तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 243, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० १० ] शाङ्करभाष्यार्थ २३७
तद्ब्रह्मेत्युपासीत । ब्रह्म परि- | वह ब्रह्म है-इस प्रकार उसकी
वृढतममित्युपासीत । ब्रह्मवांस्तद्- | उपासना करे । ब्रह्म यानी सबसे
गुणो भवति । तद्ब्रह्मणः परिमर | बढ़ा हुआ है-इस प्रकार उपासना
इत्युपासीत । ब्रह्मणः परिमरः | करे । इससे वह ब्रह्मवान्-ब्रह्मके-से
परिम्रियन्तेऽस्मिन्पञ्च देवता | गुणवाला हो जाता है । वह ब्रह्मका
विद्युद्वृष्टिश्चन्द्रमा आदि- | परिमर है-इस प्रकार उसकी
त्योऽग्निरित्येताः । अतो वायुः | उपासना करे । ब्रह्मका परिमर-
परिमरः श्रुत्यन्तरप्रसिद्धेः । स | जिसमें विद्युत्, वृष्टि, चन्द्रमा, आदित्य
एष एवार्थं वायुराकाशेनानन्य | और अग्नि-ये पाँच देवता मृत्युको
इत्याकाशो ब्रह्मणः परिमरः | प्राप्त होते हैं उसे परिमर कहते हैं;
तमाकाशं वाय्वात्मानं ब्रह्मणः | अतः वायु ही परिमर है, जैसा कि
परिमर इत्युपासीत । | [ "वायुर्वाव संवर्गः" इस ] एक
| अन्य श्रुतिसे सिद्ध होता है । वही
एनमेवंविदं प्रतिस्पर्धिनो | यह वायु आकाशसे अभिन्न है, इसलिये
द्विषन्तोऽद्विषन्तोऽपि सपत्ना यतो | आकाश ही ब्रह्मका परिमर है । अतः
भवन्त्यतो विशेष्यन्ते द्विषन्तः | वायुरूप आकाशकी 'यह ब्रह्मका
सपत्ना इति, एनं द्विषन्तः | परिमर है' इस भावसे उपासना करे ।
सपत्नास्ते परिम्रियन्ते प्राणाञ्ज- |
हति । किं च ये चाप्रिया अस्य | इस प्रकार जाननेवाले इस
भ्रातृव्या अद्विषन्तोऽपि ते च | उपासकके द्वेष करनेवाले प्रतिपक्षी-
परिम्रियन्ते । | क्योंकि प्रतिपक्षी द्वेष न करनेवाले
| भी होते हैं इसलिये यहाँ 'द्वेष
| करनेवाले' यह विशेषण दिया गया
| है-मर जाते हैं अर्थात् प्राण त्याग
| देते हैं । तथा इसके जो अप्रिय
| भ्रातृव्य होते हैं वे, द्वेष करनेवाले
| न होनेपर भी, मर जाते हैं ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri