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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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पंचम लम्बक ४८१
प्रणाम करके आतिथ्य सत्कार किये गये उस पुरुष को वत्सराज उदयन ने उत्सुकता से
पूछा कि 'तुम कौन हो ? और 'तुम्हारा यहाँ क्या कार्य है। अर्थात् किसलिए आय हो' ॥११ ॥
उसने कहा मैं मनुष्य होकर भी शक्तिवेग नाम से विद्याधरों का राजा बन गया।
अतः मेरे बहुत शत्रु हैं ॥१२॥
इसलिए हे राजन् ! मैं अपनी विद्या के प्रभाव से यह जानकर कि तुम्हारा पुत्र भविष्य
में हम विद्याधरों का चक्रवर्ती होगा इसलिए उसे देखने के लिए आया हूँ ॥१२॥
ऐसा कहकर भावी विद्याधर चक्रवर्ती का दर्शन कर प्रसन्न शक्तिवेग ने राजा से आश्चर्य
के साथ पूछा—॥१३॥
'मित्र ! विद्याधरत्व कैसे प्राप्त होता है। वह कैसा होता है और तुमने विद्याधरत्व
को कैसे प्राप्त किया'। यह सब मुझसे कहो ॥१४॥
राजा की बातें सुनकर विनय से नम्र शक्तिवेग नामक विद्याधर बोला ॥१५॥
'राजन् ! इस जन्म में या अगले जन्म में शिवजी की आराधना करने पर धैर्यशाली
व्यक्ति उनकी कृपा से विद्याधर-पद को प्राप्त होता है ॥१६॥
वह विद्याधर-पद, अनेक प्रकार का होता है जो विद्या खड्ग या माला आदि की सिद्धि
द्वारा प्राप्त होता है। मैंने उसे जिस प्रकार पाया कहता हूँ सुनो ॥१७॥
ऐसा कहकर शक्तिवेग ने महारानी वासवदत्ता के समक्ष राजा से अपनी कथा कहनी
प्रारम्भ की ॥१८॥
कनकपुरी और शक्तिवेग की कथा
प्राचीन काल में वर्धमान¹ नाम का नगर था जो भूतल का भूषण था। उस नगर
में परोपकारी नामक वीर राजा हुआ ॥१९॥
उस उन्नतिशील राजा की महारानी मेघ की रानी विद्युत् के समान 'कनकप्रभा' नाम
की थी। वह चंचलता से रहित अर्थात् अति गंभीर थी ॥२० ॥
कुछ समय के पश्चात् उस राजा को रानी कनकप्रभा के गर्भ से एक कन्या उत्पन्न हुई,
जो विधाता ने मानों लक्ष्मी के रूप का अभिमान नष्ट करने के लिए निर्मित की थी ॥२१॥
लोकों की आँखों के लिए चाँदनी के समान वह राजकुमारी धीरे-धीरे बढ़ने लगी।
पिता ने माता के ही नाम पर उसका नाम कनकरेखा रख दिया ॥२२॥
कन्या के युवती होने पर एक बार राजा ने एकान्त में आई हुई महारानी कनकप्रभा से
कहा—॥२३॥
१ बंगाल का प्रसिद्ध वर्द्धमान (वर्धमान) नगर।