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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
४५२ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय २
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४५२ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय २
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| कुमारो वा अत्यन्तबालो वा, महाराजो वात्यन्तवश्यप्रकृतिर्यथोक्तकृत्, महाब्राह्मणो वा अत्यन्तपरिपक्वविद्याविनयसम्पन्नः, अतिघ्नीम्—अतिशयेन दुःखं हन्तीत्यतिघ्नी आनन्दस्यावस्था सुखावस्था तां प्राप्य गत्वा शयीतावतिष्ठेत। | प्रकार कुमार—अत्यन्त छोटा बालक, अथवा जिसकी प्रजा अत्यन्त वशमें की हुई है, ऐसा कोई शास्त्रोक्त आचरण करनेवाला महाराज, अथवा अत्यन्त परिपक्व विद्या-विनय-सम्पन्न महाब्राह्मण 'अतिघ्नीम्'—जो अतिशयरूपसे दुःखका घात कर देती है ऐसी जो अतिघ्नी आनन्दकी अवस्था यानी सुखावस्था है, उसको प्राप्त होकर शयन करे अर्थात् स्थित हो। |
| एषां च कुमारादीनां स्वभावस्थानां सुखं निरतिशयं प्रसिद्धं लोके, विक्रियमाणानां हि तेषां दुःखं न स्वभावतः; तेन तेषां स्वाभाविक्यवस्था दृष्टान्तत्वेनोपादीयते प्रसिद्धत्वात्। न तेषां स्वाप एवाभिप्रेतः, स्वापस्य दार्ष्टान्तिकत्वेन विवक्षितत्वाद्विशेषाभावाच्च। विशेषे हि सति दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकभेदः स्यात्; तस्मान्न तेषां स्वापो दृष्टान्तः। | अपने स्वभावमें स्थित इन कुमारादिका सुख लोकमें सबसे बढ़कर प्रसिद्ध है, उन्हें विकृत होनेपर ही दुःख होता है, स्वभावतः नहीं; अतः प्रसिद्ध होनेके कारण उनकी स्वाभाविक अवस्थाको दृष्टान्तरूपसे ग्रहण किया जाता है। यहाँ केवल उनकी सुषुप्तावस्थासे ही अभिप्राय नहीं है; क्योंकि सुषुप्तावस्था तो दार्ष्टान्तिकरूपसे ही ग्रहण की गयी है, इसलिये फिर तो दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिकमें कोई विशेषता ही नहीं रहेगी। और दृष्टान्त-दार्ष्टान्तिकका भेद किसी विशेषताके रहनेपर ही हो सकता है; इसलिये यहाँ उनकी सुषुप्ति दृष्टान्त नहीं है। |
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ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५३
| एवमेव यथायं दृष्टान्तः, एष विज्ञानमय एतच्छयनं शेते इति, एतच्छब्दः क्रियाविशेषणार्थः । एवमयं स्वाभाविके स्वे आत्मनि सर्वसंसारधर्मातीतो वर्तते स्वापकाल इति ॥१९॥ | इसी प्रकार, जैसा कि यह दृष्टान्त है, यह विज्ञानमय 'एतत् शेते'—इस शयनमें सोता है। यहाँ 'एतत्' शब्द क्रियाविशेषणार्थक है। अर्थात् इस प्रकार सुषुप्तावस्थामें यह अपने स्वाभाविक स्वरूपमें सारे सांसारिक धर्मोंसे अतीत होकर विद्यमान रहता है ॥ १६॥ |
|---|---|
| [कुत एतदागादिति प्रश्नो मीमांस्यते]<br>क्वैष तदाभूदित्यस्य प्रश्नस्य प्रतिवचनमुक्तम् । अनेन च प्रश्ननिर्णयेन विज्ञानमयस्य स्वभावतो विशुद्धिरसंसारित्वं चोक्तम्। कुत एतदागात् ? इत्यस्य प्रश्नस्यापाकरणार्थ आरम्भः । | 'उस समय यह कहाँ था ?' इस प्रश्नका उत्तर कह दिया गया । इस प्रश्नके निर्णयसे ही विज्ञानमय आत्माकी स्वभावतः विशुद्धि और असंसारिता भी बतला दी गयी । अब 'यह कहाँसे आया ?' इस प्रश्नके निराकरणके लिये आरम्भ किया जाता है । |
| ननु यस्मिन्ग्रामे नगरे वा यो भवति सोऽन्यत्र गच्छंस्तत एव ग्रामान्नगराद्वा गच्छति नान्यतः तथा सति क्वैष तदाभूदित्येतावानेवास्तु प्रश्नः । यत्राभूत्तत एवागमनं प्रसिद्धं स्यान्नान्यत इति कुत एतदागादिति प्रश्नो निरर्थक एव । | पूर्व०—जो पुरुष जिस ग्राम या नगरमें रहता है, वह अन्यत्र जाते समय उसी ग्राम या नगरसे जाता है, किसी अन्य स्थानसे नहीं । ऐसी स्थितिमें 'उस समय यह कहाँ था ?' बस, इतना ही प्रश्न हो सकता है । जहाँ वह था, वहींसे उसका आगमन प्रसिद्ध होगा, अन्य स्थानसे नहीं । इसलिये 'यह कहाँसे आया ?' यह प्रश्न निरर्थक ही है । |
| किं श्रुतिरुपालभ्यते भवता ? | सिद्धान्ती—क्या आप श्रुतिको उलाहना देते हैं ? |
| न । | पूर्व०—नहीं । |