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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

७४६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३

७४६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| अन्यायेन, ततो मच्छापदग्धस्य मूर्धा शिरस्ते तव विस्पष्टं पतिष्यति। | मेरे शापसे दग्ध तुम्हारा मूर्धा-शिर विस्पष्टतया (निश्चय ही) गिर जायगा।' |
| एवमुक्तो याज्ञवल्क्य आह—<br>वेद जानाम्यहं हे गौतमेति गोत्रतः, तत् सूत्रं यद् गन्धर्वस्तुभ्यमुक्तवान् यं चान्तर्यामिणं गन्धर्वाद् विदितवन्तो यूयम्, तं चान्तर्यामिणं वेदाहमिति। | इस प्रकार कहे जानेपर याज्ञवल्क्यने 'हे गौतम!' इस प्रकार गोत्रतः सम्बोधन करते हुए कहा, 'तुम्हारे प्रति गन्धर्वने जिस सूत्रका वर्णन किया है, उसे मैं जानता हूँ तथा तुमलोगोंने जिस अन्तर्यामीको गन्धर्वसे जाना है, उस अन्तर्यामीको भी मैं जानता हूँ।' |
| एवमुक्ते प्रत्याह गौतमः—<br>यः कश्चित् प्राकृत इदं यत्त्वयोक्तं ब्रूयात्—कथम् ? वेद वेदेति—आत्मानं श्लाघयन्, किं तेन गर्जितेन कार्येण दर्शय; यथा वेत्थ तथा ब्रूहीति ॥ १ ॥ | याज्ञवल्क्यके इस प्रकार कहनेपर गौतमने उत्तरमें कहा, 'जो कोई साधारण पुरुष भी ऐसा, जैसा कि तुमने कहा है, कह सकता है; किस प्रकार कह सकता है? 'मैं जानता हूँ, मैं जानता हूँ' इस प्रकार अपनी बड़ाई करता हुआ कह सकता है, परंतु उसके उस गर्जनसे क्या लाभ है? तुम कार्यद्वारा उसे दिखाओ जैसा जानते हो वैसा कहो' ॥ १ ॥ |

सूत्रका निरूपण

स होवाच वायुर्वै गौतम तत् सूत्रं वायुना वै गौतम सूत्रेणायं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि