चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in contextअ० १६] सूत्रस्थानम् १६६
को बढ़ाने वाले भोजन देवे । यथा घी, मांस रस, दूध, हृदय के लिये हितकारी
या मन को अच्छे लगने वाले यूष आदि बना कर देवे । शरीर पर तेल मलना,
उबटन लगाना, स्नान, निरूह बस्ति, अनुवासनबस्ति का प्रयोग करे । इस प्रकार
करने से सुख मिलता है तथा देर तक आयु का भोगता है ॥१७-२३॥
अतियोग होने पर क्या करना चाहिये—
अतियोगानुबद्धानां सर्पिःपानं प्रशस्यते ।
तैलं मधुरकैः सिद्धमथवाऽप्यनुवासनम् ॥ २४ ॥
यस्य त्वयोगस्तं स्निग्धं पुनः संशोधयेन्नरम् ।
मात्रा-काल-बलापेक्षी स्मरन् पूर्वमनुक्रमम् ॥ २५ ॥
स्नेहने स्वेदने शुद्धौ रोगाः संसर्जने च ये ।
जायन्तेऽमार्गविहिते तेषां सिद्धिषु साधनम् ॥ २६ ॥
जिन पुरुषों में अतियोग के लक्षण हों, उनके लिये उन-उन रोगों को
शान्त करने वाली उन औषधियों से सिद्ध किया घृत पान करावे और मधुक
अर्थात् जीवनीयगण से सिद्ध तैल अनुवासन बस्ति के रूप में दे। जिस पुरुष
में अयोग के लक्षण हों, उसको फिर से स्नेह और स्वेद देकर, पूर्व कही हुई मात्रा
को, समय, बल आदि को क्रम से स्मरण करता हुआ, फिर से संशोधन के लिये
देवे । स्नेहन, स्वेदन संशोधन और पेयादि क्रम से विधिपूर्वक क्रिया न होने से
जो रोग उत्पन्न हो जाते हैं, उनको चिकित्सा 'सिद्धिस्थान' में कहेंगे । पहले जो
मात्रा दी थी दुबारा उससे कुछ अधिक देवे ॥२४-२६॥
जायन्ते हेतुवैषम्याद्विषमा देहधातवः ।
हेतुसाम्यात्समास्तेषां स्वभावोपरमः सदा ॥ २७ ॥
प्रवृत्तिहेतुर्भावानां न निरोधेऽस्ति कारणम् ।
केचित्स्वत्रापि मन्यन्ते हेतुं हेतोरवर्तनम् ॥ २८ ॥
शरीर को धारण करने वाले जो धातु हैं वे कारणों की विषमता अर्थात्
बढ़ने या घटने से बढ़ते या घटते हैं और शरीर के धातु कारण की समानता से
समान रहा करते हैं। विषम और सम धातुओं का सदा स्वभाव से नाश होता
है। इस समता और विषमता की निरन्तर प्रवृत्ति में ऐसा कारण रहता है
जिससे कि उनका वृद्धि और क्षय होता है, अर्थात् साम्य या विषमता के होने
में कोई कारण अवश्य होता है, बिना कारण इनके स्वाभाविक धर्म में अन्तर
नहीं आता । धातु एक क्षण भी विषमावस्था में नहीं रह सकते। यह उनका
धर्म है। सब पदार्थों की उत्पत्ति का कारण होता है, परन्तु विनाश कार्य में