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सर्वकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

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पृष्ठ 241

अनु० १० ] शाङ्करभाष्यार्थ २३५
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समाज्ञाः, आध्यात्मिक्यः समाज्ञा | रहनेवाली समाज्ञा है, अर्थात् यह
ज्ञानानि विज्ञानान्युपासनानी- | आध्यात्मिक समाज्ञा-ज्ञान-विज्ञान
त्यर्थः । | यानी उपासना है-यह इसका तात्पर्य है ।
अथानन्तरं दैवीर्दैवत्यो देवेषु | अब इसके पश्चात् दैवी-देव-
'दैवी समाज्ञा' भवाः समाज्ञा उ- | सम्बन्धिनी अर्थात् देवताओंमें होने-
च्यन्ते । तृप्तिरिति | वाली समाज्ञा कही जाती है । तृप्ति
वृष्टौ । वृष्टेरन्नादिद्वारेण तृप्ति- | इस भावसे वृष्टिमें [ ब्रह्मकी उपासना
हेतुत्वाद्व्रह्मैव तृप्त्यात्मना वृष्टौ | करे ] । अन्नादिके द्वारा वृष्टि तृप्ति-
व्यवस्थितमित्युपास्यम् । तथान्येषु | का कारण है । अतः तृप्तिरूपसे
तेन तेनात्मना ब्रह्मैवोपास्यम् । | ब्रह्म ही वृष्टिमें स्थित है-इस प्रकार
तथा बलरूपेण विद्युति ॥ २ ॥ | उसकी उपासना करनी चाहिये ।
यशोरूपेण पशुषु । ज्योतीरूपेण | इसी प्रकार अन्य पर्यायोंमें भी उन-
नक्षत्रेषु । प्रजातिरमृतममृतत्व- | उनके रूपसे ब्रह्मकी ही उपासना
प्राप्तिः पुत्रेण ऋणविमोक्षद्वारेणा- | करनी चाहिये । अर्थात् बलरूपसे
नन्दः सुखमित्येतत्सर्वमुपस्थनि- | विद्युत्में ॥ २ ॥ यशरूपसे पशुओंमें,
मिक्तं ब्रह्मैवानेनात्मनोपस्थे प्रति- | ज्योतिरूपसे नक्षत्रोंमें, प्रजाति
ष्ठितमित्युपास्यम् । | ( पुत्रादि प्रजा ) अमृत-अर्थात् पुत्र-
सर्वं ह्याकाशे प्रतिष्ठितमतो | द्वारा पितृऋणसे मुक्त होनेके द्वारा
यत्सर्वमाकाशे तद्ब्रह्मैवेत्युपास्यम् । | अमृतत्वकी प्राप्ति और आनन्द-सुख
तच्चाकाशं ब्रह्मैव । तस्मात्तत् | ये सब उपस्थके निमित्तसे ही
| होनेवाले हैं; अतः इनके रूपसे
| ब्रह्म ही उपस्थमें स्थित है-इस प्रकार
| उसकी उपासना करनी चाहिये ।
| सब कुछ आकाशमें ही स्थित
| है । अतः आकाशमें जो कुछ है
| वह सब ब्रह्म ही है-इस प्रकार
| उसकी उपासना करनी चाहिये ।
| तथा वह आकाश भी ब्रह्म ही है ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri