चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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कारण नहीं होता। इसलिये कुछ आचार्य पदार्थों के निरन्तर विनाश में कारण
की अपेक्षा नहीं करते हैं। कुछ विद्वान् पदार्थों के नाश में उत्पादक या प्रवर्तक
कारण के अभाव को ही कारण मानते हैं ॥२७-२८॥
एवमुक्तार्थमाचार्यमग्निवेशोऽभ्यभाषत ।
स्वभावोपरमे कर्म चिकित्साप्राभृतस्य किम् ॥ २९ ॥
भेषजैर्विषमान् धातून् कान समीकुरुते भिषक् ।
का वा चिकित्सा भगवन् किमर्थं वा प्रयुज्यते ॥ ३० ॥
तच्छिष्यवचनं श्रुत्वा व्याजहार पुनर्वसुः ।
इस प्रकार कहते हुए आचार्य पुनर्वसु को लक्ष्य करके अग्निवेश बोले—
भगवन् ! शरीर की धातुवें जब स्वतः अपने स्वभाव में आ जाती हैं तब चिकित्सा
के साधनों से सम्पन्न वैद्य से कर्म साध्य क्या है। फिर क्या काम ? और तब
किन विषम हुए धातुओं को ओषधियों से वैद्य समान करता है ? और यदि
धातुओं की विषमता ही सदा रहे, तब चिकित्सा क्या वस्तु है ? और यदि
विषमता का नाश सदा होना ही अवश्यम्भावी है, फिर वैद्य किस लिये चिकित्सा
कर्म करते हैं ? इस प्रकार अग्निवेश के वचन को सुनकर पुनर्वसु आत्रेय बोले॥
श्रूयतामत्र या सौम्य युक्तिर्दृष्टा महर्षिभिः ॥ ३१ ॥
न नाशकारणाभावाद्भावानां नाशकारणम् ।
ज्ञायते नित्यगस्येव कालस्यात्ययकारणम् ॥ ३२ ॥
शीघ्रगत्वाद्यथाभूतस्तथा भावो विपद्यते ।
निरोधे कारणं तस्य नास्ति नैवान्यथाक्रिया ॥ ३३ ॥
याभिः क्रियाभिर्जायन्ते शरीरे धातवः समाः ।
सा चिकित्सा विकाराणां कर्म तद्भिषजां स्मृतम् ॥ ६४ ॥
कथं शरीरे धातूनां वैषम्यं न भवेदिति ।
समानां चानुबन्धः स्यादित्यर्थं क्रियते क्रिया ॥ ३५ ॥
त्यागाद्विषमहेतूनां समानां चोपसेवनात् ।
विषमा नानुबध्नन्ति जायन्ते धातवः समाः ॥ ३६ ॥
समैस्तु हेतुभिर्यस्माद्धातून् संजनयेत्समान् ।
चिकित्साप्राभृतस्तस्माद्दाता देहसुखायुषाम् ॥ ३७ ॥
धर्मस्यार्थस्य कामस्य नृलोकस्योभयस्य च ।
दाता संपद्यते वैद्यो दानाद्देहसुखायुषाम् ॥ ३८ ॥
हे सौम्य ! जो युक्ति महर्षियों ने बुद्धि द्वारा देखी, वह सुनो। नित्यगमन-