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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४६९ |
पृष्ठ 475स्थायी लिंक
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४६९ |
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| संस्कृत मूल / भाष्य | हिन्दी भाष्यार्थ |
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| णाय” (२।५।१९) “सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नामानि कृत्वाभिवदन्यदास्ते” इति सर्वशाखासु सहस्रशो मन्त्रवादाः सृष्टिकर्तुरेवासंसारिणः शरीरप्रवेशं दर्शयन्ति। तथा ब्राह्मणवादाः— “तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्” (तै० उ० ३।६।१) “स एतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत” (ऐ० उ० १।३।१२) “सेयं देवता ॅ इमास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य” (छा० उ० ६।३।२) “एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते” (क० उ० १।३।१२) इत्याद्याः। | है”, “वह धीर सम्पूर्ण रूपोंकी रचनाकर उनके नाम रखकर उन्हींके द्वारा बोलता रहता है” इस प्रकार सभी शाखाओंमें सहस्रों मन्त्रवाद सृष्टिकर्ता असंसारी ब्रह्मका ही शरीरमें प्रवेश होना दिखलाते हैं। इसी प्रकार “उसे रचकर वह उसीमें अनुप्रविष्ट हो गया”, “वह इस मूर्धसीमाको ही विदीर्ण कर इसीके द्वारा प्रविष्ट हो गया”, “उस इस देवताने .. इन [अप्, तेज और अन्नरूप] तीन देवताओंमें इस जीवरूपसे अनुप्रवेश कर”, “यह सम्पूर्ण भूतोंमें छिपा हुआ आत्मा प्रकट नहीं होता” इत्यादि ब्राह्मणवाद भी हैं। |
| सर्वश्रुतिषु च ब्रह्मण्येवात्मशब्दप्रयोगाद् आत्मशब्दस्य च प्रत्यगात्माभिधायकत्वात् “एष सर्वभूतान्तरात्मा” (मु० उ० २।१।४) इति च श्रुतेः परमात्मव्यतिरेकेण संसारिणोऽभावात्— “एकमेवाद्वितीयम्” (छा० उ० ६।२।१) “ब्रह्मैवेदम्” (मु० उ० २।२।११) “आत्मैवेदम्” (छा० उ० ७।२५।२) इत्यादिश्रुतिभ्यो युक्तमेव अहं ब्रह्मास्मीत्यवधारयितुम्। | इसके सिवा समस्त श्रुतियोंमें ब्रह्ममें ही ‘आत्मा’ शब्दका प्रयोग होने तथा ‘आत्मा’ शब्द प्रत्यगात्माका वाचक होने एवं “यह समस्त भूतोंका अन्तरात्मा है” इस श्रुतिके अनुसार परमात्मासे भिन्न संसारी जीवका अभाव होनेके कारण “एक ही अद्वितीय ब्रह्म है”, यह ब्रह्म ही है” “यह आत्मा ही है” इत्यादि श्रुतियोंसे ‘मैं ब्रह्म हूँ’ ऐसा निश्चय करना उचित ही है। |