तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 177, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनु० ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७१
मूर्तस्य व्याकृतविषयाण्येवैतानि । | अमूर्तके विशेषण व्याकृतविषयक
| ही हैं ।
विज्ञानं चेतनमविज्ञानं | विज्ञान यानी चेतन, अविज्ञान-
तद्रहितमचेतनं पाषाणादि सत्यं | उससे रहित अचेतन पाषाणादि
| और सत्य-व्यवहारसम्बन्धी सत्य;
च व्यवहारविषयमधिकारात्न | क्योंकि यहाँ व्यवहारका ही प्रसंग
परमार्थसत्यम् । एकमेव हि | है, परमार्थ सत्य नहीं; परमार्थ सत्य
| तो एकमात्र ब्रह्म ही है; यहाँ तो
परमार्थसत्यं ब्रह्म । इह पुन- | केवल व्यवहारविषयक आपेक्षिक
| सत्यसे ही तात्पर्य है, जैसे कि
र्व्यवहारविषयमापेक्षिकं सत्यम्, | मृगतृष्णा आदि असत्यकी अपेक्षासे
मृगतृष्णिकाद्यनृतापेक्षयोदकादि | जल आदिको सत्य कहा जाता है
सत्यमुच्यते । अनृतं च तद्विप- | तथा अनृत-उस (व्यावहारिक
| सत्य ) से विपरीत । सो फिर
रीतम्। किं पुनः ? एतत्सर्वमभवत्, | क्या ? ये सब वह सत्य--परमार्थ
सत्यं परमार्थसत्यम् । किं | सत्य ही हो गया । वह परमार्थ
पुनस्तत् ? ब्रह्म, सत्यं ज्ञानमनन्तं | सत्य है क्या ? वह ब्रह्म है; क्योंकि
| 'ब्रह्म सत्य, ज्ञान एवं अनन्त है'
ब्रह्मेति प्रकृतत्वात् । | इस प्रकार उसीका प्रकरण है ।
यस्मात्सच्चदादिकं मूर्तामूर्त- | क्योंकि सत्-त्यत् आदि जो कुछ
धर्मजातं यत्किंचेदं सर्वमविशिष्टं | मूर्त-अमूर्त धर्मजात है वह सामान्य-
| रूपसे सारा ही विकार एकमात्र
विकारजातमेकमेव सच्छब्दवाच्यं | 'सत्' शब्दवाच्य ब्रह्म ही हुआ है-
ब्रह्माभवत्तद्व्यतिरेकेणाभावान्ना- | क्योंकि उससे भिन्न नाम-रूप विकार-
| का सर्वथा अभाव है-इसलिये ब्रह्म-
मरूपविकारस्य, तस्मात्तद्ब्रह्म | वादीलोग उस ब्रह्मको 'सत्य' ऐसा
सत्यमित्याचक्षते ब्रह्मविदः । | कहकर पुकारते हैं ।
अस्ति नास्तीत्यनुप्रश्नः प्रकृत- | 'ब्रह्म है या नहीं' इस अनुप्रश्नका
स्तस्य प्रतिवचनविषय एतदुक्त- | यहाँ प्रसंग था । उसके उत्तरमें यह
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