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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

१३१२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६

१३१२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ६

एवमेवानुपरिवर्तन्ते अथ य एतौ पन्थानौ न विदुस्ते कीटाः पतङ्गा यदिदं दन्दशूकम् ॥ १६ ॥

और जो यज्ञ, दान, तपके द्वारा लोकोंको जीतते हैं, वे धूम (धूमाभिमानी देवता ) को प्राप्त होते हैं। धूमसे रात्रिदेवताको, रात्रिसे अपक्षीयमाण पक्ष (कृष्णपक्षाभिमानी देवता) को, अपक्षीयमाण पक्षसे जिन छः महीनोंमें सूर्य दक्षिणकी ओर होकर जाता है, उन छः मासके देवताओंको, छः मासके देवताओंसे पितृलोकको और पितृलोकसे चन्द्रमाको प्राप्त होते हैं। चन्द्रमामें पहुँचकर वे अन्न हो जाते हैं। वहाँ जैसे ऋत्विग्गण सोम राजाको 'आप्यायस्व अपक्षीयस्व' ऐसा कहकर चमसमं भरकर पी जाते हैं, उसी प्रकार इन्हें देवगण भक्षण कर जाते हैं। जब उनके कर्म क्षीण हो जाते हैं, तो वे इस आकाशको ही प्राप्त होते हैं। आकाशसे वायुको, वायुसे वृष्टिको और वृष्टिसे पृथिवीको प्राप्त होते हैं। पृथिवीको प्राप्त होकर वे अन्न हो जाते हैं। फिर वे पुरुषरूप अग्निमें हवन किये जाते हैं। उससे वे लोकके प्रति उत्थान करनेवाले होकर स्त्रीरूप अग्निमें उत्पन्न होते हैं। वे इसी प्रकार पुनः-पुनः परिवर्तित होते रहते हैं और जो इन दोनों मार्गोंको नहीं जानते, वे कीट, पतंग और डाँस-मच्छर आदि होते हैं॥ १६॥

अथ पुनर्ये नैवंविदुरूत्क्रान्त्याद्यग्निहोत्रसम्बन्धपदार्थषट्कस्यैव वेदितारः केवलकर्मिणो यज्ञेनाग्निहोत्रादिना दानेन बहिर्वेदि भिक्षमाणेषुद्रव्यसंविभागलक्षणेन तपसा बहिर्वेद्येव दीक्षादिव्यतिरिक्तेन कृच्छ्रचान्द्रायणादिना लोकाञ्जयन्ति, लोकानिति बहुवचनात्तत्रापि फलतारतम्यमभिप्रेतम्,और जो इस प्रकार नहीं जानते, उत्क्रान्ति आदि अग्निहोत्रसम्बन्धी छः पदार्थोंको ही जाननेवाले केवल कर्मी हैं; तथा अग्निहोत्रादि यज्ञ, वेदीसे बाहर भिक्षा माँगनेवालोंको द्रव्य बाँटनारूप दान एवं वेदीके बाहर ही दीक्षादिसे अतिरिक्त कृच्छ्रचान्द्रायणादिरूप तपके द्वारा लोकोंको जीतते हैं, 'लोकान्' ऐसा बहुवचन होनेके कारण वहां भी फलका तारतम्य माना गया है,