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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

१०३२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४

१०३२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४


| तदैष आत्मा सविज्ञानो भवति स्वप्न इव विशेषविज्ञानवान् भवति कर्मवशान्न स्वतन्त्रः; स्वातन्त्र्येण हि सविज्ञानत्वे सर्वः कृतकृत्यः स्यात्, नैव तु तल्लभ्यते; अत एवाह व्यासः—<br><br>“सदा तद्भावभावितः” (गीता ८।६) इति। कर्मणा तूद्भाव्यमानेनान्तःकरणवृत्तिविशेषाश्रितवासनात्मकविशेषविज्ञानेन सर्वो लोक एतस्मिन् काले सविज्ञानो भवति। सविज्ञानमेव च गन्तव्यमन्ववक्रामत्यनुगच्छति विशेषविज्ञानोद्भासितमेवेत्यर्थः। | उस समय यह आत्मा सविज्ञान होता है अर्थात् स्वप्नके समान अपने कर्मवश विशेष विज्ञानवान् होता है, स्वतन्त्रतासे नहीं; यदि स्वतन्त्रतासे विज्ञानवान् हो सकता तो सभी कृतकृत्य तो हो जाते; किंतु वह कृतकृत्यता तो [सभीको] प्राप्त नहीं होती; इसीसे व्यासदेवने कहा है—‘हृदयमें सदा उसी भावका चिन्तन करते रहनेसे [वह उसीको प्राप्त होता है]”। अतः इस समय सब लोग कर्मद्वारा उद्भूत अन्तःकरणकी वृत्तिविशेषके आश्रित रहनेवाले वासनात्मक विशेष ज्ञानसे सविज्ञान होते हैं। इस प्रकार सविज्ञान अर्थात् विशेष विज्ञानसे उद्भासित होकर ही अपने गन्तव्य स्थानको अनुक्रमण-अनुगमन करता है। |
| तस्मात् तत्काले स्वातन्त्र्यार्थं योगधर्मानुसेवनं परिसंख्यानाभ्यासश्च विशिष्टपुण्योपचयश्च श्रद्दधानैः परलोकार्थिभिरप्रमत्तैः कर्तव्य इति। सर्वशास्त्राणां यत्नतो विधेयोऽर्थो दुश्चरिताच्चोपरमणम्। न हि तत्काले शक्यते किञ्चित् सम्पादयितुम्; कर्मणा नीयमा- | अतः परलोककी इच्छा रखनेवाले श्रद्धालु पुरुषोंको उस समय स्वातन्त्र्य प्राप्त करनेके लिये प्रमादहीन होकर निरन्तर योगधर्मोंका सेवन, विवेकका अभ्यास और विशेषरूपसे पुण्यका संचय करना चाहिये। सम्पूर्ण शास्त्रोंके विधेय अर्थका आचरण करना चाहिये तथा दुष्कर्मसे दूर रहना चाहिये। किंतु उस (उत्क्रान्तिके) समय कुछ भी सम्पादन नहीं किया जा सकता, |