सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

४१२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २

४१२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय २

| विशेषणद्वयम् । पूर्णत्वविशेषण-फलमिदम्—पूर्यते प्रजया पशुभिः; अप्रवर्तिविशेषणफलम्—नास्यास्माल्लोकात्प्रजोद्वर्तत इति, प्रजासन्तानाविच्छित्तिः ॥ ५ ॥ | विशेषण हैं। पूर्णत्व-विशेषणका यह फल है कि वह प्रजा और पशुओंसे पूर्ण होता है तथा 'अप्रवर्ति' विशेषणका यह फल है कि इस लोकमें उसकी प्रजाका उद्वर्तन नहीं होता—प्रजासंतानका विच्छेद नहीं होता ॥ ५ ॥ |

गार्ग्यद्वारा वायु-ब्रह्मका प्रतिपादन तथा अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान

स होवाच गार्ग्यो य एवायं वायौ पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठा इन्द्रो वैकुण्ठोऽपराजिता सेनेति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते जिष्णुर्हापराजिष्णुर्भवत्यन्यतस्त्यजायी ॥ ६ ॥

वह गार्ग्य बोला, 'यह जो वायुमें पुरुष है इसकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' उस अजातशत्रुने कहा, 'नहीं, नहीं, इसके विषयमें बात मत करो। इसकी तो मैं इन्द्र, वैकुण्ठ और अपराजिता सेना—इस रूपसे उपासना करता हूँ।' जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह विजयी, कभी न हारनेवाला और शत्रुविजेता होता है' ॥ ६ ॥

| तथा वायौ प्राणे हृदि चैका देवता । तस्या विशेषणम्—इन्द्रः परमेश्वरः वैकुण्ठोऽप्रसह्यः, न परैर्जितपूर्वा पराजिता सेना—मरुतां गणत्व- | इसी प्रकार वायु, प्राण और हृदयमें भी एक ही देवता है। उसके विशेषण हैं-इन्द्र—परमेश्वर, वैकुण्ठ-जो विशेषरूपसे सहन न किया जा सके और अपराजिता सेना-जो सेना पहले दूसरोंके द्वारा पराजित न हुई हो। मरुत्नामक देवताओंका गणत्व (एक समूहरूप होना) |