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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

५२४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २

५२४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| तथा प्रयोगदर्शनात् । त्यस्य ह्येष रस इति पूर्ववद्विशेषतोऽग्रहणादमूर्तत्वसारत्वे एव हेत्वर्थः ॥ ५ ॥ | है। 'यह त्यत्‌का ही सार है' यह कथन पूर्ववत् विशेषरूपसे ग्रहण न होनेके कारण त्यत् (अमूर्त दोनों भूतों) का दक्षिण नेत्रस्थित पुरुषके अमूर्तत्व और सारत्वमें ही हेतुत्व प्रतिपादन करनेके लिये है ॥५॥ |


इन्द्रियात्मा पुरुषके स्वरूपका वर्णन

| ब्रह्मण उपाधिभूतयोर्मूर्तामूर्तयोः कार्यकारणविभागेन अध्यात्माधिदैवतयोर्विभागो व्याख्यातः सत्यशब्दवाच्ययोः। अथेदानीम्— | 'सत्य' शब्दके वाच्य एवं ब्रह्मके उपाधिभूत अध्यात्म और अधिदैवत मूर्तामूर्तके विभागका कार्यकारणभेदसे विभाग किया गया। अब — |

तस्य हैतस्य पुरुषस्य रूपम् । यथा महारजनं वासो यथा पाण्ड्वाविकं यथेन्द्रगोपो यथाग्न्यर्चिर्यथा पुण्डरीकं यथा सकृद्विद्युत्तँ सकृद्विद्युत्तेव ह वा अस्य श्रीर्भवति य एवं वेदाथात आदेशो नेति नेति न ह्येतस्मादिति नेत्यन्यत्परमस्त्यथ नामधेयँ सत्यस्य सत्यमिति प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम् ॥ ६ ॥

उस इस पुरुषका रूप [ऐसा] है जैसा हल्दीमें रँगा हुआ वस्त्र, जैसा सफेद ऊनी वस्त्र, जैसा इन्द्रगोप¹, जैसी अग्निकी ज्वाला, जैसा श्वेत कमल और जैसी बिजलीकी चमक होती है। जो ऐसा जानता है, उसकी श्री बिजलीकी चमकके समान [ सर्वत्र एक साथ फैलनेवाली ] होती है। अब इसके पश्चात् 'नेति नेति' यह ब्रह्मका आदेश है। 'नेति नेति' इससे बढ़कर कोई उत्कृष्ट आदेश नहीं है। 'सत्यका सत्य' यह उसका नाम है। प्राण ही सत्य हैं, उनका यह सत्य है ॥ ६ ॥


१. वर्षा ऋतुमें उत्पन्न होनेवाला एक लाल रंगका कीड़ा।