तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 240, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ें२३४ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३
[संस्कृत-भाष्यम् / Left Column]
[पार्श्व-टिप्पणी:]
ब्रह्मोपासन-प्रकारान्तराणि
'मानुषी समाज्ञा'
इदानीं ब्रह्मण उपासनप्रकार
उच्यते--क्षेम इति
वाचि । क्षेमो ना-
मोपात्तपरिरक्षणम् ।
ब्रह्म वाचि क्षेमरूपेण प्रतिष्ठित-
मित्युपास्यम् । योगक्षेम इति,
योगोऽनुपात्तस्योपादानम्, तौ
हि योगक्षेमौ प्राणापानयोः सतो-
र्भवतो यद्यपि तथापि न प्राणा-
पाननिमित्तावेव किं तर्हि ब्रह्म-
निमित्तौ; तस्माद्ब्रह्म योगक्षेमा-
त्मना प्राणापानयोः प्रतिष्ठित-
मित्युपास्यम् ।
एवमुत्तरेष्वन्येषु तेन तेना-
त्मना ब्रह्मैवोपास्यम् । कर्मणो
ब्रह्मनिर्वर्त्यत्वाद्धस्तयोः कर्मा-
त्मना ब्रह्म प्रतिष्ठितमित्युपा-
स्यम् । गतिरिति पादयोः ।
विमुक्तिरिति पायौ । इत्येता
मानुषीर्मनुष्येषु भवा मानुष्यः
[हिन्दी-अनुवाद / Right Column]
अब ब्रह्मकी उपासनाका [ एक
और ] प्रकार बतलाया जाता है—
'क्षेम है' इस प्रकार वाणीमें । प्राप्त
पदार्थकी रक्षा करनेका नाम 'क्षेम'
है । वाणीमें ब्रह्म क्षेमरूपसे स्थित
है—इस प्रकार उसकी उपासना
करनी चाहिये । 'योगक्षेम'—अप्राप्त
वस्तुका प्राप्त करना 'योग' कहलाता
है । वे योग और क्षेम यद्यपि
बलवान् प्राण और अपानके रहते
हुए ही होते हैं, तो भी उनका
कारण प्राण एवं अपान ही नहीं
है । तो उनका कारण क्या है ?
वे ब्रह्मके कारण ही होते हैं । अतः
योगक्षेमरूपसे ब्रह्म प्राण और अपान-
में स्थित है—इस प्रकार उसकी
उपासना करनी चाहिये ।
इसी प्रकार आगेके अन्य पर्यायों-
में भी उन-उनके रूपसे ब्रह्मकी ही
उपासना करनी चाहिये । कर्म
ब्रह्मकी ही प्रेरणासे निष्पन्न होता है;
अतः हाथोंमें ब्रह्म कर्मरूपसे स्थित
है—इस प्रकार उसकी उपासना
करनी चाहिये । चरणोंमें गतिरूपसे
और पायुमें विसर्जनरूपसे [ प्रतिष्ठित
समझकर उसकी उपासना करे ] ।
इस प्रकार यह मानुषी—मनुष्योंमें
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