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सर्वकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

पृष्ठ 119, कुल 261 में से

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पृष्ठ 119

अनु० १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३

( तै० उ० २ । ४ । १ ) “अ- | न पाकर लौट आती है” “न कहने
निरुक्तेऽनिलयने” (तै० उ० २ । | योग्य और अनाश्रितमें” इत्यादि
७ । १) इति चावाच्यत्वं | श्रुतियोंके अनुसार ब्रह्मका सत्यादि
नीलोत्पलवदवाक्यार्थत्वं च | शब्दोंका अवाच्यत्व और नील-कमलके समान अवाक्यार्थत्व सिद्ध
ब्रह्मणः । | होता है ।*
तद्यथाव्याख्यातं ब्रह्म यो वेद | उपर्युक्त प्रकारसे व्याख्या किये
[गुहाशब्दार्थ-निर्वचनम्] विजानाति निहितं | हुए उस ब्रह्मको जो पुरुष गुहामें
स्थितं गुहायाम् । | निहित ( छिपा हुआ ) जानता है । संवरण अर्थात् आच्छादन अर्थ-
गूहतेः संवरणार्थस्य निगूढा | वाले 'गूह्' धातुसे 'गुहा' शब्द
अस्यां ज्ञानज्ञेयज्ञातृपदार्था इति | निष्पन्न होता है; इस ( गुहा ) में ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञातृ पदार्थ निगूढ
गुहा बुद्धिः । गूढावस्थां भोगा- | ( छिपे हुए ) हैं इसलिये 'गुहा'
पवर्गौ पुरुषार्थाविति वा तस्यां | बुद्धिका नाम है । अथवा उसमें भोग और अपवर्ग-ये पुरुषार्थ निगूढ
परमे प्रकृष्टे व्योमन्व्योम्न्याका- | अवस्थामें स्थित हैं; अतः गुहा है ।
शेऽव्याकृताख्ये । तद्धि परमं | उसके भीतर परम-प्रकृष्ट व्योम-आकाशमें अर्थात् अव्याकृताकाशमें,
व्योम “एतस्मिन्नु खल्वक्षरे गार्ग्या- | क्योंकि “हे गार्गि ! निश्चय इस
काशः” ( बृ० उ० ३ । ८ । ११) | अक्षरमें ही आकाश [ ओतप्रोत है ]” इस श्रुतिके अनुसार अक्षरकी
इत्यक्षरसंनिकर्षात् । गुहायां | सन्निधिमें होनेसे यह अव्याकृताकाश

*तात्पर्य यह है कि वाच्य-वाचक-भाव ब्रह्मका बोध करानेमें समर्थ नहीं
हो सकता; अतः ब्रह्म इन शब्दोंका वाच्य नहीं हो सकता और सम्पूर्ण द्वैतकी
निवृत्तिके अधिष्ठानरूपसे लक्षित होनेके कारण वह नीलकमल आदिके समान
गुण-गुणीरूप संसर्गसूचक वाक्योंका भी अर्थ नहीं हो सकता ।
तै० उ० १५-१६-
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri