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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

१०२६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४

१०२६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| परोपाधिनिमित्तत्वाविशेषात्; समानकर्तृकनिर्देशाच्च । | हीका अन्योन्नाविकृत होना समान है, तथा दोनोंहीका एक कर्ता बतलाया गया है। |
| अथास्मिन् काले एते प्राणा वागादय एनमात्मानमभिसमायन्ति । तदास्य शरीरस्यात्मनोऽङ्गेभ्यः सम्प्रमोक्षणम् । कथं पुनः सम्प्रमोक्षणम् ? केन वा प्रकारेणात्मानमभिसमायन्ति ? इत्युच्यते— | इस समय ये वागादि प्राण इस आत्माके अभिमुख आते हैं। तब इस देही आत्माका अङ्गोंसे सर्वथा मोक्ष होता है। किंतु वह मोक्ष कैसे होता है और किस प्रकार ये आत्माके अभिमुख आते हैं ? सो बतलाया जाता है— |
| स आत्मा एतास्तेजोमात्राः—तेजसो मात्रास्तेजोमात्रास्तेजोऽवयवा रूपादिप्रकाशकत्वाच्चक्षुरादीनि करणानीत्यर्थः, ता एताः समभ्याददानः सम्यङ् निर्लेपेनाभ्याददान आभिमुख्येनाददानः संहरमाणः—तत्स्वप्नापेक्षया विशेषणं समिति, न तु स्वप्ने निर्लेपेन सम्यगादानम्, अस्ति त्वादानमात्रम्, "गृहीता वाग् गृहीतं चक्षुः,' (बृ० उ० २ । १ । १७) "अस्य लोकस्य सर्वावतो मात्रामपादाय" (४।३।१६) "शुक्रमादाय" (४।३।११) | वह आत्मा इन तेजोमात्राओंको—तेजकी मात्रा तेजोमात्रा यानी तेजके अवयव अर्थात् रूपादिके प्रकाशक होनेके कारण चक्षु आदि इन्द्रियाँ तेजोमात्रा हैं, उन इन इन्द्रियोंका समभ्यादान—सम्यक् अर्थात् निर्लेपभावसे अभ्यादान—अभिमुखतया आदान अर्थात् उपसंहार कर, हृदय यानी पुण्डरीकाकाशमें ही अनुक्रान्त—अन्वागत होता है अर्थात् बुद्धि आदिके विक्षेपका उपसंहार हो जानेपर हृदयमें ही अभिव्यक्तविज्ञानवान् होता है। 'समभ्याददानः' इस क्रियापदमें 'सम्' यह विशेषण स्वप्नकी अपेक्षासे है, क्योंकि स्वप्नमें निर्लेपभावसे चक्षु आदिका उपसंहार नहीं होता, केवल आदान (उपसंहार) मात्र तो होता |