तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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प्रसिद्धिरतो नैव धात्वर्थस्तद्- | भली प्रकार सिद्ध ही है। अतः
क्रियारूपत्वात् । | क्रियारूप न होनेके कारण वह
| (ज्ञान) धातुका अर्थ भी नहीं है।
अत एव च न ज्ञानकर्तृ, | इसीलिये वह ज्ञानकर्ता भी नहीं
तस्मादेव च न ज्ञानशब्दवाच्य- | है और इसीसे वह ब्रह्म 'ज्ञान'
मपि तद्ब्रह्म । तथापि तदाभास- | शब्दका वाच्य भी नहीं है । तो भी
वाचकेन बुद्धिधर्मविषयेण ज्ञान- | ज्ञानाभासके वाचक तथा बुद्धि-
| के धर्मविषयक 'ज्ञान' शब्दसे वह
शब्देन तल्लक्ष्यते न तूच्यते । | लक्षित होता है-कहा नहीं जाता;
शब्दप्रवृत्तिहेतुजात्यादिधर्मरहित- | क्योंकि वह शब्दकी प्रवृत्तिके हेतु-
| भूत जाति आदि धर्मोंसे रहित है ।
त्वात् । तथा सत्यशब्देनापि। सर्व- | इसी प्रकार 'सत्य' शब्दसे भी
विशेषप्रत्यस्तमितस्वरूपत्वाद्ब्रह्मणो | [उसको लक्षित ही किया जा सकता
| है]। ब्रह्मका स्वरूप सम्पूर्ण विशेषणों-
बाह्यसत्तासामान्यविषयेण सत्य- | से शून्य है; अतः वह सामान्यतः
| सत्ता ही जिसका विषय-अर्थ है
शब्देन लक्ष्यते सत्यं ब्रह्मेति न | ऐसे 'सत्य' शब्दसे 'सत्यं ब्रह्म' इस
| प्रकार केवल लक्षित होता है-ब्रह्म
तु सत्यशब्दवाच्यमेव ब्रह्म । | 'सत्य' शब्दका वाच्य ही नहीं है ।
एवं सत्यादिशब्दा इतरेतर- | इस प्रकार ये सत्यादि शब्द
संनिधावन्योन्यनियम्यनियाम- | एक-दूसरेकी सन्निधिसे एक-दूसरेके
| नियम्य और नियामक होकर
काः सन्तः सत्यादिशब्दवाच्या- | सत्यादि शब्दोंके वाच्यार्थसे ब्रह्मको
त्तन्निवर्तका ब्रह्मणो लक्षणार्थाश्च | अलग रखनेवाले और उसका लक्षण
भवन्तीत्यतः सिद्धम् "यतो वाचो | करनेमें उपयोगी होते हैं । अतः
निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह" | "जहांसे मनके सहित वाणी उसे
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