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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

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DevanagariSanskritpublished639 pages

Page 231 of 639

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Page 231

अ० १७ ] सूत्रस्थानम् २१३
क्षय होने पर—मूत्र कठिनाई से थोड़ा-थोड़ा आता है, मूत्र का रंग बदल जाता
है। प्यास बहुत लगती है, गला और मुख सूखता है। कान, नाक, आंख
मुख और त्वचा (रोम कूप) इन इन्द्रियों के मलों का क्षय होने से शून्यता,
(ज्ञान की कमी), तथा रूक्षता और हलकापन इन इन्द्रियों में अपने-अपने मल
के क्षय होने से उत्पन्न हो जाता है। ओज (कान्ति) के क्षीण होने पर—
मनुष्य डरने लगता है, निर्बल हो जाता है, बार-बार सोचने लगता है, चिन्ता
करने लगता है, इन्द्रियों का ज्ञान ठीक नहीं रहता, पीड़ित हो जाता है।
शरीर की कान्ति बिगड़ जाती है, मन अनवस्थित हो जाता है, शरीर रूखा
और दुर्बल हो जाता है ॥ ६३-७३ ॥
हृदि तिष्ठति यच्छुद्धं रक्तमीषत्सपीतकम् ।
ओजः शरीरे संख्यातं तन्नाशान्ना विनश्यति ॥ ७४ ॥
(प्रथमं जायते ह्योजः शरीरेऽस्मिन् शरीरिणाम् ।
सर्पिवर्णं मधुरसं लाजगन्धि प्रजायते ॥ १ ॥
भ्रमरैः फलपुष्पेभ्यो यथा संहियते मधु ।
एवमोजः स्वकर्मभ्यो गुणैः संहियते नृणाम् ॥ २ ॥)
ओज का स्वरूप—हृदय के अन्दर जो शुद्ध (निर्मल) और लाल तथा
थोड़ा सा पीला रस आदि धातुओं का सार रस रहता है, उसे 'ओज' कहते
हैं। इसके नष्ट होने से मनुष्य भी नष्ट हो जाता है। जिस प्रकार कि भौंरे फल
और पुष्पों से मधु का संचय करते हैं, उसी प्रकार मनुष्यों के शारीरिक गुणों से
ओज का संग्रह किया जाता है। शरीरधारियों के शरीर में सबसे प्रथम ओज
उत्पन्न होता है। यह ओज घी के समान रंग में, मधुर-रस, और इसमें लाजा
के समान (लाजा धान की खील के समान) गन्ध होती है ॥ ७४ ॥
व्यायामोऽनशनं चिन्ता रूक्षाल्पप्रमिताशनम् ।
वातातपौ भयं शोको रूक्षपानं प्रजागरः ॥ ७५ ॥
कफ-शोणित-शुक्राणां मलानां चातिवर्तनम् ।
कालो भूतोपघातश्च ज्ञातव्याः क्षयहेतवः ॥ ७६ ॥
क्षय के कारण—व्यायाम का अधिक करना, उपवास करना, चिन्ता करना,
रूक्ष, थोड़ा और एक ही रस का खाना, वायु का या धूप का सेवन, भय, शोक,
रूक्ष गुणवाले पदार्थों का पीना, रात में जागना, कफ, रक्त, शुक्र, मल इनका
अधिक त्याग करना, वृद्धावस्था, भूत अर्थात् सूक्ष्म क्रिमि आदि का आक्रमण,
इन कारणों से अठारह प्रकार का क्षय होता है ॥ ७५-७६ ॥