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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

| ४७८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |

४७८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

संस्कृतहिन्दी
प्रत्ययकर्मणि पितृपैतामहीमात्मनः पदवीमनुवर्तते राजाहमस्मीति ।मानकर अपने बाप-दादोंके मार्गका अनुसरण करने लगता है ।
तथा किलायं परस्मादग्निविस्फुलिङ्गादिवत्तज्जातिरेव विभक्त इह देहेन्द्रियादिगहने प्रविष्टोऽसंसारी सन् देहेन्द्रियादिसंसारधर्ममनुवर्तते ‘देहेन्द्रियसङ्घातोऽस्मि कृशः स्थूलः सुखी दुःखी’ इति परमात्मतामजानन्नात्मनः । न त्वमेतदात्मकः परमेव ब्रह्मास्यसंसारीति प्रतिबोधित आचार्येण हित्वैषणात्रयानुवृत्तिं ब्रह्मैवास्मीति प्रतिपद्यते । अत्र राजपुत्रस्य राजप्रत्ययवद्ब्रह्मप्रत्ययो दृढीभवति—विस्फुलिङ्गवदेव त्वं परस्माद् ब्रह्मणो भ्रष्ट इत्युक्ते विस्फुलिङ्गस्य प्रागग्नेर्भ्रंशाद्दग्न्येकत्वदर्शनात् ।<br>तस्मादेकत्वप्रत्ययदाढ्र्याय सुवर्णमणिलोहाग्निविस्फुलिङ्गदृष्टान्ताः,इसी प्रकार अग्निकी चिनगारियोंके समान परमात्मासे विभक्त यह उसी (परमात्मा) की जातिवाला विज्ञानात्मा यहाँ देह एवं इन्द्रियादि गहनवनमें प्रविष्ट होनेपर असंसारी होकर भी अपनी परमात्मस्वरूपताको न जाननेके कारण ‘मैं देहेन्द्रियादिका संघात तथा कृश, स्थूल एवं सुखी या दुखी हूँ’ ऐसा मानकर देह एवं इन्द्रियादि सांसारिक धर्मोंका अनुवर्तन करता है। किंतु ‘तू देहेन्द्रियादिरूप नहीं है, अपि तु असंसारी ब्रह्म ही है’ इस प्रकार आचार्यद्वारा बोध कराये जानेपर यह एषणात्रयकी अनुवृत्तिको छोड़कर ‘मैं ब्रह्म ही हूँ’ ऐसा जान लेता है। तथा यहाँ ऐसा कहनेपर कि ‘तू अग्निसे विस्फुलिङ्गके समान परब्रह्मसे ही च्युत हुआ है’ राजपुत्रके राजप्रत्ययके समान उसका ब्रह्मप्रत्यय दृढ़ हो जाता है, क्योंकि अग्निसे च्युत होनेसे पूर्व विस्फुलिङ्गकी अग्निके साथ एकता देखी गयी है।<br>अतः सुवर्ण, मणि, लोह एवं अग्नि-विस्फुलिङ्गादि दृष्टान्त एकत्वज्ञानकी दृढ़ताके लिये हैं,