर्त लोग अनेक
प्रकार की ठगियाँ किया करते हैं॥७८-८०॥

४९२ कथासरित्सागर

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४९२ कथासरित्सागर
शिवमाधवधूर्तयो कथा
शिवमाधववृत्तान्तं तथापि शृणु वच्मि ते।
इत्युक्त्वा राजकन्या सा व्याजहार कथामिमाम् ॥८१॥
अस्ति रत्नपुरं नाम यथार्थं नगरोत्तमम्।
शिवमाधवसंज्ञौ च धूर्तौ तत्र बभूवतुः ॥८२॥
परिवारीकृतानेकधूर्तौ तौ चक्रतुश्चिरम्।
माया'प्रयोगनिःशेषमुषिताढ्यजनं पुरम् ॥८३॥
एकदा द्वौ च तावेव मन्त्रं विवक्षतुर्मिथः।
इह नगरमावाभ्यां कृत्स्नं तावद् विलुञ्चितम् ॥८४॥
अत सम्प्रति गच्छावो वस्तुमुज्जयिनीं पुरीम्।
तत्र सु श्रूयते राज्ञः पुरोधाः सुमहाधनः ॥८५॥
शङ्कुरस्वामिनामा च तस्माद्युक्त्या हृतैर्धनैः।
मालवस्त्रीविलासानां यास्यामोऽत्र रसज्ञताम् ॥८६॥
आस्कन्दी दक्षिणार्थस्य स राज्ञः भृकुटीमुखः।
सप्तकुम्भीनिधानो हि कीदृशो गीयते द्विजैः ॥८७॥
कन्यारत्नं च तस्यास्ति विप्रस्यैकमिति श्रुतम्।
तदप्यतत्नसङ्गेन ध्रुवं तस्मादवाप्स्यते ॥८८॥
इति निश्चित्य कृत्वा च मिथः कर्तव्यसंविदम्।
शिवमाधवधूर्तौ तु पुरात् प्रथमतुस्ततः ॥८९॥
शनद्दबोज्जयिनीं प्राप्य माधवः सपरिच्छदः।
राजपुत्रस्य वषेण तस्थौ ग्रामे क्वचिद् बहिः ॥९०॥
शिवस्त्वनिकलं कृत्वा वणिक्वेषां विवेश ताम्।
नगरीमेक एवाद्य बहुमायाविचक्षणः ॥९१॥
तत्राध्युवास क्षिप्राया मटिकां तीरसीमनि।
दृश्यस्थापितमृद्गम्भिदाभाण्डमृगाजिनाम् ॥९२॥
१ मायाप्रयोगेण पूर्णतया, निःशेषं सम्पूर्णतया मुषितः बञ्चितः, आडूव्यः
धनिजनः यस्य पुरस्य ईदृशं पुरमशेषयेत्यर्थः।
२ बहुव्यचारिवस्त्रम्