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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

६७४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ ]

६७४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३ ]

| मोक्षजनकत्वमित्यनूद्य दूषयति—<br>मारभत इति; तन्न; अनारभ्यत्वान्मोक्षस्य। बन्धननाश एव हि मोक्षः; न कार्यभूतः; बन्धनं चाविद्येत्यवोचाम; अविद्यायाश्च न कर्मणा नाश उपपद्यते, दृष्टविषयत्वाच्च कर्मसामर्थ्यस्य। उत्पत्त्याप्तिविकारसंस्कारा हि कर्मसामर्थ्यस्य विषयाः। उत्पादयितुं प्रापयितुं विकर्तुं संस्कर्तुं च सामर्थ्यं कर्मणो नातो व्यतिरिक्तविषयोऽस्ति कर्मसामर्थ्यस्य, लोके अप्रसिद्धत्वात्; न च मोक्ष एषां पदार्थानामन्यतमः, अविद्यामात्रव्यवहित इत्यवोचाम। | करता है,' सो ठीक नहीं है; क्योंकि मोक्षका आरम्भ होनेवाला नहीं है। मोक्ष तो बन्धनका नाशमात्र ही है, वह किसीका कार्य नहीं है और बन्धन अविद्या है—ऐसा हम कह चुके हैं। तथा अविद्याका कर्मसे नाश होना सम्भव नहीं है; क्योंकि जिनमें कर्मका सामर्थ्य है, वे विषय तो प्रत्यक्ष हैं। उत्पत्ति, प्राप्ति, विकार और संस्कार ही कर्मके सामर्थ्यके विषय हैं। उत्पन्न करने, प्राप्त कराने, विकार करने और संस्कार करनेमें ही कर्मका सामर्थ्य है; कर्मके सामर्थ्यका इनसे भिन्न कोई विषय नहीं है; कारण, लोकमें कर्मके सामर्थ्यका कोई अन्य विषय प्रसिद्ध नहीं है; और इनमेंसे ही किसी एक पदार्थका नाम मोक्ष है नहीं, वह तो केवल अविद्यासे ही व्यवधानयुक्त है—ऐसा हम कह चुके हैं। |
| बाढम्, भवतु केवलस्यैव कर्मण एवंस्वभावता, विद्यासंयुक्तस्य तु निरभिसन्धेः भवत्य- | पूर्व०—ठीक है, केवल कर्मका ऐसा ही स्वभाव रहे, किंतु जो ज्ञानसहित और फलाशासे रहित है, |


१. तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार केवल विष और दही मृत्यु तथा ज्वरादिके कारण होते हैं किंतु औषधविशेष और शर्कराके साथ सेवन किये जानेपर वे ही आरोग्यवर्द्धक हो जाते हैं, उसी प्रकार यद्यपि केवल कर्म बन्धनका कारण है, तथापि निष्काम और ज्ञानके सहित होनेपर वही मुक्तिका कारण हो जाता है।