तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 176, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ें१७० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
आत्मना त्वप्रविभक्तदेशकाले | देश और काल आत्मासे अभिन्न हैं
इति कृत्वात्मा ते अभवदित्यु- | —इसीलिये ‘आत्मा ही मूर्त और
च्यते । | अमूर्त हुआ’ ऐसा कहा जाता है ।
किं च निरुक्तं चानिरुक्तं च । | तथा वही निरुक्त और अनिरुक्त
| भी हुआ । निरुक्त उसे कहते हैं
निरुक्तं नाम निष्कृष्य समाना- | जिसे सजातीय और विजातीय
समानजातीयेभ्यो देशकाल- | पदार्थोंसे अलग करके देश-काल-
| विशिष्टरूपसे ‘वह यह है’ ऐसा
विशिष्टतयेदं तदित्युक्तमनिरुक्तं | कहा जाय । इससे विपरीत लक्षणों-
तद्विपरीतं निरुक्तानिरुक्ते अपि | वालेको ‘अनिरुक्त’ कहते हैं ।
| निरुक्त और अनिरुक्त भी मूर्त और
मूर्तामूर्तयोरेव विशेषणे । यथा | अमूर्तके ही विशेषण हैं । जिस
| प्रकार ‘सत्’ और ‘त्यत्’ क्रमशः
सच्च त्यच्च प्रत्यक्षपरोक्षे, तथा | ‘प्रत्यक्ष’ और ‘परोक्ष’ को कहते हैं
निलयनं चानिलयनं च । निल- | उसी प्रकार ‘निलयन’ और ‘अनि-
| लयन’ भी समझने चाहिये ।
यनं नीडमाश्रयो मूर्तस्यैव धर्मः । | निलयन-—नीड अर्थात् आश्रय
अनिलयनं तद्विपरीतममूर्तस्यैव | मूर्तका ही धर्म है और उससे
| विपरीत अनिलयन अमूर्तका ही
धर्मः । | धर्म है ।
त्यदनिरुक्तानिलयनान्यमूर्त- | त्यत्, अनिरुक्त और अनिलयन—
धर्मत्वेऽपि व्याकृतविषयाण्येव । | ये अमूर्तके धर्म होनेपर भी व्याकृत
| ( व्यक्त ) से ही सम्बन्ध रखनेवाले
सर्गोत्तरकालभावश्रवणात् । त्य- | हैं; क्योंकि इनकी सत्ता सृष्टिके
दिति प्राणाद्यनिरुक्तं तदेवानि- | अनन्तर ही सुनी गयी है । त्यत्—
| यह प्राणादि अनिरुक्तका नाम है;
लयनं च । अतो विशेषणान्य- | वही अनिलयन भी है । अतः ये
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