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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
| १३६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| १३६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
|---|
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| भवतीति प्रस्तुतम् । अतः स्त्रीविशेषणेनैव पुत्रविशेषणादाचार्यपरम्परा कीर्त्यते । तानीमानि शुक्लानीत्यव्यामिश्राणि ब्राह्मणेन। अथवा यानीमानि यजूंषि तानि शुक्लानि शुद्धानीत्येतत् ।<br><br>प्रजापतिमारभ्य यावत्पौतिमाषीपुत्रस्तावदधोमुखो नियताचार्यपूर्वक्रमो वंशः समानमा साञ्जीवीपुत्रात् । ब्रह्मणः प्रवचनाख्यस्य; तच्चैतद् ब्रह्म प्रजापतिप्रबन्धपरम्परयागत्यास्मास्वनेकधा विप्रसृतम् । अनाद्यनन्तं स्वयंभु ब्रह्म नित्यं तस्मै ब्रह्मणे नमः; नमस्तदनुवर्त्तिभ्यो गुरुभ्यः ॥ १–४ ॥ | होता है—ऐसा प्रसङ्ग है । अतः स्त्रीविशेषणसे ही पुत्रका विशेषण देकर आचार्यपरम्पराका उल्लेख जाता है । वे ये यजुःश्रुतियाँ शुक्ल अर्थात् ब्राह्मणसे अव्यामिश्र (बिना मिली हुई) हैं ।¹ अथवा ये जो यजुःश्रुतियाँ हैं वे शुद्ध हैं—ऐसा इसका तात्पर्य है ।<br><br>प्रजापतिसे लेकर पौतिमाषीपुत्रतक तो यह अधोमुखवंश नियत आचार्यपरम्पराके अनुसार है, इसमें साञ्जीवीपुत्रतक सब आचार्य समान (एक वाजसनेयिशाखामें ही) हैं । ब्रह्म अर्थात् प्रवचनात्मक ब्रह्मके सम्बन्धसे । वह यह ब्रह्म प्रजापतिसे लेकर परम्परासे आकर हम सबमें अनेक प्रकारसे फैला हुआ है । वह अनादि अनन्त स्वयम्भू ब्रह्म नित्य है, उस ब्रह्मको नमस्कार है और उसके अनुवर्ती गुरुओंको भी नमस्कार है ॥ १-४॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये षष्ठाध्याये
पञ्चमं वंशब्राह्मणम् ॥ ५ ॥
❖
इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य
श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये
षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
•••
बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्यं सम्पूर्णम्
॥ ॐ तत्सत् ॥
❖
</div>१. अर्थात् इनमें पौरुषेयत्वका दोष नहीं है ।
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ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं
पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय
पूर्णमेवावशिष्यते ॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
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॥ श्रीहरिः ॥
मन्त्राणां वर्णानुक्रमणिका
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | ब्रा० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|
| अग्नये स्वाहेत्यग्नौ हुत्वा ... | ६ | ३ | ३ | १३२४ |
| अत्र पितापिता भवति ... | ४ | ३ | २२ | ६७६ |
| अथ कर्मणामात्मेत्येतदेषा० ... | १ | ६ | ३ | ३६६ |
| अथ चक्षुरत्यवहत्तद्यदा ... | १ | ३ | १४ | १३० |
| अथ त्रयो वाव लोका ... | १ | ५ | १६ | ३६५ |
| अथ प्राणमत्यवहत्स यदा ... | १ | ३ | १३ | १२६ |
| अथ मनोऽत्यवहत्तद्यदा ... | १ | ३ | १६ | १३० |
| अथ य इच्छेत्पुत्रो मे कपिलः पिङ्गलो ... | ६ | ४ | १५ | १३५१ |
| अथ य इच्छेत्पुत्रो मे पण्डितो ... | ६ | ४ | १८ | १३५२ |
| अथ य इच्छेत्पुत्रो मे श्यामो ... | ६ | ४ | १६ | १३५२ |
| अथ य इच्छेद्दुहिता मे पण्डिता ... | ६ | ४ | १७ | १३५२ |
| अथ यदा सुषुप्तो भवति ... | २ | १ | १६ | ४४८ |
| अथ यद्युदक आत्मानं ... | ६ | ४ | ६ | १३४२ |
| अथ यस्य जायामार्तवं ... | ६ | ४ | १३ | १३४६ |
| अथ यस्य जायायै ... | ६ | ४ | १२ | १३४७ |
| अथ यामिच्छेद्दधीतेति ... | ६ | ४ | ११ | १३४६ |
| अथ यामिच्छेन्न गर्भं दधीतेति ... | ६ | ४ | १० | १३४५ |
| अथ ये यज्ञेन दानेन ... | ६ | २ | १६ | १३११ |
| अथ रूपाणां चक्षु० ... | १ | ६ | २ | ३६५ |
| अथ वं॒शः। पौतिमाषी० ... | ६ | ५ | १ | १३६३ |
| अथ वं॒शः। पौतिमाष्यो ... | २ | ६ | १ | ६१५ |
| अथ वं॒शः पौतिमाष्यो ... | ४ | ६ | १ | ११५८ |
| अथ श्रोत्रमत्यवहत्तद्यदा ... | १ | ३ | १५ | १३० |
| अथ ह चक्षुरूचुः ... | १ | ३ | ४ | ११२ |
| अथ ह प्राणं उत्क्रमि० ... | ६ | १ | १३ | १२६० |
| अथ ह प्राणमूचुस्त्वं न ... | १ | ३ | ३ | १११ |
| अथ ह मन ऊचुः ... | १ | ३ | ६ | ११३ |
| अथ ह याज्ञवल्क्यस्य द्वे ... | ४ | ५ | १ | ११२८ |
| अथ ह वाचक्नव्युवाच ... | ३ | ८ | १ | ७५८ |
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( १३६६ )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | ब्रा० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|
| अथ ह श्रोत्रमूचुः | १ | ३ | ५ | ११२ |
| अथ हेममासन्यं प्राण० | १ | ३ | ७ | ११५ |
| अथ हैनमसुर्रा ऊचुः | ५ | २ | ३ | ११८३ |
| अथ हैनमुद्दालक आ० | ३ | ७ | १ | ७४१ |
| अथ हैनमुषस्तश्चाक्रा० | ३ | ४ | १ | ६६८ |
| अथ हैनं कहोलः कौ० | ३ | ५ | १ | ७०६ |
| अथ हैनं गार्गी वाच० | ३ | ६ | १ | ७३६ |
| अथ हैनं जारत्कारव | ३ | २ | १ | ६५२ |
| अथ हैनं भुज्युर्लाह्या० | ३ | ३ | १ | ६६० |
| अथ हैनं मनुष्या ऊचुः | ५ | २ | २ | ११८२ |
| अथ हैनं विदग्धः शा० | ३ | ९ | १ | ७८५ |
| अथ होवाच ब्राह्मणा | ३ | ९ | २७ | ८२३ |
| अथातः पवमानानामे० | १ | ३ | २८ | १५५ |
| अथातः सम्प्रत्तिर्यदा | १ | ५ | १७ | ३६६ |
| अथातो व्रतमीमाँसा | १ | ५ | २१ | ३८१ |
| अथात्मनेऽन्नाद्यमागा० | १ | ३ | १७ | १३१ |
| अथाधिदैवतं ज्वलिष्या० | १ | ५ | २२ | ३८६ |
| अथाध्यात्ममिदमेवं मूर्तं | २ | ३ | ४ | ५२१ |
| अथाभिप्रायरेव स्थाली० | ६ | ४ | १६ | १३५५ |
| अथामूर्तं प्राणश्च यश्चा० | २ | ३ | ५ | ५२३ |
| अथामूर्तं वायुश्चान्तरिक्षं | २ | ३ | ३ | ५१७ |
| अथास्य दक्षिणं कर्णम० | ६ | ४ | २५ | १३६० |
| अथास्य नाम करोति | ६ | ४ | २६ | १३६१ |
| अथास्य मातरमभिम० | ६ | ४ | २८ | १३६२ |
| अथास्या ऊरू विहाय० | ६ | ४ | २१ | १३५७ |
| अथेत्यभ्यमन्थत्स मुखाच्च | १ | ४ | ६ | १८१ |
| अथैतद्वामेऽक्षणि | ४ | २ | ३ | ८६१ |
| अथैतस्य प्राणस्यापः | १ | ५ | १३ | ३५५ |
| अथैतस्य मनसो द्यौः | १ | ५ | १२ | ३५३ |
| अथैनमग्नये | ६ | २ | १४ | १३०१ |
| अथैनमभिमृशति | ६ | ३ | ४ | १३२६ |
| अथैनमाचामति | ६ | ३ | ६ | १३२७ |
| अथैनमुद्यच्छत्यामँ ० | ६ | ३ | ५ | १३२७ |
| अथैनं मात्रे प्रदाय | ६ | ४ | २७ | १३६१ |
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( १३७० )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | ब्रा० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|
| अथैनं वसत्योपमन्त्रया० | ६ | २ | ३ | १२७६ |
| अथैनामभिपद्यते | ६ | ४ | २० | १३५६ |
| अथैष श्लोको भवति | १ | ५ | २३ | ३८८ |
| अथो अयं वा आत्मा | १ | ४ | १६ | ३०५ |
| अद्भ्यश्चैनं चन्द्रमसश्च | १ | ५ | २० | ३७७ |
| अनन्दा नाम ते लोका | ४ | ४ | ११ | १०७८ |
| अन्धं तमः प्रविशन्ति | ४ | ४ | १० | १०७७ |
| अन्नं ब्रह्मेत्येक आहु० | ५ | १२ | १ | १२१३ |
| अयमग्निः सर्वेषां भूतानां | २ | ५ | ३ | ५८५ |
| अयमग्निवैश्वानरो | ५ | ९ | १ | १२०७ |
| अयमाकाशः सर्वेषां | २ | ५ | १० | ५८६ |
| अयमात्मा सर्वेषां भूतानां | २ | ५ | १४ | ५६३ |
| अयमादित्यः सर्वेषां | २ | ५ | ५ | ५८६ |
| अयं चन्द्रः सर्वेषां | २ | ५ | ७ | ५८८ |
| अयं धर्मः सर्वेषां भूतानां | २ | ५ | ११ | ५६० |
| अयं वायुः सर्वेषां | २ | ५ | ४ | ५८५ |
| अयं वै लोकोऽग्निर्गौतम | ६ | २ | ११ | १२६६ |
| अयँ स्तनयित्नुः सर्वेषां | २ | ५ | ६ | ५८६ |
| असौ वै लोकोऽग्निर्गौतम | ६ | २ | ९ | १२८८ |
| अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य किंज्योति० | ४ | ३ | ३ | ८७५ |
| अस्तमित आदित्ये... चन्द्रमस्यस्तमिते किंज्योतिरेवा० | ४ | ३ | ४ | ८७५ |
| अस्तमित आदित्ये शान्तेऽग्नौ | ४ | ३ | ५ | ८७६ |
| अस्तमित आदित्ये... शान्तायां वाचि | ४ | ३ | ६ | ८७८ |
| अहर्वा अश्वं पुरस्तात् | १ | १ | २ | ४५ |
| अहल्लिकेति होवाच | ३ | ९ | २५ | ८१६ |
| आकाश एक यस्याय० | ३ | ९ | १३ | ७६६ |
| आग्निवेश्यादाग्निवेश्य० | २ | ६ | २ | ६१५ |
| आग्निवेश्यादाग्निवेश्यो | ४ | ६ | २ | ११५६ |
| आत्मानं चेद्विजानीयाद० | ४ | ४ | १२ | १०७८ |
| आत्मैवेदमग्र आसीत्पु० | १ | ४ | १ | १६४ |
| आत्मैवेदमग्र आसीदेक | १ | ४ | १७ | ३११ |
| आत्रेयीपुत्रादात्रेयीपुत्रो | ६ | ५ | २ | १३६३ |
| आप एव यस्यायतनँ | ३ | ९ | १६ | ८०२ |
पृष्ठ 1387स्थायी लिंक
( १३७१ )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | ब्रा० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|
| आप एवेदमग्र आसु० ... | ५ | ५ | १ | ११६४ |
| आपो वा अर्कस्तद्यदपाँ ... | १ | २ | २ | ६७ |
| आराममस्य पश्यन्ति | ४ | ३ | १४ | ६३८ |
| इदं मानुषँ सर्वेषां ... | २ | ५ | १३ | ५६३ |
| इदं वै तन्मधु...पश्यन्नवोचत् । आथर्व० | २ | ५ | १७ | ६०७ |
| इदं वै तन्मधु...पश्यन्नवोचत् । तद्वां | २ | ५ | १६ | ६०३ |
| इदं वै तन्मधु...पश्यन्नवोचत् । पुरश्चक्रे | २ | ५ | १८ | ६१० |
| इदं वै तन्मधु...पश्यन्नवोचत् । रूपँ ... | २ | ५ | १९ | ६१२ |
| इदं सत्यँ सर्वेषां ... | २ | ५ | १२ | ५६२ |
| इन्धो ह वै नामैष ... | ४ | २ | २ | ८६० |
| इमा आपः सर्वेषां ... | २ | ५ | २ | ५८४ |
| इमा दिशः सर्वेषां ... | २ | ५ | ६ | ५८७ |
| इमावेव गौतमभरद्वाजा० ... | २ | २ | ४ | ५१० |
| इयं पृथिवी सर्वेषां ... | २ | ५ | १ | ५८२ |
| इयं विद्युत्सर्वेषां भूतानां ... | २ | ५ | ८ | ५८८ |
| इहैव सन्तोऽथ विद्म० ... | ४ | ४ | १४ | १०८२ |
| उक्थं प्राणो वा उक्थं ... | ५ | १३ | १ | १२१८ |
| उषा वा अश्वस्य मेध्यस्य ... | १ | १ | १ | ३६ |
| ऋचो यजूंषि ... | ५ | १४ | २ | १२२४ |
| एकधैवानुद्रष्टव्यमेतदप्र० ... | ४ | ४ | २० | १०८८ |
| एकीभवति न पश्यती० ... | ४ | ४ | २ | १०२८ |
| एतद्व वै तज्जनको ... | ५ | १४ | ८ | १२३६ |
| एतद्ध स्म वै तद्विद्वानु० ... | ६ | ४ | ४ | १३३६ |
| एतद्वै परमं तपो ... | ५ | ११ | १ | १२११ |
| एतमु हैव चूलो ... | ६ | ३ | १० | १३३१ |
| एतमु हैव जानकिराय० ... | ६ | ३ | ११ | १३३१ |
| एतमु हैव मधुकः ... | ६ | ३ | ९ | १३३१ |
| एतमु हैव वाजसनेयो ... | ६ | ३ | ८ | १३३० |
| एतमु हैव सत्यकामो ... | ६ | ३ | १२ | १३३१ |
| एतस्य वा अक्षरस्य ... | ३ | ८ | ८ | ७६६ |
| एष उ एव बृहस्पति० ... | १ | ३ | २० | १४० |
| एष उ एव ब्रह्मणस्पति० ... | १ | ३ | २१ | १४२ |
| एष उ एव साम वाग्वै ... | १ | ३ | २२ | १४४ |
| एष उ वा उद्गीथः ... | १ | ३ | २३ | १४७ |
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( १३७२ )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | ब्रा० | सं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|
| एष प्रजापतिर्यद् | ५ | ३ | १ | ११८८ |
| एषां वै भूतानां पृथिवी | ६ | ४ | १ | १३३५ |
| कतम आत्मेति योऽयं | ४ | ३ | ७ | ८६१ |
| कतम आदित्या इति | ३ | ९ | ५ | ७६० |
| कतम इन्द्रः कतमः | ३ | ९ | ६ | ७६० |
| कतमे ते त्रयो देवा | ३ | ९ | ८ | ७६२ |
| कतमे रुद्रा इति | ३ | ९ | ४ | ७५८ |
| कतमे वसव इत्यग्निश्च | ३ | ९ | ३ | ७५८ |
| कतमे षडित्यग्निश्च | ३ | ९ | ७ | ७६१ |
| कस्मिन्नु त्वं चात्मा | ३ | ९ | २६ | ८१७ |
| काम एव यस्यायतनं | ३ | ९ | ११ | ७६७ |
| किंदेवतोऽस्यामुदीच्यां | ३ | ९ | २३ | ८१३ |
| किंदेवतोऽस्यां दक्षिणायां | ३ | ९ | २१ | ८०६ |
| किंदेवतोऽस्यां ध्रुवायां | ३ | ९ | २४ | ८१५ |
| किंदेवतोऽस्यां प्रतीच्यां | ३ | ९ | २२ | ८११ |
| किंदेवतोऽस्यां प्राच्यां | ३ | ९ | २० | ८०६ |
| क्षत्रं प्राणो वै क्षत्रं प्राणो | ५ | १३ | ४ | १२२१ |
| खं ब्रह्म । खं पुराणं | ५ | १ | १ | ११७५ |
| घृतकौशिकाद्घृतकौशिकः | २ | ६ | ३ | ६१६ |
| घृतकौशिकाद्घृतकौशिकः | ४ | ६ | ३ | ११५६ |
| चक्षुर्वै ग्रहः | ३ | २ | ५ | ६५६ |
| चक्षुर्होच्चक्राम | ६ | १ | ८ | १२५७ |
| चतुरौदुम्बरो भवत्यौदु० | ६ | ३ | १३ | १३३३ |
| जनको ह वैदेह आ० | ४ | १ | १ | ८४१ |
| जनको ह वैदेहः कूर्चा० | ४ | २ | १ | ८५७ |
| जनको ह वैदेहो बहु० | ३ | १ | १ | ६२० |
| जनकं ह वैदेहं याज्ञ० | ४ | ३ | १ | ८७० |
| जात एव न जायते | ३ | ९ | ७-२८ | ८२६ |
| जातेऽग्निमुपसमाधायाङ्क | ६ | ४ | २४ | १३५६ |
| जिह्वा वै ग्रहः | ३ | २ | ४ | ६५६ |
| ज्येष्ठाय स्वाहा श्रेष्ठाय | ६ | ३ | २ | १३२४ |
| तदभिमृशेदग्नु वा | ६ | ४ | ५ | १३४१ |
| तदाहुर्यदयमेक इवैव | ३ | ९ | ६ | ७६३ |
| तदाहुर्यद्ब्रह्मविद्यया | १ | ४ | ९ | २४० |
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( १३७३ )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | ब्रा० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|
| तदेतत्प्रेयः पुत्रात्प्रेयो ... | १ | ४ | ८ | २३६ |
| तदेतदृचाभ्युक्तम् । एष ... | ४ | ४ | २३ | १११७ |
| तदेतद्ब्रह्म क्षत्रं विट्० ... | १ | ४ | १५ | २६४ |
| तदेतन्मूर्तं यदन्यत् ... | २ | ३ | २ | ५१५ |
| तदेतेश्लोकाभवन्ति।अणुःपन्था विततः | ४ | ४ | ८ | १०७० |
| तदेते···स्वप्नेन ... | ४ | ३ | ११ | ६३५ |
| तदेष श्लोको भवति । अर्वाग्बिलश्चमस | २ | ३ | ३ | ५०८ |
| तदेष···तदेव सक्तः सह ... | ४ | ४ | ६ | १०४८ |
| तदेष···यदा सर्वे ... | ४ | ४ | ७ | १०६५ |
| तद्धापि ब्रह्मदत्तश्चैकिता० ... | १ | ३ | २४ | १४८ |
| तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत् ... | १ | ४ | ७ | १६१ |
| तद् यत्तत्सत्यमसौ ... | ५ | ५ | २ | ११६७ |
| तद् यथा तृणजलायुका ... | ४ | ४ | ३ | १०३७ |
| तद् यथानः सुसमाहित० ... | ४ | ३ | ३५ | १०१४ |
| तद् यथा पेशस्कारी पेश० ... | ४ | ४ | ४ | १०३६ |
| तद् यथा महामत्स्य उभे ... | ४ | ३ | १८ | ६५६ |
| तद् यथा राजानमायान्त० ... | ४ | ३ | ३७ | १०२१ |
| तद् यथा राजानं प्रयि० ... | ४ | ३ | ३८ | १०२३ |
| तद् यथास्मिन्नाकाशे ... | ४ | ३ | १९ | ६५६ |
| तद्वा अस्यैतदतिच्छन्दा ... | ४ | ३ | २१ | ६६८ |
| तद्वा एतदक्षरं गार्ग्यदृष्टं ... | ३ | ८ | ११ | ७७८ |
| तद्वै तदेतदेव ... | ५ | ४ | १ | ११६१ |
| तम एव यस्यायतनं ... | ३ | ९ | १४ | ८०० |
| तमेताः समाक्षितय ... | २ | २ | २ | ५०६ |
| तमेव धीरो विज्ञाय ... | ४ | ४ | २१ | १०६१ |
| तस्मिञ्छुक्लमुत नीलमाहुः ... | ४ | ४ | ९ | १०७३ |
| तस्य प्राची दिक्प्राञ्चः ... | ४ | २ | ४ | ८६५ |
| तस्य वा एतस्य पुरुषस्य ... | ४ | ३ | ९ | ६२३ |
| तस्य हैतस्य पुरुषस्य ... | २ | ३ | ६ | ५२४ |
| तस्य हैतस्य साम्नो यः प्रतिष्ठां वेद | १ | ३ | २७ | १५४ |
| तस्य ॰॰सुवर्णं वेद . ... | १ | ३ | २६ | १५३ |
| तस्य···स्वं वेद ... | १ | ३ | २५ | १५० |
| तस्या उपस्थानं गायत्र्य० ... | ५ | १४ | ७ | १२३६ |
| तस्या वेदिरुपस्थो ... | ६ | ४ | ३ | १३३८ |