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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

About this granth

The Charaka Samhita (चरक-संहिता) is the foundational text of Ayurvedic internal medicine. By tradition, the teachings of Punarvasu Atreya were set down by his disciple Agnivesha, revised by Charaka and later completed by Dridhabala of Kashmir. With eight sections and 120 chapters, it is counted with the Sushruta Samhita and Ashtanga Hridaya among the 'great three' of Ayurveda.

This volume covers the Sutra, Nidana and Vimana sections. It includes chapters such as Dirghanjivitiya, Apamarga-tanduliya, Matrashitiya and Mahachatushpada; the count of purgative formulations made from madana fruit and other drugs; the fifty great groups of herbs, beginning with the digestives; the classes of prepared foods and food sources; abscesses and boils; and the diagnosis of the five kinds of insanity.

As the title page states, this is the first part of the Charaka Samhita with a Hindi translation by Kaviraj Atridev Gupta, Vidyalankar, Bhishagratna, of Gurukul University, published by Bhargava Pustakalaya, Gaighat, Banaras. The preface mentions the Jalpakalpataru of Gangadhar Kaviraj and the Charakopaskara of Yogindranath Sen. This second edition has 639 pages.

चिकित्साप्राभृतो विद्वान् शास्त्रवान् कर्मतत्परः ।

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१६६ चरकसंहिता [ अ० १६
संशोधन कार्य के अनन्तर 'चिकित्सा प्राभृतीय' नामक अध्याय का व्याख्यान
करेंगे जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
चिकित्साप्राभृतो विद्वान् शास्त्रवान् कर्मतत्परः ।
नरं विरेचयति यं स योगात्सुखमश्रुते ॥ ३ ॥
यं वैद्यमानी त्वबुधो विरेचयति मानवम् ।
सोऽतियोगादयोगाच्च मानवो दुःखमश्रुते ॥ ४ ॥
चिकित्सा-प्राभृत चिकित्सा में कुशल या साधन सम्पन्न विद्वान्, ज्ञानवान्,
शास्त्रवान्, आयुर्वेद शास्त्र का अध्ययन किया हुआ, चिकित्सा-कार्य में कुशल
वैद्य जिस मनुष्य को वमन, विरेचन द्वारा संशोधन कराता है, वह मनुष्य
वमन और विरेचन के सम्यक् योग से सुख भोगता है । अपने को वैद्य मानने
वाला मूर्ख वैद्य जिस मनुष्य का वमन विरेचन द्वारा संशोधन कराता है वह
मनुष्य वमन-विरेचन के अयोग या अतियोग के कारण दुःख भोगता है ॥३-४॥
दौर्बल्यं लाघवं ग्लानिर्व्याधीनामणताऽरुचिः ।
हृद्वर्णशुद्धिः क्षुत्तृष्णा काले वेगप्रवर्तनम् ॥ ५ ॥
बुद्धीन्द्रियमनःशुद्धिर्मारुतस्यानुलोमता ।
सम्यग्विरिक्तलिङ्गानि कायाग्नेश्चानुवर्तनम् ॥ ६ ॥
सम्यग् विरेचन के लक्षण—शरीर में कमजोरी आना, हलकापन, शरीर में
ग्लानि (प्रसन्नता का अभाव), रोगों का घटना, भोजन में अनिच्छा, हृदय का
शुद्ध होना, रंग का निखरना, भूख प्यास, समय पर वेगों का उपस्थित होना,
बुद्धि-इन्द्रिय और मन की शुद्धता, प्रसन्नता, अपान वायु का नीचे को जाना
और जाठराग्नि का क्रमशः बढ़ना ये सम्यग् योग के लक्षण हैं ॥ ५-६ ॥
ष्ठीवनं हृदयाशुद्धिरुत्क्लेशः श्लेष्मपित्तयोः ।
आध्मानमरुचिश्छर्दिर्दौर्बल्यमलाघवम् ॥ ७ ॥
जङ्घोरुसदनं तन्द्रा स्तैमित्यं पीनसागमः ।
लक्षणान्यविरिक्तानां मारुतस्य च निग्रहः ॥ ८ ॥
विरेचन के अयोग के लक्षण—मुख से थोड़ा २ थूक या ओषध का बाहर
आना, हृदय की जड़ता, वमन आने की भांति कफ और पित्त का मुख में
आना, पेट में अफारा, भोजन में अनिच्छा, वमन की इच्छा, शरीर में निर्ब-
लता का अनुभव न होना, शरीर में भारीपन, जांघ और टांग में पीड़ा, नींद का भान,
शरीर के अंगो का गीले वस्त्र के तुल्य ठंडा प्रतीत होना, सरदी-जुकाम होना,
और अपान वायु का रुक जाना, ये विरेचन के अयोग के लक्षण हैं ॥७-८॥

अ० १६ ] सूत्रस्थानम् १६७

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अ० १६ ] सूत्रस्थानम् १६७
विट्-पित्त-श्लेष्म-वातानामागतानां यथाक्रमम् ।
परं स्रवति यद्रक्तं मेदोमांसोदकोपमम् ॥ ६ ॥
निःश्लेष्मपित्तमुदकं शोणितं कृष्णमेव वा ।
तृष्यतो मारुतार्तस्य सोऽतियोगः प्रमुह्यतः ॥ १० ॥
विरेचन के अतियोग के लक्षण—गुदा से प्रथम क्रमानुसार मल, पित्त, कफ
और वायु बाहर निकलते हैं, परन्तु पीछे से रक्त बहता है । यह रक्त मांसरस, मेद
मिश्रित या कफमिश्रित अथवा पित्तमिश्रित पानी की भांति, या लाल अथवा
काला होता है। रोगी को वायु के कारण प्यास और मूर्च्छा आ जाती है, ये
अतियोग के लक्षण हैं ॥६-१०॥
वमनेऽतिकृते लिङ्गान्येतान्येव भवन्ति हि ।
ऊर्ध्वगा वातरोगारच वाग्ग्रहश्चाधिको भवेत् ॥ ११ ॥
चिकित्साप्राभृतं तस्मादुपैयाच्छरणं नरः ।
युञ्ज्याद्य एनमत्यन्तमायुषा च सुखेन च ॥ १२ ॥
वमन के अतियोग में भी यही विरेचन के अतियोग के लक्षण होते हैं।
परन्तु शरीर के कटिभाग से ऊपर वातरोग एवं जबान का रुकना, ये लक्षण
विशेष अधिक होते हैं । इसलिये संशोधन कराने वाले मनुष्य को चाहिये कि
विद्वान्, कर्मकुशल वैद्य की शरण में जाय जो इस रोगी को वमन-विरेचन
द्वारा आयु और सुख से युक्त कर सके, मूढ़ अज्ञानी के पास नहीं ॥११-१२॥
अविपाकोऽरुचिः स्थौल्यं पाण्डुता गौरवं क्लमः ।
पिडका-कोठ-कण्डूनां संभवोऽरतिरेव च ॥ १३ ॥
आलस्य-श्रम-दौर्बल्यं दौर्गन्ध्यमवसादकः ।
श्लेष्म-पित्त-समुत्क्लेशो निद्रानाशोऽतिनिद्रता ॥ १४ ॥
तन्द्रा क्लैब्यमबुद्धित्वमशस्त-स्वप्न-दर्शनम् ।
बल-वर्ण-प्रणाशश्च तृप्यतो बृंहणैरपि ॥ १५ ॥
बहुदोषस्य लिङ्गानि, तस्मै संशोधनं हितम् ।
ऊर्ध्वं चैवानुलोम्यं च यथादोषं यथाबलम् ॥ १६ ॥
संशोधन योग्य व्यक्ति—अपचन, अरुचि, मोटापा (स्थूलता ), पाण्डुता,
निस्तेज, पीलापन, शरीर का भारीपन, बिना परिश्रम के थकान चढ़ना, उदासी,
शरीर पर छोटी २ फुन्सियां होना, कोठ ( छप्पे ) उठना, खाज का होना,
बेचैनी, आलस्य, थकान, निर्बलता, शरीर से दुर्गन्ध आना, मन को अप्रसन्नता,
सुस्ती, कफ या पित्त का बढ़ना, नींद का न आना, अथवा नींद का बहुत

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१६८ चरकसंहिता [ अ० १६
आना, नपुंसकता, निरुत्साहता, बुद्धिमान्द्य बुरे भयानक स्वप्नों का आना, बल
और कान्ति का नाश होना, पुष्टिकारक आहार खाने पर शरीर का पुष्ट न होना,
जिसके शरीर में इनमें से बहुत से लक्षण हों तो उसमें सब दोष बढ़े हैं यह
समझकर संशोधन करना हितकारी है । इसलिये अविपाक आदि लक्षणों को
देख कर बल और दोष के अनुसार ऊर्ध्व अनुलोमन ( वमन ) या अधो-अनु-
लोमन ( विरेचन ) रूपी संशोधन देना हितकारी है ॥ १३-१६ ॥
एवं विशुद्धकोष्ठस्य कायाग्निरभिवर्धते ।
व्याधयश्चोपशाम्यन्ति प्रकृतिश्चानुवर्तते ॥ १७ ॥
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिवर्णश्चास्य प्रसीदति ।
बलं पुष्टिर्पत्यं च वृषता चास्य जायते ॥ १८ ॥
जरां कृच्छ्रेण लभते चिरं जीवत्यनामयः ।
तस्मात्संशोधनं काले युक्तियुक्तं पिबेन्नरः ॥ १९ ॥
दोषाः कदाचित्कुप्यन्ति जिता लङ्घनपाचनैः ।
जिताः संशोधनैर्यै तु न तेषां पुनरुद्भवः ॥ २० ॥
दोषाणां च द्रुमाणां च मूलेऽनुपहते सति ।
रोगाणां प्रसवानां च गतानामागतिर्ध्रुवा ॥ २१ ॥
भेषजक्षपिते पथ्यमाहारैरेव बृंहणम् ।
घृत-मांस-रस-क्षीर-हृद्य-यूषोपसंहितैः ॥ २२ ॥
अभ्यङ्गोत्सादनैः स्नानैनिरूहैः सानुवासनैः ।
तथा स लभते शर्म युज्यते चाऽऽयुषा चिरम् ॥ २३ ॥
संशोधन का फल—इस उपरोक्त विधि से मनुष्य का कोष्ठ ( उदर ) साफ़
होने पर जाठराग्नि बढ़ जाती है, रोग शान्त हो जाते हैं, शरीर स्वाभाविक
अवस्था में आ जाता है । इन्द्रियां, मन-बुद्धि और कान्ति निर्मल हो जाती है ।
शरीर में बल, शक्ति, सामर्थ्य, संतान और पुरुषत्व उत्पन्न हो जाता है । बुढ़ापा
देर में आता है और नीरोगी होकर मनुष्य देर तक जीता है । इसलिये मनुष्य
दोष-संचयकाल में और संशोधन काल में वमन-विरेचन कार्य को युक्तियुक्त
रूप में करे । लंघन ( उपवास ) और पाचन रूपी संशमन क्रिया द्वारा वश में
किये हुए दोष कभी फिर भी ( समय मिलने पर ) कुपित हो सकते हैं; परन्तु
जो दोष संशोधन कार्य के द्वारा वश में कर लिये जाते हैं, वे फिर कभी भी
उत्पन्न नहीं हो सकते । क्योंकि—दोषों या वृक्षों का मूल अवशेष रहने पर रोगों
अथवा न नष्ट होने पर रोगों की उत्पत्ति फिर हो जानी सम्भव होती है । औषध
द्वारा दोष की जड़ कट जाने पर संशुद्ध हुए पुरुष को पथ्यकारक एवं शरीर

अ० १६] सूत्रस्थानम् १६६

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अ० १६] सूत्रस्थानम् १६६
को बढ़ाने वाले भोजन देवे । यथा घी, मांस रस, दूध, हृदय के लिये हितकारी
या मन को अच्छे लगने वाले यूष आदि बना कर देवे । शरीर पर तेल मलना,
उबटन लगाना, स्नान, निरूह बस्ति, अनुवासनबस्ति का प्रयोग करे । इस प्रकार
करने से सुख मिलता है तथा देर तक आयु का भोगता है ॥१७-२३॥
अतियोग होने पर क्या करना चाहिये—
अतियोगानुबद्धानां सर्पिःपानं प्रशस्यते ।
तैलं मधुरकैः सिद्धमथवाऽप्यनुवासनम् ॥ २४ ॥
यस्य त्वयोगस्तं स्निग्धं पुनः संशोधयेन्नरम् ।
मात्रा-काल-बलापेक्षी स्मरन् पूर्वमनुक्रमम् ॥ २५ ॥
स्नेहने स्वेदने शुद्धौ रोगाः संसर्जने च ये ।
जायन्तेऽमार्गविहिते तेषां सिद्धिषु साधनम् ॥ २६ ॥
जिन पुरुषों में अतियोग के लक्षण हों, उनके लिये उन-उन रोगों को
शान्त करने वाली उन औषधियों से सिद्ध किया घृत पान करावे और मधुक
अर्थात् जीवनीयगण से सिद्ध तैल अनुवासन बस्ति के रूप में दे। जिस पुरुष
में अयोग के लक्षण हों, उसको फिर से स्नेह और स्वेद देकर, पूर्व कही हुई मात्रा
को, समय, बल आदि को क्रम से स्मरण करता हुआ, फिर से संशोधन के लिये
देवे । स्नेहन, स्वेदन संशोधन और पेयादि क्रम से विधिपूर्वक क्रिया न होने से
जो रोग उत्पन्न हो जाते हैं, उनको चिकित्सा 'सिद्धिस्थान' में कहेंगे । पहले जो
मात्रा दी थी दुबारा उससे कुछ अधिक देवे ॥२४-२६॥
जायन्ते हेतुवैषम्याद्विषमा देहधातवः ।
हेतुसाम्यात्समास्तेषां स्वभावोपरमः सदा ॥ २७ ॥
प्रवृत्तिहेतुर्भावानां न निरोधेऽस्ति कारणम् ।
केचित्स्वत्रापि मन्यन्ते हेतुं हेतोरवर्तनम् ॥ २८ ॥
शरीर को धारण करने वाले जो धातु हैं वे कारणों की विषमता अर्थात्
बढ़ने या घटने से बढ़ते या घटते हैं और शरीर के धातु कारण की समानता से
समान रहा करते हैं। विषम और सम धातुओं का सदा स्वभाव से नाश होता
है। इस समता और विषमता की निरन्तर प्रवृत्ति में ऐसा कारण रहता है
जिससे कि उनका वृद्धि और क्षय होता है, अर्थात् साम्य या विषमता के होने
में कोई कारण अवश्य होता है, बिना कारण इनके स्वाभाविक धर्म में अन्तर
नहीं आता । धातु एक क्षण भी विषमावस्था में नहीं रह सकते। यह उनका
धर्म है। सब पदार्थों की उत्पत्ति का कारण होता है, परन्तु विनाश कार्य में

स्वभावोपरमे कर्म चिकित्साप्राभृतस्य किम् ॥ २९ ॥

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२०० चरकसंहिता [ अ० १६
कारण नहीं होता। इसलिये कुछ आचार्य पदार्थों के निरन्तर विनाश में कारण
की अपेक्षा नहीं करते हैं। कुछ विद्वान् पदार्थों के नाश में उत्पादक या प्रवर्तक
कारण के अभाव को ही कारण मानते हैं ॥२७-२८॥
एवमुक्तार्थमाचार्यमग्निवेशोऽभ्यभाषत ।
स्वभावोपरमे कर्म चिकित्साप्राभृतस्य किम् ॥ २९ ॥
भेषजैर्विषमान् धातून् कान समीकुरुते भिषक् ।
का वा चिकित्सा भगवन् किमर्थं वा प्रयुज्यते ॥ ३० ॥
तच्छिष्यवचनं श्रुत्वा व्याजहार पुनर्वसुः ।
इस प्रकार कहते हुए आचार्य पुनर्वसु को लक्ष्य करके अग्निवेश बोले—
भगवन् ! शरीर की धातुवें जब स्वतः अपने स्वभाव में आ जाती हैं तब चिकित्सा
के साधनों से सम्पन्न वैद्य से कर्म साध्य क्या है। फिर क्या काम ? और तब
किन विषम हुए धातुओं को ओषधियों से वैद्य समान करता है ? और यदि
धातुओं की विषमता ही सदा रहे, तब चिकित्सा क्या वस्तु है ? और यदि
विषमता का नाश सदा होना ही अवश्यम्भावी है, फिर वैद्य किस लिये चिकित्सा
कर्म करते हैं ? इस प्रकार अग्निवेश के वचन को सुनकर पुनर्वसु आत्रेय बोले॥
श्रूयतामत्र या सौम्य युक्तिर्दृष्टा महर्षिभिः ॥ ३१ ॥
न नाशकारणाभावाद्भावानां नाशकारणम् ।
ज्ञायते नित्यगस्येव कालस्यात्ययकारणम् ॥ ३२ ॥
शीघ्रगत्वाद्यथाभूतस्तथा भावो विपद्यते ।
निरोधे कारणं तस्य नास्ति नैवान्यथाक्रिया ॥ ३३ ॥
याभिः क्रियाभिर्जायन्ते शरीरे धातवः समाः ।
सा चिकित्सा विकाराणां कर्म तद्भिषजां स्मृतम् ॥ ६४ ॥
कथं शरीरे धातूनां वैषम्यं न भवेदिति ।
समानां चानुबन्धः स्यादित्यर्थं क्रियते क्रिया ॥ ३५ ॥
त्यागाद्विषमहेतूनां समानां चोपसेवनात् ।
विषमा नानुबध्नन्ति जायन्ते धातवः समाः ॥ ३६ ॥
समैस्तु हेतुभिर्यस्माद्धातून् संजनयेत्समान् ।
चिकित्साप्राभृतस्तस्माद्दाता देहसुखायुषाम् ॥ ३७ ॥
धर्मस्यार्थस्य कामस्य नृलोकस्योभयस्य च ।
दाता संपद्यते वैद्यो दानाद्देहसुखायुषाम् ॥ ३८ ॥
हे सौम्य ! जो युक्ति महर्षियों ने बुद्धि द्वारा देखी, वह सुनो। नित्यगमन-

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शील काल के नाश के कारण की तरह नाश के कारण के अभाव से पदार्थों
के नाश का कारण नहीं जाना जाता। कोई भी पदार्थ जैसा उत्पन्न होता है,
वैसा ही शीघ्रगामी होने से नष्ट होता है। उनके विनाश में कोई कारण नहीं है।
उनमें किसी संस्कार का आधान नहीं किया जा सकता। पदार्थों के नाश होने
के कारण का पता नहीं चलता क्योंकि नाश के कारण का ही अभाव है।
जैसे नित्य काल का भी नाश होता दिखाई देता है, परन्तु इस नाश के कारण
का पता नहीं चलता, क्योंकि यह काल बहुत शीघ्रगामी है। धातु पदार्थ भी
काल के समान बहुत शीघ्रगामी हैं इसलिये इनके नाश का कारण न होने से
ही अज्ञात है। धातुओं की पूर्वावस्था के निरोध में भी कोई कारण नहीं है।
जिन क्रियाओं के द्वारा शरीर के अन्दर विषम हुए धातु समानावस्था में आते
हैं, उन क्रियाओं को रोगों की चिकित्सा कहते हैं, यह 'चिकित्सा' वैद्यों का
कर्म है। शरीर के अन्दर धातुओं में विषमता उत्पन्न न हो और समान अवस्था
में ही धातु सदा बने रहें, इसलिये चिकित्सा क्रिया की जाती हैं। काल, बुद्धि,
इन्द्रियार्थों के अतियोग, अयोग या मिथ्यायोग इन विषम हेतुओं के छोड़ने से,
समयोग रूप में कारणों के सेवन करने से धातु विषम नहीं होते, और विषम
हुए धातु समान हो जाते हैं। चिकित्सा-कुशल वैद्य समान कारणों से धातुओं
को समान बनाने का यत्न करें। इस प्रकार करने से वैद्य शरीर के सुख और
आयुष्य अर्थात् दीर्घायु को प्रदान करता है। मनुष्य को शारीरिक सुख और
आयुष्य प्रदान करने से वैद्य इहलोक एवं परलोक दोनों लोकों में धर्म, अर्थ
और काम ( त्रिवर्ग ) को देने वाला होता है ॥ ३१-३८ ॥
तत्र श्लोकाः—चिकित्साप्राभृतगुणो दोषो यश्चेतराश्रयः ।
योगायोगातियोगानां लक्षणं शुद्धिसंश्रयम् ॥ ३६ ॥
बहुदोषस्य लिङ्गानि संशोधनगुणाश्च ये ।
चिकित्सासूत्रमात्रं च सिद्धि-व्यापत्ति-संश्रयम् ॥ ४० ॥
या च युक्तिश्चिकित्सायां यं चार्थं कुरुते भिषक् ।
चिकित्साप्राभृतेऽध्याये तत्सर्वमवदन्मुनिः ॥ ४१ ॥
चिकित्साप्राभृत में वैद्य के गुण; वैद्य के विपरीत मूढ वैद्य के अवगुण,
संशोधन के सम्यकयोग और अतियोग के लक्षण; बहुत दोषों के लक्षण, संशोधन
के गुण, चिकित्सा का सूत्र रूप, चिकित्सा के युक्तियुक्त होने में शंका-समाधान;

चिकित्साप्राभृतीयो नाम षोडशोऽध्यायः समाप्तः ॥ १६ ॥

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[Page Header: २०२ चरकसंहिता अ० १७]

चिकित्सा का प्रयोजन—ये सब बातें 'चिकित्सा-प्राभृतीय' अध्याय में आत्रेय
ऋषि ने उपदेश की हैं ॥ ३६-४१ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने कल्पनाचतुष्के
चिकित्साप्राभृतीयो नाम षोडशोऽध्यायः समाप्तः ॥ १६ ॥
इति कल्पनाचतुष्कः समाप्तः ॥ ४ ॥

सप्तदशोऽध्यायः ।

अथातः कियन्तःशिरसीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब रोगों को उपदेश करने की इच्छा से 'कियन्तःशिरसीयं' नामक
अध्याय का व्याख्यान करेंगे, जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
कियन्तः शिरसि प्रोक्ता रोगा हृदि च देहिनाम् ॥ ३ ॥
कति चाप्यनिलादीनां रोगा मानविकल्पजाः ।
क्षयाः कति समाख्याताः पिडकाः कति चानघ ॥ ४ ॥
गतिः कतिविधा चोक्ता दोषाणां दोषसूदन ।
अग्निवेश ने पूछा कि हे दोषों को नाश करने वाले महर्षि ! मनुष्यों के
शिर सम्बन्धी रोग कितने हैं ? हृदय सम्बन्धी रोग कितने हैं ? वात आदि दोषों
के संसर्ग भेद से कुल कितने प्रकार के रोग हो जाते हैं ? क्षय रोग कितने
प्रकार के हैं ? पिड़कायें कितनी प्रकार की हैं ? और दोषों की गति कितने प्रकार
की है ? कृपा कर कहिये ॥३-४॥
हुताशवेशस्य वचस्तच्छ्रुत्वा गुरुरब्रवीत् ॥ ५ ॥
पृष्टवानसि यत्सौम्य तन्मे शृणु सुविस्तरम् ।
दृष्टाः पञ्च शिरोरोगाः पञ्चैव हृदयामयाः ॥ ६ ॥
व्याधीनां द्वयधिका षष्टिर्दोष-मान-विकल्पजा ।
दशाष्टौ च क्षयाः सप्त पिडका माधुमेहिकाः ॥ ७ ॥
दोषाणां त्रिविधा चोक्ता गतिर्विस्तरतः शृणु ।
सन्धारणाद्दिवास्वप्नाद्रात्रौ जागरणाम्मदात् ॥ ८ ॥
उच्चैर्भाष्यादवश्यायात्प्राग्वातादतिमैथुनात् ।
गन्धादसात्म्यादाघ्राताद्रजो-धूम-हिमातपात् ॥ ९ ॥

अ० १७ ] सूत्रस्थानम् २०३

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अ० १७ ] सूत्रस्थानम् २०३
गुर्वम्ल-हरितदानादतिशीताम्बु-सेवनात् ।
शिरोभितापाद् दुष्टामाद्रोदनाद् बाष्पनिग्रहात् ॥ १० ॥
मेघागमान्मनस्तापाद्देशकाल-विपर्ययात् ।
वातादयः प्रकुप्यन्ति शिरस्यस्रं च दुष्यति ॥ ११ ॥
ततः शिरसि जायन्ते रोगा विविधलक्षणाः ।
अग्निवेश के वचन को सुनकर गुरु महाराज बोले—हे सौम्य ! जो कुछ
तुमने पूछा है उसको ध्यान देकर सविस्तर सुनो । शिर के रोग पांच प्रकार के
हैं, और पांच ही प्रकार के हृदय रोग हैं। दोषों के वात-पित्त-कफ के परिमाण
से होने वाले रोग बासठ (६२) प्रकार के हैं । क्षय अठारह (१८) प्रकार के,
प्रमेह मधुमेह के कारण होने वाले फोड़े सात प्रकार के, और दोषों की गति
तीन प्रकार की है । इसी को अब विस्तार से सुनो । मूत्र आदि के उपस्थित
वेगों को रोकने से, दिन में सोने से, रात्रि में जागने से, नशा करने ( मदकारक
पदार्थों के सेवन ) से, ऊँचे या अधिक बोलने से, ओस से, सामने की वायु के
झोंके से, अति स्त्री-संभोग से,असात्म्य अर्थात् प्रतिकूल, गंध के सूंघने से, धूल धुवां
बर्फ या धूप के सेवन से, गरिष्ठ,खट्टे; धनिया-मरिच आदिके अधिक खाने से बहुत
ठण्डे पानी के सेवन से, शिर पर चोट लगने से, आम के दोष युक्त होने से
( अजीर्ण होने से ), रोने से, आंसुओं को रोकने से, बादलों के आने
से, मानसिक विक्षोभ से, देश-काल के बदलने से ( इन के अयोग,
अतियोग या मिथ्यायोग होने से ), ( अथवा भूकम्प, उल्कापात आदि
देश के मिथ्यायोग हैं इनसे वात, पित्त और कफ दूषित होकर शिर में रक्त को
दूषित करते हैं । रक्त के दूषित होने से आगे कहे जाने वाले नानाप्रकार के
लक्षणों वाले रोग शिर में उत्पन्न होते हैं ॥५-११॥
प्राणाः प्राणभृतां यत्र श्रिताः सर्वेन्द्रियाणि च ॥ १२ ॥
यदुत्तमाङ्गमङ्गानां शिरस्तदभिधीयते ।
प्राणधारियों के प्राण ( जीवन ) और सब इन्द्रियां ( ज्ञानेन्द्रियां ) जहां
पर स्थित हैं और जो शरीर के सब अंगों में मुख्य, श्रेष्ठ अंग है, उसको 'शिर'
कहते हैं ॥१२॥
अर्धावभेदको वा स्यात्सवं वा रुज्यते शिरः ॥ १३ ॥
प्रतिश्या-मुख-नासाक्षि-कर्ण-रोग-शिरो-भ्रमाः ।
अर्दितं शिरसः कम्पो गलमन्या-हनुग्रहः ॥ १४ ॥
विविधाश्चापरे रोगा वातादि-क्रिमि-संभवाः ।

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२०४ चरकसंहिता [अ० १७
पृथग्दृष्टास्तु ये पञ्च संग्रहे परमर्षिभिः ॥ १५ ॥
शिरोगदांस्तान् शृणु मे यथास्वैर्हेतुलक्षणैः ।
शिर में उत्पन्न होने वाले रोग — आधे शिर का दुखना, सारे शिर का
दुखना, प्रतिश्याय (जुकाम, सर्दी), मुखरोग, नासिका के रोग, आंख के रोग,
शिर में चक्कर आना; चेहरे का लक़वा, शिर का हिलना, गलग्रह (गले का
बन्द होना), मन्याग्रह (गर्दन का इधर उधर न मुड़ सकना), हनुग्रह (जबड़ा
भिचना) और दूसरे वात आदि दोषों तथा कृमियों से उत्पन्न होने वाले रोग
शिर में होते हैं। वात, पित्त, कफ, सन्निपात और कृमिजन्य ये जो पांच प्रकार
के शिरोरोग (आगे जो अष्टोदरीय अध्याय १६ में) महर्षियों ने कहे हैं उनमें
से एक एक लक्षण सुनो ॥ १३-१५॥
उच्चैर्भाष्यातिभाष्याभ्यां तीक्ष्णपानात्प्रजागरात् ॥ १६ ॥
शीत-मारुत-संस्पर्शाद् व्यवायाद् वेगनिग्रहात् ।
अभिघातोपवासाच्च विरेकाद् वमनादपि ॥ १७ ॥
बाष्प-शोक-भय-त्रासाद् भार-मार्गातिकर्षणात् ।
शिरोगता वै धमनीर्वायुराविश्य कुप्यति ॥ १८ ॥
ततः शूलं महत्तस्य वातात्समुपजायते ।
निस्तुद्येते भृशं शङ्खौ घाटा संभिद्यते तथा ॥ १६ ॥
भ्रुवोर्मध्यं ललाटं च तपतीवातिवेदनम् ।
बध्येते स्वनतः श्रोत्रे निष्कृष्येते इवाक्षिणी ॥ २० ॥
घूर्णतीव शिरः सर्वं संधिभ्य इव मुच्यते ।
स्फुरत्यतिशिराजालं स्तभ्यते च शिरोधरा ॥ २१ ॥
स्निग्धोष्णमुपशेते च शिरोरोगेऽनिलात्मके ।
ऊंचे बोलने से, बहुत अधिक बोलने से, मद्य आदि तीक्ष्ण पदार्थों के पीने
से, रात्रि में जागने से, ठण्डी वायु के स्पर्श से, अतिमैथुन से, मल मूत्रादि के
उपस्थित वेगों को रोकने से, उपवास से, शिर पर चोट लगने से, अतिविरेचन से,
अतिवमन से, बाष्प (आंसू) को रोकने से, शोक से, भय से, भार के उठाने से,
अतिमार्ग के चलने से, परिश्रम से वायु कुपित होकर सिर में गया हुआ,
शिराओं में बढ़कर शिर में महान् शूल को उत्पन्न करता है। इस शूल के कारण
शंख (कनपटियों) पीड़ित होते हैं, गर्दन फटती है, भ्रुवों के बीच में माथे
पर बहुत वेदना होती है और माथा बहुत गरम होता है। कानों में गुंजार
(आवाज) सुनाई देती है, आंखें बाहर निकलती प्रतीत होती हैं, शिर घूमता

अ० १७ ] सूत्रस्थानम् २०५

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अ० १७ ] सूत्रस्थानम् २०५
हुआ प्रतीत होता है, शिर की सन्धियां फटती प्रतीत होती हैं, शिराओं के अन्दर
धड़कन विशेष ( स्पन्दन ) रूप से प्रतीत होती है, गर्दन जड़ बन जाती है,
इधर-उधर नहीं हिलाई जा सकती और स्निग्ध और उष्ण क्रिया आराम देत
प्रतीत होतो है । ये वातजन्य शिरोरोग के लक्षण हैं ॥१६-२१॥
कट्वम्ल-लवण-क्षार-मद्य-क्रोधातपानलैः ॥ २२ ॥
पित्तं शिरसि संदुष्टं शिरोरोगाय कल्पते ।
दह्यते रुज्यते तेन शिरः शीतं सुपूयते ॥ २३॥
दह्येते चक्षुषी तृष्णा भ्रमः स्वेदश्च जायते ।
आस्यासुखैः स्वप्नसुखैर्गुरु-स्निग्धातिभोजनैः ॥ २४ ॥
श्लेष्मा शिरसि संदुष्टः शिरोरोगाय कल्पते ।
शिरो मन्दरुजं तेन सुप्रस्तिमितभारिकम् ॥ २५ ॥
भवत्युत्पद्यते तन्द्रा तथाऽऽलस्यमरोचकम् ।
वाताच्छूलं भ्रमः कम्पः पित्ताद्दाहो मदस्तृषा ॥ २६ ॥
कफाद् गुरुत्वं तन्द्रा च शिरोरोगे त्रिदोषजे ।
तिल-क्षीर-गुडाजीर्ण-पूति-संकीर्ण-भोजनात् ॥ २७॥
क्लेदोऽसृक्कफ-मांसानां दोषमस्योपजायते ।
ततः शिरसि संक्लेदात्क्रिमयः पापकर्मणः ॥ २८॥
जनयन्ति शिरोरोगं जाता बीभत्सलक्षणम् ।
व्यथच्छेद-रुजा-कण्डू-शोफ-दौर्गन्ध्य-दुःखितम् ॥ २६ ॥
क्रिमिरोगातुरं विद्यात्क्रिमीणां लक्षणेन च ।
पित्तजन्य शिरोरोग—कडुवे, खट्टे, नमकीन, क्षार पदार्थों के सेवन से,
शराब के पीने से, क्रोध से, धूप से, आग से, पित्त शिर में कुपित होकर
शिरोरोग को उत्पन्न करता है । इससे शिर में जलन और पीड़ा होती है, तथा
शीत उपचार अनुकूल पड़ता है । आंखें जलती हैं, प्यास होती है, चक्कर आता
है, और पसीना आता है । कफजन्य शिरोरोग में निरुद्योगी आलस्य का सुख-
मय जीवन व्यतीत करना, दिन में सोना, गुरु, भारी और स्निग्ध घी आदि
युक्त पदार्थों के अतिभोजन से; श्लेष्मा अर्थात् कफ शिर में कुपित होकर शिरो-
रोग को उत्पन्न करता है । इससे शिर में धीमी २ वेदना होती है, शिर सोया
हुआ सा प्रतीत होता है, शिर जड़ हो जाता है, भारी हो जाता है । तन्द्रा, कार्य में
अनिच्छा, आलस्य और भोजन में अरुचि उत्पन्न हो जाती है । त्रिदोषजन्य
शिरोरोग— वात के कारण चक्कर आना और कम्पन, पित्त के कारण जलन,
मूर्च्छा और प्यास, कफ के कारण भारीपन, और तन्द्रा, त्रिदोष जन्य शिरोरोग

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२०६ चरकसंहिता [अ० १७
में होती है। कृमि जन्य शिरोरोग—तिल, दूध, गुड़ इनके अधिक सेवन से,
अजीर्ण और दुग्धयुक्त सड़ा गला भोजन करने से, संकीर्ण ( बहुत गड़बड़
चीजें मिलाकर) भोजन करने से शिर के वातादि दोष बढ़कर शिर में रक्त,
कफ और मांस को दूषित बनाकर रोग उत्पन्न करते हैं। पाप करनेवाले
पुरुष के शिर में इस क्लेद से कीड़े उत्पन्न होकर बीभत्स अर्थात् घृणाजनक
भयंकर शिरोरोग उत्पन्न करते हैं। इससे काटने, छेदने, के समान पीड़ा, खाज,
सूजन, दुर्गन्ध और बहुत अधिक कष्ट होता है। इन लक्षणों को तथा कृमियों
को देखकर कृमिरोग समझना चाहिये ॥ २२–२६॥
पांच प्रकार के हृदयरोग—
शोकोपवास-व्यायाम-शुष्क-रूक्षालप-भोजनैः ॥ ३० ॥
वायुराविश्य हृदयं जनयत्युत्तमां रुजम् ।
वेपथुर्वेष्टनं स्तम्भः प्रमोहः शून्यता दरः ॥ ३१ ॥
हृदि वातातुरे रूपं जीर्णे चात्यर्थवेदना ।
उष्णाम्ल-लवण-क्षार-कटुकाजीर्ण-भोजनैः ॥ ३२ ॥
मद्यक्रोधातपेश्चाशु हृदि पित्तं प्रकुप्यति ।
हृद्दाहस्तिक्तता वक्त्रे तिक्ताम्लोद्गिरणं क्लमः ॥ ३३ ॥
तृष्णा मूर्च्छा भ्रमः स्वेदः पित्त-हृद्रोगलक्षणम् ।
अत्यादानं गुरुस्निग्धमचिन्तनमचेष्टनम् ॥ ३४ ॥
निद्रासुखं वाप्यधिकं कफहृद्रोगकारणम् ।
हृदयं कफहृद्रोगे सुप्त-स्तिमितभारिकम् ॥ ३५ ॥
तन्द्रा-रुचि-परीतस्य भवत्यश्मावृतं यथा ।
हेतु-लक्षण-संसर्गादुच्यते सान्निपातिकः ॥ ३६ ॥
( हृद्रोगः कष्टदः कष्टसाध्य उक्तो महर्षिभिः )
त्रिदोषजे तु हृद्रोगे यो दुरात्मा निषेवते ।
तिल-क्षीर-गुडादीनि ग्रन्थिस्तस्योपजायते ॥ ३७ ॥
मर्मैकदेशे संक्लेदं रसश्चास्योपगच्छति ।
संक्लेदात्कृमयश्चास्य भवन्त्युपहतात्मनः ॥ ३८ ॥
मर्मैकदेशे संजाताः सर्पन्तो भक्षयन्ति च ।
तुद्यमानं स हृदयं सूचीभिरिव मन्यते ॥ ३९ ॥
छिद्यमानं यथा शस्त्रैर्जात-कण्डू-महारुजम् ।
हृद्रोगं क्रिमिजं त्वेतैर्लिङ्गैर्बुद्ध्वा सुदारुणम् ।
त्वरेत जेतुं तं विद्वान् विकारं शीघ्रकारिणम् ॥४०॥

अ० १७ ] सूत्रस्थानम् २०७

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अ० १७ ] सूत्रस्थानम् २०७
( १ ) शोक, उपवास, व्यायाम ( परिश्रम ), रूक्ष, शुष्क, और स्वल्प
भोजनों से कुपित होकर वायु हृदय में जाकर इसको दूषित करके तीव्र वेदना
को उत्पन्न करती है। इससे कम्पन, ऐंठन के समान वेदना, जड़ता, मूर्च्छा,
शून्यता ( ज्ञान का अभाव ), चक्कर आना आदि लक्षण वातजन्य हृदय वेदना
में होते हैं। भोजन के जीर्ण होनेपर ये लक्षण बहुत बढ़ जाते हैं। ( २ ) पित्त-
जन्य हृदय शूल—गरम, खट्टे, नमकीन, क्षार, कटु रस के अधिक सेवन से,
अजीर्णावस्था में भोजन करने से, मद्यपान से, क्रोध या धूप में बैठने या चलने
से, पित्त हृदय में पहुंचकर जल्दी ही कुपित हो जाता है, कुपित होकर तीव्र
वेदना उत्पन्न करता है। इस कारण हृदय में जलन, मुख में कडुआपन, खट्टे,
पित्तयुक्त डकार का आना, बिना परिश्रम के थकान, प्यास, मूर्च्छा, चक्कर
आना, पसीना आना ये पित्तजन्य हृदयशूल के लक्षण हैं। ( ३ ) कफजन्य
हृदयशूल—बहुत परिणाम में भोजन करने से, भारी, स्निग्ध पदार्थों के सेवन
से, चिन्ता न करने या थोड़ी करने, शारीरिक चेष्टाओं के कम करने से, दिन
में बेफिकरी से सोने और अधिक सोने से कफ कुपित होकर हृदय में जाकर
रस को दूषित करके हृदयशूल उत्पन्न करता है। इसके कारण हृदय सोया हुआ,
सुस्त, गीले वस्त्र से ढंपा हुआ सा, भारी प्रतीत होता है और आलस्य, अरुचि
उत्पन्न होती है और ऐसा मालूम होता है कि किसी ने हृदय पर पत्थर रख
दिया हो। ( ४ ) त्रिदोषजन्य हृदय शूल—तीनों दोषों के मिलने से, तीनों दोषों
के लक्षण उत्पन्न होते हैं, उसको त्रिदोषजन्य हृदयशूल कहते हैं। ( ५ ) कृमि
जन्य—त्रिदोषजन्य हृदयरोग में जो दुरात्मा तिल, दूध, गुड़ ( अजीर्णावस्था
में भोजन, सड़ा हुआ भोजन, विरुद्ध भोजन आदि ) सेवन करता है, उसके
हृदय के एक भाग में ग्रन्थि ( गांठ ) उत्पन्न हो जाती है तथा रस का संक्लिन्न-
भाग सड़ने लगता है। रस के संक्लेदन से कृमि उत्पन्न हो जाते हैं। ये कृमि
हृदय के एक भाग में उत्पन्न होकर अन्य स्थान में फैलने लगते हैं और हृदय
को खाने लगते हैं। इस अवस्था में रोगी को ऐसी वेदना होती है मानो कोई
उसके हृदय में सुईयां चुभा रहा है। शस्त्रों से कोई हृदय को काटता है, हृदय
में बहुत खाज एवं पीड़ा उठती है। इन लक्षणों को देखकर कृमिजन्य भयानक
हृदय रोग को समझकर विद्वान् शीघ्र मृत्यु करने वाले रोग को शान्त करने
का यत्न करे ॥३०-४०॥
द्वयुल्बणैकोल्बणैः षट् स्युर्हीनमध्याधिकैश्च षट् ।
समैश्चैको विकारास्ते सन्निपातास्त्रयोदश ॥ ४१ ॥
संसर्गे नव षट् तेभ्य एकवृद्धया समैस्त्रयः ।

वृद्धि-क्षय-कृतश्चान्यो विकल्प उपदेक्ष्यते ॥ ४३ ॥

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२०८ चरकसंहिता [ अ० १७
पृथक् त्रयः स्युस्तैर्वृद्धैर्व्याधयः पञ्चविंशतिः ॥ ४२ ॥
यथा वृद्धैस्तथा क्षीणैर्दोषैः स्युः पञ्चविंशतिः ।
वृद्धि-क्षय-कृतश्चान्यो विकल्प उपदेक्ष्यते ॥ ४३ ॥
वृद्धिरेकस्य समता चैकस्यैकस्य संक्षयः ।
द्वन्द्व-वृद्धिः क्षयश्चैकस्यैकवृद्धिर्द्वयोः क्षयः ॥ ४४ ॥
वात आदि दोषों के परस्पर संसर्ग से होने वाले विकारों के बासठ (६२)
भेद-बढ़े हुए वात, पित्त, कफ के परस्पर संसर्ग से सन्निपात जन्य तेरह (१३)
विकार होते हैं। दो दोषों की अधिकता और एक की न्यूनता से (वात-पित्त
बढ़े, कफ कम हो, पित्त-कफ बढ़े और वात कम हो, वात कफ बढ़े और पित्त
कम हो) तीन; एक दोष की वृद्धि और दो दोष की न्यूनता से (वात बढ़े,
पित्त-कफ न्यून, पित्त बढ़े वायु-कफ न्यून; कफ बढ़े और वायु-पित्त न्यून)
तीन; इस प्रकार छः सन्निपात हैं; हीन, मध्य और अधिक भेद से ये छः
सन्निपात हैं (जैसे—वृद्ध वात, वृद्धतर पित्त, वृद्धतम कफ; वृद्ध वात, वृद्धतर
कफ, वृद्धतम पित्त; वृद्ध पित्त, वृद्धतर कफ और वृद्धतम वात; वृद्ध कफ,
वृद्धतर वात और वृद्धतम पित्त) और वात-पित्त कफ तीनों दोषों के बढ़ने से
एक प्रकार का; इस प्रकार से तेरह प्रकार के सन्निपात हैं। अब दो दोषों के
भेद कहते हैं—बढ़े हुए वात, पित्त, कफ इनमें किन्हीं दो दोषों के परस्पर
मिलने से नौ भेद हो जाते हैं। यह संयोग एक-एक दोष की वृद्धि से छः प्रकार
का, और तीनों की समान वृद्धि से तीन प्रकार होता है। छः प्रकार का यथा-
वृद्ध वात अधिक, वृद्ध पित्त; वृद्ध पित्ताधिक, वृद्ध वात; वृद्ध वाताधिक, वृद्ध
कफ; वृद्ध कफाधिक, वृद्ध वात, वृद्ध पित्ताधिक वृद्धकफ, वृद्धकफाधिक
वृद्धपित्त—ये छः प्रकार का। तीन प्रकार का यथा—वृद्ध समवात पित्तज,
वृद्ध समवातकफज, वृद्ध समपित्तकफज। इस प्रकार से नौ प्रकार का हुआ।
पृथक् रूप में बढ़े हुए वात, पित्त, कफ से (अलग-अलग उत्पन्न हुए) रोग
तीन प्रकार से होते हैं। यथा-वृद्धवातज वृद्धपित्तज और वृद्धकफज। इस
प्रकार बढ़े हुए दोषों से २५ प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं। जिस प्रकार दोषों
के बढ़ने से २५ भेद बनते हैं, उसी प्रकार दोषों के क्षीण होने से भी पचीस
भेद बन जाते हैं। वृद्धि और क्षय द्वारा उत्पन्न भेदों के अतिरिक्त दोषों के
अन्य भेद बतलाते हैं। यथा-एक दोष की वृद्धि, एक दोष की समता, और
एक दोष का क्षय। यथा-वृद्ध वात, समपित्त, क्षीण कफ; वृद्ध वात, सम कफ,
क्षीण पित्त; वृद्ध पित्त, सम वात, क्षीण कफ; वृद्ध पित्त, सम कफ, क्षीण पित्त;

अ० १७ ] १४ सूत्रस्थानम् २०६

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अ० १७ ] १४ सूत्रस्थानम् २०६
वृद्ध कफ, सम पित्त; क्षीण वात; वृद्ध कफ, सम वात, क्षीण पित्त ये छः प्रकार।
दो दोषों की वृद्धि और एक दोष का क्षय, यथा-वृद्ध पित्त कफ, क्षीण वात;
वृद्ध वात कफ, क्षीण पित्त; वृद्ध वात पित्त, क्षीण कफ, यह तीन प्रकार का।
एक दोष की वृद्धि और दो दोषों का क्षय-यथा वृद्ध कफ, क्षीण वात-पित्त,
वृद्ध पित्त क्षीण कफ-वात, वृद्ध वात क्षीण पित्त-कफ ये तीन। इस प्रकार से
ये बारह भेद उपरोक्त पचास भेद से पृथक् हैं। कुल मिलकर बासठ (६२)
भेद हो जाते हैं ॥४१-४४॥
प्रकृतिस्थं यदा पित्तं मारुतः श्लेष्मणः क्षये।
स्थानादादाय गात्रेषु यत्र यत्र विसर्पति ॥ ४५ ॥
तदा भेदश्च दाहश्च तत्र तत्रानवस्थितः ।
गात्रदेशे भवत्यस्य श्रमो दौर्बल्यमेव च ॥ ४६ ॥
साम्ये स्थितं कफं वायुः क्षीणे पित्ते यदा बली।
कर्षेत्कुर्यात्तदा शूलं सशैत्य-स्तम्भ-गौरवम् ॥ ४७ ॥
यदाऽनिलं प्रकृतिगं पित्तं कफपरिक्षये ।
संरुणद्धि तदा दाहः शूलं चास्योपजायते ॥ ४८ ॥
श्लेष्माणं हि समं पित्तं यदा वातपरिक्षये ।
निपीडयेत्तदा कुर्यात्तन्द्रागौरवं ज्वरम् ॥ ४६ ॥
• प्रवृद्धो हि यदा श्लेष्मा पित्ते क्षीणे समीरणम् ।
रुन्ध्यात्तदा प्रकुर्वीत शीतकं गौरवं रुजम् ॥ ५० ॥
समीरणे परिक्षीणे कफः पित्तं समत्वगम् ।
कुर्वीत संनिरुन्धानो मृद्वग्नित्वं शिरोग्रहम् ॥ ५१ ॥
निद्रां तन्द्रां प्रलापं च हृद्रोगं गात्रगौरवम् ।
नखादीनां च पीतत्वं ष्ठीवनं कफपित्तयोः ॥ ५२ ॥
हीनवातस्य तु कफः पित्तेन सहितश्चरन् ।
करोत्यरोचकापाकौ सदनं गौरवं तथा ॥ ५३ ॥
हृल्लासमास्यस्रवणं दूयनं पाण्डुतां मदम् ।
विरेकस्य हि वैषम्यं वैषम्यमनलस्य च ॥ ५४ ॥
क्षीणपित्तस्य तु श्लेष्मा मारुतेनोपसंहितः ।
स्तम्भं शैत्यं च तोदं च जनयत्यनवस्थितम् ॥ ५५ ॥
गौरवं मृदुतामग्नेर्भक्ताश्रद्धां प्रवेपनम् ।
नखादीनां च शुक्लत्वं गात्रपारुष्यमेव च ॥ ५६ ॥

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२१० चरकसंहिता [ अ० १७
हीने कफे मारुतस्तु पित्तं तु कुपितं द्वयम् ।
करोति यानि लिङ्गानि शृणु तानि समासतः ॥ ५७ ॥
भ्रममुद्वेष्टनं तोदं दाहं स्फुटनवेपने ।
अङ्गमर्दं परीशोषं दूयनं धूपनं तथा ॥ ५८ ॥
वात-पित्त-क्षये श्लेष्मा स्रोतांस्यपि दधद्भृशम् ।
चेष्टा-प्रणाशं मूर्च्छां च वाक्सङ्गं च करोति हि ॥ ५६ ॥
श्लेष्मवातक्षये पित्तं देहौजः संस्रयेच्चरत् ।
ग्लानिमिन्द्रियदौर्बल्यं तृष्णां मूर्च्छां क्रियाक्षयम् ॥ ६० ॥
पित्त-श्लेष्म-क्षये वायुर्मर्माण्यभिनिपीडयन् ।
प्रणाशयति संज्ञां च वेपयत्यथवा नरम् ॥ ६१ ॥
जिस समय कि पित्त अपनी प्रकृति में होता है और कफ क्षीण होता है,
उस समय वायु पित्त को उसके स्थान से लेकर शरीर में इधर-उधर दौड़ता
है । जिससे कि फटने की सी दर्द, जलन, थकान और निर्बलता उत्पन्न होती
है । शरीर में कफ के प्रकृत अवस्था में होने से, पित्त के क्षीण होने पर कुपित
बलवान् वायु कफ के साथ मिलकर वेदना, जड़ता, ठण्डक और भारीपन शरीर
में उत्पन्न करती है । शरीर में कफ क्षीण हो, पित्त कुपित हो, वायु प्रकृति रूप
में हो, तो पित्त वायु की गति बन्द करके जलन और दर्द उत्पन्न करता है ।
कफ समानावस्था में हो, पित्त कुपित और वायु का क्षय हो तो, कफ को रोककर
पित्त शरीर में तन्द्रा अर्थात् आलस्य, भारीपन और ज्वर उत्पन्न कर देता है ।
कफ बढ़ा हुआ हो, पित्त क्षीण हो, और वायु समानावस्थ हो, तो कफ वायु
की गति को बन्द करके ठण्डक, भारीपन और ज्वर उत्पन्न कर देता है ।
वायु का क्षय हो, पित्त समानावस्था में हो, कफ बढ़ा हुआ हो, तो कफ पित्त
की गति को बन्द करके, मन्दाग्नि, शिर का जकड़ना, नींद का आना, आलस्य,
प्रलाप, हृदय रोग, शरीर का भारीपन, नख, ओष्ठ, आंख आदि को पीलापन
तथा थूक में कफ और पित्त आने लगता है । वायु क्षीण हो और कफ एवं
पित्त दोनों बढ़े हुए एक साथ मिलकर शरीर में अरुचि, अविपाक भोजन का
अपचन, पीड़ा, भारीपन, वमन की रुचि, मुख से लार गिरना, पीड़ा, पीलापन,
नशा सा, मल त्याग में विषमता, मल का कभी आना कभी नहीं आना, इसी
प्रकार अग्नि की विषमता कभी भूख लगना और कभी नहीं लगना ये लक्षण
उत्पन्न करते हैं । पित्त के क्षीण होने पर कफ वायु के साथ मिलकर शरीर में
जड़ता, ठण्डक, कभी यहां और कभी वहां, अनिश्चित स्थान पर वेदना,
भारीपन, अग्नि की निर्बलता, भोजन में अनिच्छा, कम्पन, नख ( मल, ओष्ठ,

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आंख ) में सफेद रंग और शरीर में रूक्षता अर्थात् रूखापन आ जाता है ।
कफ के क्षीण होने पर, वायु और पित्त दोनों कुपित होकर जो लक्षण शरीर में
उत्पन्न करते हैं, उनको संक्षेप से सुनो। शिर में चक्कर आना ऐंठन की पीड़ा,
चुभने की सी दर्द, जलन, शरीर का फटना, कम्पन, अंगों का टूटना, शुष्कता,
पीड़ा और धूप में बैठने से जैसे अंग गरम हो जाते हैं ऐसी जलन होती है ।
वात और पित्त दोनों क्षीण हों, केवल कफ बढ़ा हो तो—सब स्रोतों को कफ
रोक लेता है। इससे क्रियायें नष्ट हो जाती हैं, मूर्च्छा, जीभ-वाणी का बन्द हो
जाना, होता है। कफ और वात के क्षीण होने पर पित्त गति करता हुआ
शरीर के ओज ( कान्ति ) को चलायमान कर देता है। शरीर में ग्लानि,
थकान, इन्द्रियों की दुर्बलता, प्यास, मूर्च्छा और चेष्टाओं का नाश हो जाता
है। पित्त और कफ के क्षीण होने पर वायु मर्म स्थानों को विशेष रूप में
पीड़ित करती है। इससे मनुष्य की संज्ञा ( चेतना ) नष्ट हो जाती है, अथवा
मनुष्य कांपता है ॥४५-६१॥
दोषाः प्रवृद्धाः स्वं लिङ्गं दर्शयन्ति यथाबलम् ।
क्षीणा जहति लिङ्गं स्वं, समाः स्वं कर्म कुर्वते ॥ ६२ ॥
बढ़े हुए दोष अपनी शक्ति के अनुसार अपने ( स्वाभाविक ) लक्षणों को
उन्नति की अवस्था में दिखाते हैं। यथा—पित्त का स्वाभाविक लक्षण उष्णत्व
है। बढ़ने पर तीव्र उष्णिमा उत्पन्न करेगा। दोष क्षीण होने पर अपने
स्वाभाविक लक्षणों को छोड़ देते हैं, जैसे पित्त के क्षीण होने से स्वाभाविक
उष्णिमा नहीं रहती। समानावस्था में दोष अपना अपना काम करते हैं ॥६२॥
वातादीनां रसादीनां मलानामोजसस्तथा ।
क्षयास्तत्रानिलादीनामुक्तं संक्षीणलक्षणम् ॥ ६३ ॥
घट्टते सहते शब्दं नोच्चैर्द्रवति दूयते ।
हृदयं ताम्यति स्वल्पचेष्टस्यापि रसक्षये ॥ ६४ ॥
परुषा स्फुटिता म्लाना त्वग्रूक्षा रक्तसंक्षये ।
मांसक्षये विशेषेण स्फिग्ग्रीवोदरशुष्कता ॥ ६५ ॥
सन्धीनां स्फुटनं ग्लानिरक्षणोरायास एव च ।
लक्षणं मेदसः क्षीणे तनुत्वं चोदरस्य च ॥ ६६ ॥
केश-लोम-नख-श्मश्रु-द्विज-प्रपतनं भ्रमः ।
ज्ञेयमस्थिक्षये रूपं सन्धिशैथिल्यमेव च ॥ ६७ ॥
शीर्यन्त इव चास्थीनि दुर्बलानि लघूनि च ।
प्रततं वातरोगाश्च क्षीणे मज्जनि देहिनाम् ॥ ६८ ॥

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२१२ चरकसंहिता [ अ० १७
दौर्बल्यं मुखशोषश्च पाण्डुत्वं सदनं श्रमः ।
क्लैब्यं शुक्राविसर्गश्च क्षीणशुक्रस्य लक्षणम् ॥ ६९ ॥
क्षीणे शकृति चान्त्राणि पीडयन्निव मारुतः ।
रूक्षस्योन्नमयन् कुक्षिं तिर्यगूर्ध्वं च गच्छति ॥ ७० ॥
मूत्रक्षये मूत्रकृच्छ्रं मूत्रवैवर्ण्यमेव च ।
पिपासा बाधते चास्य मुखं च परिशुष्यति ॥ ७१ ॥
मलायनानि चान्यानि शून्यानि च लघूनि च ।
विशुष्काणि च लक्ष्यन्ते यथास्वं मलसंक्षये ॥ ७२ ॥
बिभेति दुर्बलोऽभीक्ष्णं ध्यायति व्यथितेन्द्रियः ।
दुश्छायो दुर्मना रूक्षः क्षामश्चैवौजसः क्षये ॥ ७३ ॥
अठारह प्रकार के क्षय- वात, पित्त, कफ ये तीन दोष; रस-रक्त आदि
धातु, मल, मूत्र, कान का मल, इत्यादि सात मल और ओज इन (अठारह)
के क्षीण होने के लक्षण कहते हैं। इनमें वात, पित्त, कफ के क्षीण अवस्था के
लक्षण कह दिये हैं। रस के क्षीण होने पर हृदय मथा-बिलोया हुआ प्रतीत होता
है, ऊँची आवाज़ को सहन नहीं कर सकता, हृदय जल्दी-जल्दी चलता है।
पीड़ा होती है, ग्लानि होती है और थोड़ी क्रिया होती है, अथवा थोड़ी चेष्टा
से भी हृदय में उद्विग्नता आ जाती है। रक्त का क्षय होने पर त्वचा कठोर
हो जाती है, फट जाती है, झुर्रियां पड़ जाती हैं और रूखी बन जाती है।
मांस के क्षय होने पर-सारा शरीर क्षीण हो जाता है, परन्तु नितम्ब, ग्रीवा और
पेट विशेष रूप से पतले हो जाते हैं। अर्थात् मेद-चर्बी के क्षीण होने पर सन्धियां
टूटने-फूटने लगती हैं, अंगों में ग्लानि, आलस्य, आंखों पर थकान और पेट
पतला हो जाता है। अस्थियों के क्षय होने पर-शिर के बाल, शरीर के रोम,
दाढ़ी-मूंछ के बाल, दांत, नख गिरने लगते हैं। शरीर थका प्रतीत होता है,
और सब सन्धियां शिथिल पड़ जाती हैं। मज्जा के क्षीण होने पर-अस्थियां
मुरझाती गिरती हुई प्रतीत होती हैं, अस्थियां निर्बल और छोटी (हल्की) हो
जाती हैं और वातरोग जोर कर जाते हैं, निरन्तर वात रोग रहने लगता है।
शुक्र के क्षीण होने पर-शरीर में निर्बलता, मुख में सूखापन, चेहरे पर पीलास,
पीड़ा, थकान, पुरुषत्व की न्यूनता, सम्भोग समय में शुक्र का अभाव रहता
है। मल के क्षीण होने पर-वायु आंतों (अन्तड़ियों) को दबाती दुःखी करती
प्रतीत होती है। शरीर अन्दर और बाहर से रूक्ष हो जाता है। वायु पेट को
ऊपर उठाती हुई तिरछी या ऊपर को जाती है (नीचे नहीं जाती)। मूत्र के

अ० १७ ] सूत्रस्थानम् २१३

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अ० १७ ] सूत्रस्थानम् २१३
क्षय होने पर—मूत्र कठिनाई से थोड़ा-थोड़ा आता है, मूत्र का रंग बदल जाता
है। प्यास बहुत लगती है, गला और मुख सूखता है। कान, नाक, आंख
मुख और त्वचा (रोम कूप) इन इन्द्रियों के मलों का क्षय होने से शून्यता,
(ज्ञान की कमी), तथा रूक्षता और हलकापन इन इन्द्रियों में अपने-अपने मल
के क्षय होने से उत्पन्न हो जाता है। ओज (कान्ति) के क्षीण होने पर—
मनुष्य डरने लगता है, निर्बल हो जाता है, बार-बार सोचने लगता है, चिन्ता
करने लगता है, इन्द्रियों का ज्ञान ठीक नहीं रहता, पीड़ित हो जाता है।
शरीर की कान्ति बिगड़ जाती है, मन अनवस्थित हो जाता है, शरीर रूखा
और दुर्बल हो जाता है ॥ ६३-७३ ॥
हृदि तिष्ठति यच्छुद्धं रक्तमीषत्सपीतकम् ।
ओजः शरीरे संख्यातं तन्नाशान्ना विनश्यति ॥ ७४ ॥
(प्रथमं जायते ह्योजः शरीरेऽस्मिन् शरीरिणाम् ।
सर्पिवर्णं मधुरसं लाजगन्धि प्रजायते ॥ १ ॥
भ्रमरैः फलपुष्पेभ्यो यथा संहियते मधु ।
एवमोजः स्वकर्मभ्यो गुणैः संहियते नृणाम् ॥ २ ॥)
ओज का स्वरूप—हृदय के अन्दर जो शुद्ध (निर्मल) और लाल तथा
थोड़ा सा पीला रस आदि धातुओं का सार रस रहता है, उसे 'ओज' कहते
हैं। इसके नष्ट होने से मनुष्य भी नष्ट हो जाता है। जिस प्रकार कि भौंरे फल
और पुष्पों से मधु का संचय करते हैं, उसी प्रकार मनुष्यों के शारीरिक गुणों से
ओज का संग्रह किया जाता है। शरीरधारियों के शरीर में सबसे प्रथम ओज
उत्पन्न होता है। यह ओज घी के समान रंग में, मधुर-रस, और इसमें लाजा
के समान (लाजा धान की खील के समान) गन्ध होती है ॥ ७४ ॥
व्यायामोऽनशनं चिन्ता रूक्षाल्पप्रमिताशनम् ।
वातातपौ भयं शोको रूक्षपानं प्रजागरः ॥ ७५ ॥
कफ-शोणित-शुक्राणां मलानां चातिवर्तनम् ।
कालो भूतोपघातश्च ज्ञातव्याः क्षयहेतवः ॥ ७६ ॥
क्षय के कारण—व्यायाम का अधिक करना, उपवास करना, चिन्ता करना,
रूक्ष, थोड़ा और एक ही रस का खाना, वायु का या धूप का सेवन, भय, शोक,
रूक्ष गुणवाले पदार्थों का पीना, रात में जागना, कफ, रक्त, शुक्र, मल इनका
अधिक त्याग करना, वृद्धावस्था, भूत अर्थात् सूक्ष्म क्रिमि आदि का आक्रमण,
इन कारणों से अठारह प्रकार का क्षय होता है ॥ ७५-७६ ॥

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२१४ चरकसंहिता [ अ० १७
गुरु-स्निग्धाम्ल-लवणं भजतामतिमात्रशः ।
नवमन्नं च पानं च निद्रामास्यासुखानि च ॥ ७७ ॥
त्यक्तव्यायाम-चिन्तानां संशोधनमकूर्वताम् ।
श्लेष्मा पित्तं च मेदश्च मांसं चातिप्रवर्धते ॥ ७८ ॥
तैरावृतगतिर्वायुरोज आदाय गच्छति ।
यदा बस्तिं तदा कृच्छ्रो मधुमेहः प्रवर्तते ॥ ७६ ॥
समारुतस्य पित्तस्य कफस्य च मुहुर्मुहुः ।
दर्शयत्याकृतिं गत्वा क्षयमप्याय्यते पुनः ॥ ८० ॥
उपेक्ष्याऽस्य जायन्ते पिडकाः सप्त दारुणाः ।
मांसलेष्ववकाशेषु मर्मस्वपि च सन्धिषु ॥ ८१ ॥
मधुमेह का कारण- अति मात्रा में गुरु, स्निग्ध, खट्टे या नमकीन पदार्थों
के खाने से, नवीन (नवीन ऋतु के चावल-गेहूँ आदि) अन्न या नया पानी
(बरसात का पानी, कूर्ओ या नदी से पीने पर) अधिक सोने से, ऐश
आरामतलबी का जीवन बिताने से, व्यायाम और चिन्ता न करने से, वमन
विरेचन कर्मों के न करने से, कफ, पित्त, मेद और मांस बहुत बढ़ जाते हैं।
इनके बढ़ने से मार्गों के रुक जाने से वायु आज धातु को लेकर मूत्राशय
(मूत्रसंस्थान) में चली जाती है। तब कष्ट साध्य 'मधुमेह' रोग उत्पन्न होता
है। बढ़े हुए वात, पित्त, कफ के लक्षण प्रथम प्रकट होते हैं। कुछ समय पीछे
इन्हीं दोषों की क्षीणता (क्षय) के लक्षण दीखने लगते हैं, और फिर बढ़े हुए
दोषों के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। इस समय उपेक्षा करने से सात भयानक
पिड़कायें अधिक मांस से युक्त स्थानों में, मर्मस्थानों में और सन्धियों में उत्पन्न
हो जाती हैं ॥ ७५-८१ ॥
शराविका कच्छपिका जालिनी सर्षपी तथा ।
अलजी विनताख्या च विद्रधी चेति सप्तमी ॥ ८२ ॥
अन्तोन्नता मध्यनिम्ना श्यावा क्लेदरुजान्विता ।
शराविका स्यात्पिडका शरावाकृतिसंस्थिता ॥ ८३ ॥
अवगाढार्ति-निस्तोदा महावास्तु-परिग्रहा ।
श्लक्ष्णा कच्छपपृष्ठाभा पिडका कच्छपी मता ॥ ८४ ॥
स्तब्धा शिराजालवती स्निग्धश्रावा महाशया ।
रुजा-निस्तोद-बहुला सूक्ष्मच्छिद्रा च जालिनी ॥ ८५ ॥
पिडका नातिमहती क्षिप्रपाका महारुजा ।

अ० १७] सूत्रस्थानम् २१५

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अ० १७] सूत्रस्थानम् २१५
सर्पपी सर्पपाभाभिः पिडकाभिश्चिता भवेत् ॥ ८६ ॥
दहति त्वचमुत्थाने तृष्णा-मोह-ज्वर-प्रदा ।
विसर्पत्यनिशं दुःखाहत्यग्निरिवाऽलजी ॥ ८७ ॥
अवगाढ-रुजा-क्लेदा पृष्ठे वाऽप्युदरेऽपि वा ।
महती विनता नीला पिडका विनता मता ॥ ८८ ॥
सात पिड़कायें—शराविका, कच्छपिका, जालिनी, सर्पपी, अलजी, विनता
और विद्रधि ये सात प्रकार की पिड़कायें उत्पन्न होती हैं। किनारों से ऊँची
और बीच से दबी, श्याव अर्थात् ऊदे रंग की, स्रावयुक्त और पीड़ायुक्त, यह
पिड़का शराव (परई, सकोरा के ) के आकार की होती है, इसे शराविका कहते
हैं। जो गम्भीर वेदना वाली दर्दयुक्त, महावस्तु का आश्रय करके रहती है
[बहुत अधिक स्थान घेरा हो] ऊपर से चिकनी और कछुवे की पीठ के समान
ऊपर से उठी पिड़का 'कच्छपी' होती है। जड़ (न हिलने वाली), शिराओं
के जालयुक्त, चिकने स्रावयुक्त, बड़े आशय में आश्रित, दर्द और चुभने की
सी वेदनायुक्त तथा छोटे-छोटे छेदों से घिरी पिड़का 'जालिनी' होती है। बहुत
बड़ी नहीं, जल्दी पकने वाली, बहुत वेदना युक्त, सरसों के आकार की छोटी-छोटी
पिड़काओं से घिरी पिड़का 'सर्पपी' है। अलजी पिड़का के उत्पन्न होने पर
त्वचा जलने लगती है, तृष्णा, मूर्च्छा, ज्वर होता है। रात दिन दुःखी करती
है, अग्नि के समान दुःख से रोगी जलता है, इसका नाम 'अलजी' है। जिस
में स्राव बहुत गाढ़ा हो, बहुत सख्त वेदना हो, स्राव हो, पिड़का पीठ या
उदर में हो, बहुत बड़ी, दबी हुई सी, नीले रंग की पिडका को 'विनता'
कहते हैं ॥ ८२-८८ ॥
विद्रधिं द्विविधामाहुर्बाह्यामाभ्यन्तरीं तथा ।
बाह्या त्वक्स्नायु-मांसोत्था कण्डराभा महारुजा ॥ ८९ ॥
शीतकाम्लविदाह्युष्ण-रूक्ष-शुष्कातिभोजनात् ।
विरुद्धाजीर्ण-संक्लिष्ट-विषमासात्म्य-भोजनात् ॥ ९० ॥
व्यापन्न-बहु-मद्यत्वाद्द्वेगसंधारणाच्छ्रमात् ।
जिह्म-व्यायाम-शयनादतिभाराध्वमैथुनात् ॥ ९१ ॥
अन्तःशरीरे मांसासृगाविशन्ति यदा मलाः ।
तदा संजायते ग्रन्थिर्गम्भीरस्थः सुदारुणः ॥ ९२ ॥
हृदये क्लोम्नि यकृति प्लीह्नि कुक्षौ च वृक्कयोः ।
नाभ्यां वङ्क्षणयोर्वापि बस्तौ वा तीव्रवेदनः ॥ ९३ ॥