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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

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आंख ) में सफेद रंग और शरीर में रूक्षता अर्थात् रूखापन आ जाता है ।
कफ के क्षीण होने पर, वायु और पित्त दोनों कुपित होकर जो लक्षण शरीर में
उत्पन्न करते हैं, उनको संक्षेप से सुनो। शिर में चक्कर आना ऐंठन की पीड़ा,
चुभने की सी दर्द, जलन, शरीर का फटना, कम्पन, अंगों का टूटना, शुष्कता,
पीड़ा और धूप में बैठने से जैसे अंग गरम हो जाते हैं ऐसी जलन होती है ।
वात और पित्त दोनों क्षीण हों, केवल कफ बढ़ा हो तो—सब स्रोतों को कफ
रोक लेता है। इससे क्रियायें नष्ट हो जाती हैं, मूर्च्छा, जीभ-वाणी का बन्द हो
जाना, होता है। कफ और वात के क्षीण होने पर पित्त गति करता हुआ
शरीर के ओज ( कान्ति ) को चलायमान कर देता है। शरीर में ग्लानि,
थकान, इन्द्रियों की दुर्बलता, प्यास, मूर्च्छा और चेष्टाओं का नाश हो जाता
है। पित्त और कफ के क्षीण होने पर वायु मर्म स्थानों को विशेष रूप में
पीड़ित करती है। इससे मनुष्य की संज्ञा ( चेतना ) नष्ट हो जाती है, अथवा
मनुष्य कांपता है ॥४५-६१॥
दोषाः प्रवृद्धाः स्वं लिङ्गं दर्शयन्ति यथाबलम् ।
क्षीणा जहति लिङ्गं स्वं, समाः स्वं कर्म कुर्वते ॥ ६२ ॥
बढ़े हुए दोष अपनी शक्ति के अनुसार अपने ( स्वाभाविक ) लक्षणों को
उन्नति की अवस्था में दिखाते हैं। यथा—पित्त का स्वाभाविक लक्षण उष्णत्व
है। बढ़ने पर तीव्र उष्णिमा उत्पन्न करेगा। दोष क्षीण होने पर अपने
स्वाभाविक लक्षणों को छोड़ देते हैं, जैसे पित्त के क्षीण होने से स्वाभाविक
उष्णिमा नहीं रहती। समानावस्था में दोष अपना अपना काम करते हैं ॥६२॥
वातादीनां रसादीनां मलानामोजसस्तथा ।
क्षयास्तत्रानिलादीनामुक्तं संक्षीणलक्षणम् ॥ ६३ ॥
घट्टते सहते शब्दं नोच्चैर्द्रवति दूयते ।
हृदयं ताम्यति स्वल्पचेष्टस्यापि रसक्षये ॥ ६४ ॥
परुषा स्फुटिता म्लाना त्वग्रूक्षा रक्तसंक्षये ।
मांसक्षये विशेषेण स्फिग्ग्रीवोदरशुष्कता ॥ ६५ ॥
सन्धीनां स्फुटनं ग्लानिरक्षणोरायास एव च ।
लक्षणं मेदसः क्षीणे तनुत्वं चोदरस्य च ॥ ६६ ॥
केश-लोम-नख-श्मश्रु-द्विज-प्रपतनं भ्रमः ।
ज्ञेयमस्थिक्षये रूपं सन्धिशैथिल्यमेव च ॥ ६७ ॥
शीर्यन्त इव चास्थीनि दुर्बलानि लघूनि च ।
प्रततं वातरोगाश्च क्षीणे मज्जनि देहिनाम् ॥ ६८ ॥