चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
Page 224 of 639
Read in context२०६ चरकसंहिता [अ० १७
में होती है। कृमि जन्य शिरोरोग—तिल, दूध, गुड़ इनके अधिक सेवन से,
अजीर्ण और दुग्धयुक्त सड़ा गला भोजन करने से, संकीर्ण ( बहुत गड़बड़
चीजें मिलाकर) भोजन करने से शिर के वातादि दोष बढ़कर शिर में रक्त,
कफ और मांस को दूषित बनाकर रोग उत्पन्न करते हैं। पाप करनेवाले
पुरुष के शिर में इस क्लेद से कीड़े उत्पन्न होकर बीभत्स अर्थात् घृणाजनक
भयंकर शिरोरोग उत्पन्न करते हैं। इससे काटने, छेदने, के समान पीड़ा, खाज,
सूजन, दुर्गन्ध और बहुत अधिक कष्ट होता है। इन लक्षणों को तथा कृमियों
को देखकर कृमिरोग समझना चाहिये ॥ २२–२६॥
पांच प्रकार के हृदयरोग—
शोकोपवास-व्यायाम-शुष्क-रूक्षालप-भोजनैः ॥ ३० ॥
वायुराविश्य हृदयं जनयत्युत्तमां रुजम् ।
वेपथुर्वेष्टनं स्तम्भः प्रमोहः शून्यता दरः ॥ ३१ ॥
हृदि वातातुरे रूपं जीर्णे चात्यर्थवेदना ।
उष्णाम्ल-लवण-क्षार-कटुकाजीर्ण-भोजनैः ॥ ३२ ॥
मद्यक्रोधातपेश्चाशु हृदि पित्तं प्रकुप्यति ।
हृद्दाहस्तिक्तता वक्त्रे तिक्ताम्लोद्गिरणं क्लमः ॥ ३३ ॥
तृष्णा मूर्च्छा भ्रमः स्वेदः पित्त-हृद्रोगलक्षणम् ।
अत्यादानं गुरुस्निग्धमचिन्तनमचेष्टनम् ॥ ३४ ॥
निद्रासुखं वाप्यधिकं कफहृद्रोगकारणम् ।
हृदयं कफहृद्रोगे सुप्त-स्तिमितभारिकम् ॥ ३५ ॥
तन्द्रा-रुचि-परीतस्य भवत्यश्मावृतं यथा ।
हेतु-लक्षण-संसर्गादुच्यते सान्निपातिकः ॥ ३६ ॥
( हृद्रोगः कष्टदः कष्टसाध्य उक्तो महर्षिभिः )
त्रिदोषजे तु हृद्रोगे यो दुरात्मा निषेवते ।
तिल-क्षीर-गुडादीनि ग्रन्थिस्तस्योपजायते ॥ ३७ ॥
मर्मैकदेशे संक्लेदं रसश्चास्योपगच्छति ।
संक्लेदात्कृमयश्चास्य भवन्त्युपहतात्मनः ॥ ३८ ॥
मर्मैकदेशे संजाताः सर्पन्तो भक्षयन्ति च ।
तुद्यमानं स हृदयं सूचीभिरिव मन्यते ॥ ३९ ॥
छिद्यमानं यथा शस्त्रैर्जात-कण्डू-महारुजम् ।
हृद्रोगं क्रिमिजं त्वेतैर्लिङ्गैर्बुद्ध्वा सुदारुणम् ।
त्वरेत जेतुं तं विद्वान् विकारं शीघ्रकारिणम् ॥४०॥