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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

३९६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १

३९६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

अब रूपोंका चक्षु सामान्य है; यह इसका उक्थ है। इसीसे सारे रूप उत्पन्न होते हैं। यह इनका साम है, क्योंकि यह समस्त रूपोंसे सम है। यह इनका ब्रह्म है, क्योंकि यही समस्त रूपोंको धारण करता है॥ २॥

| अथेदानीं रूपाणां सितासितप्रभृतीनां चक्षुरिति चक्षुर्विषयसामान्यं चक्षुःशब्दाभिधेयं रूपसामान्यं प्रकाश्यमात्रमभिधीयते। अतो हि सर्वाणि रूपाण्युत्तिष्ठन्ति, एतद्देषां साम, एतद्धि सर्वै रूपैः समम्, एतद्देषां ब्रह्म, एतद्धि सर्वाणि रूपाणि बिभर्ति ॥ २ ॥ | अथ—अब शुक्ल-कृष्ण (गौर-श्याम) आदि रूपोंका चक्षु [सामान्य] है; अर्थात् चक्षुके विषयभूत रूपोंका सामान्य 'चक्षु' शब्दसे कहा जानेवाला, रूपसामान्य अथवा प्रकाश्यसामान्य कहा जाता है। इसीसे सब रूप उत्पन्न होते हैं। यह इनका साम है, क्योंकि यह समस्त रूपोंसे सम है। यह इनका ब्रह्म है, क्योंकि यही समस्त रूपोंको धारण करता है ॥ २ ॥ |


कर्मसामान्य आत्मामें सबका अन्तर्भाव दिखाना

अथ कर्मणामात्मेत्येतदेषामुक्थमतो हि सर्वाणि कर्माण्युत्तिष्ठन्त्येतदेषाꣳ सामैतद्धि सर्वैः कर्मभिः सममेतद्देषां ब्रह्मैतद्धि सर्वाणि कर्माणि बिभर्ति तदेतत्त्रयꣳ सदेकमयमात्मात्मो एकः सन्नेतत्त्रयं तदेतदमृतꣳ सत्येनच्छन्नं प्राणो वा अमृतं नामरूपे सत्यं ताभ्यामयं प्राणश्छन्नः ॥ ३ ॥

अब कर्मोंका सामान्य आत्मा (शरीर) है। यह इनका उक्थ है। इसीसे सब कर्म उत्पन्न होते हैं। यह इनका साम है, क्योंकि यह समस्त कर्मोंसे सम है। यह इनका ब्रह्म है, क्योंकि यही समस्त कर्मोंको धारण