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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

४१४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २

४१४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २


गार्ग्यद्वारा जलान्तर्गत ब्रह्मका प्रतिपादन तथा अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान

स होवाच गार्ग्यो य एवायमप्सु पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठाः प्रतिरूप इति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते प्रतिरूपꣳहैवैनमुपगच्छति नाप्रतिरूपमथो प्रतिरूपोऽस्माजायते ॥ ८ ॥

वह गार्ग्य बोला, 'यह जो जलमें पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' उस अजातशत्रुने कहा, 'नहीं नहीं, इसके विषयमें बात मत करो। इसकी मैं 'प्रतिरूप' रूपसे उपासना करता हूँ।' जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है उसके पास प्रतिरूप ही आता है, अप्रतिरूप नहीं आता और उससे प्रतिरूप [ पुत्र ] उत्पन्न होता है ॥ ८ ॥

अप्सु रेतसि हृदि चैका देवता। तस्या विशेषणम्—प्रतिरूपोऽनुरूपः श्रुतिस्मृत्यप्रतिकूल इत्यर्थः। फलम्—प्रतिरूपं श्रुतिस्मृतिशासनानुरूपमेव एनमुपगच्छति प्राप्नोति, न विपरीतम्, अन्यच्च—अस्मात्तथाविध एवोपजायते ॥ ८ ॥जल, वीर्य और हृदयमें एक ही देवता है। उसका विशेषण है-प्रतिरूप-अनुरूप अर्थात् श्रुति और स्मृतिके अनुकूल। उसकी उपासनाका फल-उसके पास प्रतिरूप अर्थात् श्रुतिस्मृतिकी आज्ञाके अनुरूप पदार्थ ही जाता-प्राप्त होता है, उससे विपरीत नहीं। इसके सिवा, उससे वैसा ही [ पुत्र ] उत्पन्न होता है ॥ ८ ॥

गार्ग्यद्वारा आदर्शान्तर्गत ब्रह्मका प्रतिपादन और अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान

स होवाच गार्ग्यो य एवायमादर्शे पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठा