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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

१९४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १

१९४बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| दाक्षिप्तमन्नियन्तृकर्तृसाधनक्रिया-<br><br>निमित्तम् ।<br><br>असौनामाति सर्वनाम्नाविशेष-<br><br>भिधानेन नाममात्रं व्यपदिशति।<br><br>देवदत्तो यज्ञदत्त इति वा नामास्य<br><br>इत्यसौनामायम् । तथेदमिति<br><br>शुक्लकृष्णादीनामविशेषः । इदं<br><br>शुक्लमिदं कृष्णं वा रूपमस्येतीदं-<br><br>रूपः । तदिदमव्याकृतं वस्तु<br><br>एतर्ह्येतस्मिन्नपि काले नामरूपा-<br><br>भ्यामेव व्याक्रियते असौनामा-<br><br>यमिदंरूप इति ।<br><br>यदर्थः सर्वशास्त्रारम्भः, यस्मि-<br><br>न्नविद्यया स्वाभाविक्या कर्तृक्रिया-<br><br>फलाध्यारोपणा कृता, यः कारणं<br><br>सर्वस्य जगतः, यदात्मके नामरूपे<br><br>सलिलादिव स्वच्छान्मलमिवफेन-<br><br>मव्याकृते व्याक्रियेते, यश्च ताभ्यां | वि आ अक्रियत अर्थात् विशिष्टरूपसे नामरूपविशेषके निश्चयकी मर्यादासे युक्त व्यक्तीभावको प्राप्त हुआ ।<br><br>‘असौनामा’ इस पदके ‘असौ’ इस सर्वनामसे किसी प्रकारका विशेष न बतलाकर श्रुति नाममात्रका प्रतिपादन करती है—देवदत्त या यज्ञदत्त इत्यादि इसके नाम हैं, इसलिये यह पुरुष ‘असौनामा’ है। तथा ‘इदम्’ यह शुक्ल-कृष्णादि वर्णोंका सामान्य वाचक है—यह ‘शुक्ल’ अथवा यह ‘कृष्ण’ इसका रूप है इसलिये यह इदंरूप है। इसीसे यह अव्याकृत वस्तु इस समय भी नाम-रूपके द्वारा ही ‘इस नामवाली है’, ‘इस रूपवाली है’ इस प्रकार व्यक्त होती है।<br><br>जिसके लिये सारे शास्त्रका आरम्भ हुआ है, जिसमें स्वाभाविकी अविद्यासे कर्ता, क्रिया और फलका आरोप किया गया है, जो सारे जगत्का कारण है, जिसके स्वरूपभूत नाम और रूप स्वच्छ जलसे मलरूप फेनके समान अव्याकृत-रूपसे स्थित हुए ही व्याकृत होते |


जिनका आक्षेप करना आवश्यक है उन नियन्ता—प्रेरक, कर्त्ता—उत्पत्तिका अनुकूल शरीर एवं इन्द्रियादिका व्यापार करनेवाला तथा साधन—इन्द्रियव्यापार इन क्रियाके निमित्तोंसे युक्त होकर व्यक्त हुआ ।