तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 242, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ें२३६ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३
[मूल एवं संस्कृत-टीका]
सर्वस्य प्रतिष्ठेत्युपासीत । प्रतिष्ठा-
गुणोपासनात्प्रतिष्ठावान्भवति ।
एवं पूर्वेष्वपि यद्यत्तदधीनं फलं
तद्ब्रह्मैव तदुपासनात्तद्वान्भवतीति
द्रष्टव्यम् । श्रुत्यन्तराच्च—"तं
यथा यथोपासते तदेव भवति"
इति ।
तन्मह इत्युपासीत । महो
महत्त्वगुणवत्तदुपासीत । महान्
भवति । तन्मन इत्युपासीत ।
मननं मनः । मानवान्भवति
मननसमर्थो भवति ॥ ३॥ तन्नम
इत्युपासीत । नमनं नमो नमन-
गुणवत्तदुपासीत । नम्यन्ते प्रह्ली-
भवन्त्यस्मा उपासित्रे कामाः
काम्यन्त इति भोग्या विषया
इत्यर्थः ।
[हिन्दी अनुवाद]
अतः वह सबकी प्रतिष्ठा (आश्रय) है—इस प्रकार उसकी उपासना करे।
प्रतिष्ठा गुणवान् ब्रह्मकी उपासना करनेसे उपासक प्रतिष्ठावान् होता
है । ऐसा ही पूर्व सब पर्यायोंमें समझना चाहिये । जो-जो उसके
अधीन फल है वह ब्रह्म ही है । उसकी उपासनासे पुरुष उसी फलसे
युक्त होता है—ऐसा जानना चाहिये। यही बात “जिस-जिस प्रकार उसकी
उपासना करता है वह (उपासक) वही हो जाता है" इस एक दूसरी
श्रुतिसे प्रमाणित होती है ।
वह महः है—इस प्रकार उसकी उपासना करे । महः अर्थात् महत्त्व
गुणवाला है—ऐसे भावसे उसकी उपासना करे । इससे उपासक
महान् हो जाता है । वह मन है—इस प्रकार उसकी उपासना करे।
मननका नाम मन है । इससे वह मानवान्—मननमें समर्थ हो जाता है
॥३॥ वह नमः है—इस प्रकार उसकी उपासना करे । नमनका नाम ‘नमः’
है अर्थात् उसे नमन-गुणवान् समझकर उपासना करे । इससे उस
उपासकके प्रति सम्पूर्ण काम—जिनकी कामना की जाय वे भोग्य विषय
नत अर्थात् विनम्र हो जाते हैं ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri