तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
२३२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३
२३२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३
भावसे उसकी उपासना करे। इससे सम्पूर्ण काम्य पदार्थ उसके प्रति
विनम्र हो जाते हैं। वह ब्रह्म है—इस प्रकार उसकी उपासना करे।
इससे वह ब्रह्मनिष्ठ होता है। वह ब्रह्मका परिमर (आकाश) है—इस
प्रकार उसकी उपासना करे। इससे उससे द्वेष करनेवाले उसके प्रति-
पक्षी मर जाते हैं, तथा जो अप्रिय भ्रातृव्य (भाईके पुत्र) होते हैं
वे भी मर जाते हैं। वह, जो कि इस पुरुषमें है और वह जो इस
आदित्यमें है, एक है ॥ ४ ॥
तथा पृथिव्याकाशोपासकस्य | तथा पृथिवी और आकाशकी
आतिथ्योपदेशः वसतौ वसतिनि- | [ अन्न एवं अन्नादरूपसे ] उपासना
मित्तं कंचन कंचि- | करनेवालेके यहाँ रहनेके लिये कोई
दपि न प्रत्याचक्षीत वसत्यर्थ- | भी आवे उसे उसका परित्याग नहीं
मागतं न निवारयेदित्यर्थः । | करना चाहिये। अर्थात् अपने यहाँ
वासे च दत्तेऽवश्यं ह्यशनं दात- | निवास करनेके लिये आये हुए
व्यम् । तस्माद्यया कया च | किसी भी व्यक्तिका वह निवारण
विधया येन केन च प्रकारेण | न करे। जब किसीको रहनेका
बह्वन्नं प्राप्नुयाद्बह्वन्नसंग्रहं | स्थान दिया जाय तो उसे भोजन भी
कुर्यादित्यर्थः । | अवश्य देना चाहिये । अतः जिस-
| किसी भी विधिसे यानी किसी-न-
| किसी प्रकार बहुत-सा अन्न प्राप्त
| करे; अर्थात् खूब अन्न-संग्रह करे।
यस्मादन्नवन्तो विद्वांसोऽभ्या- | क्योंकि अन्नवान् उपासकगण
गतायान्नार्थिनेऽराधि संसिद्ध- | अपने यहाँ आये हुए अन्नार्थीसे
मष्मा अन्नमित्याचक्षते न | 'अन्न तैयार है' ऐसा कहते हैं-
नास्तीति प्रत्याख्यानं कुर्वन्ति । | 'अन्न नहीं है' ऐसा कहकर उसका
तस्माच्च हेतोर्बह्वन्नं प्राप्नुयादिति | परित्याग नहीं करते। इसलिये भी
पूर्वेण संबन्धः । अपि चान्ना- | बहुत-सा अन्न उपार्जन करे—इस
| प्रकार इसका पूर्ववाक्यसे सम्बन्ध
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अनु० १० ] शाङ्करभाष्यार्थ २३३
[संस्कृत-मूल/भाष्य]
नस्य माहात्म्यमुच्यते । यथा ।
यत्कालं प्रयच्छत्यन्नं तथा
तत्कालमेव प्रत्युपनमते । कथ-
मिति तदेतदाह—
एतद्वा अन्नं मुखतो मुख्ये
[हाशिया: वृत्तिभेदेनान्न-दानस्य फलभेदः] प्रथमे वयसि मु-
ख्यया वा वृत्त्या
पूजापुरःसरमभ्यागतायान्नार्थिने
राद्धं संसिद्धं प्रयच्छतीति वाक्य-
शेषः । तस्य किं फलं स्यादि-
त्युच्यते—मुखतः पूर्वे वयसि
मुख्यया वा वृत्त्यास्मा अन्नादा-
यान्नं राध्यते यथादत्तमुपतिष्ठत
इत्यर्थः । एवं मध्यतो मध्यमे
वयसि मध्यमेन चोपचारेण ।
तथाऽन्ततोऽन्ते वयसि जघन्येन
चोपचारेण परिभवेन तथैवास्मै
राध्यते संसिध्यत्यन्नम् ॥ १ ॥
य एवं वेद य एवमन्नस्य
यथोक्तं माहात्म्यं वेद तद्दानस्य
च फलम्, तस्य यथोक्तं फल-
मुपनमते ।
[भाष्यार्थ / हिन्दी अनुवाद]
है । अब अन्नदानका माहात्म्य कहा
जाता है—जो पुरुष जिस प्रकार
और जिस समय अन्न-दान करता
है उसे उसी प्रकार और उसी समय
उसकी प्राप्ति होती है । ऐसा किस
प्रकार होता है ? सो बतलाते हैं—
जो पुरुष मुखतः—मुख्य—प्रथम
अवस्थामें अथवा मुख्य वृत्तिसे यानी
सत्कारपूर्वक राद्ध अर्थात् सिद्ध
(पक्व) अन्नको अपने यहाँ आये
हुए अन्नार्थी अतिथिको देता है—
यहाँ प्रयच्छति (देता है) यह
क्रियापद वाक्यशेष (अनुक्त अंश)
है—उसे क्या फल मिलता है, सो
बतलाया जाता है—इस अन्नदाताको
मुखतः—प्रथम अवस्थामें अथवा
मुख्य वृत्तिसे अन्न प्राप्त होता है;
अर्थात् जिस प्रकार दिया जाता है
उसी प्रकार प्राप्त होता है । इसी
प्रकार मध्यतः मध्यम आयुमें अथवा
मध्यम वृत्तिसे तथा अन्ततः—अन्तिम
आयुमें अथवा निकृष्ट वृत्तिसे यानी
तिरस्कारपूर्वक देनेसे इसे उसी
प्रकार अन्नकी प्राप्ति होती है ॥१॥
जो इस प्रकार जानता है—जो
इस प्रकार अन्नका पूर्वोक्त माहात्म्य
और उसके दानका फल जानता है
उसे पूर्वोक्त फलकी प्राप्ति होती है ।
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२३४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३
[संस्कृत-भाष्यम् / Left Column]
[पार्श्व-टिप्पणी:]
ब्रह्मोपासन-प्रकारान्तराणि
'मानुषी समाज्ञा'
इदानीं ब्रह्मण उपासनप्रकार
उच्यते--क्षेम इति
वाचि । क्षेमो ना-
मोपात्तपरिरक्षणम् ।
ब्रह्म वाचि क्षेमरूपेण प्रतिष्ठित-
मित्युपास्यम् । योगक्षेम इति,
योगोऽनुपात्तस्योपादानम्, तौ
हि योगक्षेमौ प्राणापानयोः सतो-
र्भवतो यद्यपि तथापि न प्राणा-
पाननिमित्तावेव किं तर्हि ब्रह्म-
निमित्तौ; तस्माद्ब्रह्म योगक्षेमा-
त्मना प्राणापानयोः प्रतिष्ठित-
मित्युपास्यम् ।
एवमुत्तरेष्वन्येषु तेन तेना-
त्मना ब्रह्मैवोपास्यम् । कर्मणो
ब्रह्मनिर्वर्त्यत्वाद्धस्तयोः कर्मा-
त्मना ब्रह्म प्रतिष्ठितमित्युपा-
स्यम् । गतिरिति पादयोः ।
विमुक्तिरिति पायौ । इत्येता
मानुषीर्मनुष्येषु भवा मानुष्यः
[हिन्दी-अनुवाद / Right Column]
अब ब्रह्मकी उपासनाका [ एक
और ] प्रकार बतलाया जाता है—
'क्षेम है' इस प्रकार वाणीमें । प्राप्त
पदार्थकी रक्षा करनेका नाम 'क्षेम'
है । वाणीमें ब्रह्म क्षेमरूपसे स्थित
है—इस प्रकार उसकी उपासना
करनी चाहिये । 'योगक्षेम'—अप्राप्त
वस्तुका प्राप्त करना 'योग' कहलाता
है । वे योग और क्षेम यद्यपि
बलवान् प्राण और अपानके रहते
हुए ही होते हैं, तो भी उनका
कारण प्राण एवं अपान ही नहीं
है । तो उनका कारण क्या है ?
वे ब्रह्मके कारण ही होते हैं । अतः
योगक्षेमरूपसे ब्रह्म प्राण और अपान-
में स्थित है—इस प्रकार उसकी
उपासना करनी चाहिये ।
इसी प्रकार आगेके अन्य पर्यायों-
में भी उन-उनके रूपसे ब्रह्मकी ही
उपासना करनी चाहिये । कर्म
ब्रह्मकी ही प्रेरणासे निष्पन्न होता है;
अतः हाथोंमें ब्रह्म कर्मरूपसे स्थित
है—इस प्रकार उसकी उपासना
करनी चाहिये । चरणोंमें गतिरूपसे
और पायुमें विसर्जनरूपसे [ प्रतिष्ठित
समझकर उसकी उपासना करे ] ।
इस प्रकार यह मानुषी—मनुष्योंमें
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अनु० १० ] शाङ्करभाष्यार्थ २३५
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समाज्ञाः, आध्यात्मिक्यः समाज्ञा | रहनेवाली समाज्ञा है, अर्थात् यह
ज्ञानानि विज्ञानान्युपासनानी- | आध्यात्मिक समाज्ञा-ज्ञान-विज्ञान
त्यर्थः । | यानी उपासना है-यह इसका तात्पर्य है ।
अथानन्तरं दैवीर्दैवत्यो देवेषु | अब इसके पश्चात् दैवी-देव-
'दैवी समाज्ञा' भवाः समाज्ञा उ- | सम्बन्धिनी अर्थात् देवताओंमें होने-
च्यन्ते । तृप्तिरिति | वाली समाज्ञा कही जाती है । तृप्ति
वृष्टौ । वृष्टेरन्नादिद्वारेण तृप्ति- | इस भावसे वृष्टिमें [ ब्रह्मकी उपासना
हेतुत्वाद्व्रह्मैव तृप्त्यात्मना वृष्टौ | करे ] । अन्नादिके द्वारा वृष्टि तृप्ति-
व्यवस्थितमित्युपास्यम् । तथान्येषु | का कारण है । अतः तृप्तिरूपसे
तेन तेनात्मना ब्रह्मैवोपास्यम् । | ब्रह्म ही वृष्टिमें स्थित है-इस प्रकार
तथा बलरूपेण विद्युति ॥ २ ॥ | उसकी उपासना करनी चाहिये ।
यशोरूपेण पशुषु । ज्योतीरूपेण | इसी प्रकार अन्य पर्यायोंमें भी उन-
नक्षत्रेषु । प्रजातिरमृतममृतत्व- | उनके रूपसे ब्रह्मकी ही उपासना
प्राप्तिः पुत्रेण ऋणविमोक्षद्वारेणा- | करनी चाहिये । अर्थात् बलरूपसे
नन्दः सुखमित्येतत्सर्वमुपस्थनि- | विद्युत्में ॥ २ ॥ यशरूपसे पशुओंमें,
मिक्तं ब्रह्मैवानेनात्मनोपस्थे प्रति- | ज्योतिरूपसे नक्षत्रोंमें, प्रजाति
ष्ठितमित्युपास्यम् । | ( पुत्रादि प्रजा ) अमृत-अर्थात् पुत्र-
सर्वं ह्याकाशे प्रतिष्ठितमतो | द्वारा पितृऋणसे मुक्त होनेके द्वारा
यत्सर्वमाकाशे तद्ब्रह्मैवेत्युपास्यम् । | अमृतत्वकी प्राप्ति और आनन्द-सुख
तच्चाकाशं ब्रह्मैव । तस्मात्तत् | ये सब उपस्थके निमित्तसे ही
| होनेवाले हैं; अतः इनके रूपसे
| ब्रह्म ही उपस्थमें स्थित है-इस प्रकार
| उसकी उपासना करनी चाहिये ।
| सब कुछ आकाशमें ही स्थित
| है । अतः आकाशमें जो कुछ है
| वह सब ब्रह्म ही है-इस प्रकार
| उसकी उपासना करनी चाहिये ।
| तथा वह आकाश भी ब्रह्म ही है ।
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