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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

३६२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

३६२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

अन्नोपासक ही षोडशकल संवत्सर प्रजापति है

यो वै स संवत्सरः प्रजापतिः षोडशकलोऽयमेव स योऽयमेवंवित्पुरुषस्तस्य वित्तमेव पञ्चदश कला आत्मैवास्य षोडशी कला स वित्तेनैवा च पूर्यतेऽप च क्षीयते तदेतन्नभ्यं यदयमात्मा प्रधिर्वित्तं तस्माद्यद्यपि सर्वज्यानिं जीयत आत्मना चेज्जीवति प्रधिनागादित्येवाहुः ॥ १५॥

जो भी यह सोलह कलाओंवाला संवत्सर प्रजापति है, वह यही है जो कि इस प्रकार जाननेवाला पुरुष है। वित्त ही उसकी पंद्रह कलाएँ हैं तथा आत्मा (शरीर) ही उसकी सोलहवीं कला है। वह वित्तसे ही बढ़ता और क्षीण होता है। यह जो आत्मा (पिण्ड) है, वह नभ्य (रथचक्रकी नाभिरूप) है और वित्त प्रधि (रथचक्रका बाहरका घेरा-नेमि) है। इसलिये यदि पुरुष सर्वस्वहरणके कारण ह्रासको प्राप्त हो जाय, किंतु शरीरसे जीवित रहे, तो यही कहते हैं कि केवल प्रधिसे ही क्षीण हुआ है ॥ १५ ॥

यो वै परोक्षाभिहितः संवत्सरः प्रजापतिः षोडशकलः स नैवात्य-जो भी सोलह कलाओंवाला संवत्सर प्रजापति परोक्षरूपसे कहा गया है, उसे अत्यन्त परोक्ष ही नहीं

प्राणियोंकी अथवा केवल गिरगिटकी हिंसा की जा सकती है। ऐसी दशामें पूर्वोक्त सामान्य वचनसे विरोध होगा। यद्यपि विधिकी अपेक्षा निषेधवचन बलवान् होते हैं, तथापि सामान्य निषेधकी अपेक्षा विशेष विधि ही बलवान् होता है, इसलिये पूर्वोक्त सामान्य निषेधको बाधकर इस विशेष वचनकी प्रवृत्ति होनेसे अमावास्यासे अन्यत्र हिंसाका प्रतिप्रसव (विशेष विधान) सिद्ध हो जायगा। निषेधके बाधक विधिको 'प्रतिप्रसव' कहते हैं। उक्त शङ्काका समाधान करते हुए भाष्यकार कहते हैं—यहाँ यह श्रुतिका विशेष वचन सोमदेवताकी पूजा करनेके लिये है अर्थात् 'अमावास्याकी रातमें सभी प्राणियोंमें सोमदेवता व्याप्त रहते हैं, इसलिये उस दिन किसी भी प्राणीको दुःख न दे' यह कहकर यहाँ सोमदेवताका सम्मान किया गया है, इससे हिंसाका प्रतिप्रसव (विशेष विधान) समझना भूल है।