पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
अन्योन्याध्यासरूपी ऐक्यज्ञान ] हो रहा था उस भ्रमज्ञान का
अन्तकाल तो यही है कि उनकी भेदबुद्धि उत्पन्न हो जाय
[अर्थात् उन अद्वैत और द्वैत को क्रम से सत्य और अनृत
समझ लिया जाय]। इस श्लोक में अन्तकाल शब्द का अभि-
प्राय वर्तमान देहपात से नहीं है ।
यद्वान्तकालः प्राणस्य वियोगोऽस्तु प्रसिद्धितः।
तस्मिन् कालेऽपि न भ्रान्तेर्गतायाः पुनरागमः॥१०५॥
अथवा लोकप्रसिद्धि के अनुसार प्राणों के वियोग को ही
अन्तकाल मान लो । उस में भी कोई दोष नहीं है । क्योंकि
जो भ्रान्ति उस समय नष्ट हो जायगी वह भ्रान्ति फिर कभी
भी लौट कर आने वाली नहीं है ।
इस लोक तथा परलोक की सन्धि 'मृत्यु' होती है । मृत्यु
समय में जिसकी भ्रान्ति नष्ट हो जायगी दूसरे शब्दों में उस
की परलोकसामग्री जल कर भस्म बन जायगी। फिर उसे
विदेह मुक्ति मिल जानी अत्यन्त सुकर होगी ।
नीरोग उपविष्टो वा रुग्णो वा विलुठन् भुवि ।
मूर्च्छितो वा त्यजत्वेष प्राणान् भ्रान्तिर्न सर्वथा ॥१०६॥
[जिस पुरुष की द्वैतावज्ञा स्थित हो गयी हो अथवा जिसे
ब्राह्मी स्थिति की प्राप्ति हो चुकी हो फिर] वह चाहे तो नीरोग
होकर, चाहे बैठे बैठे, चाहे रोगी रहकर, या भूमि पर पड़े
पड़े, अथवा मूर्च्छा अवस्था में प्राणों का त्याग करदे, उसे फिर
कभी भी भ्रान्ति नहीं हो सकती [मूर्च्छा आदि में ब्रह्म-विषयक
बुद्धिवृत्ति न भी हो तो भी ब्रह्मज्ञान के संस्कार तो रहते ही हैं,
उन्हीं से मुक्ति मिलकर रहेगी।]
पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ७१
पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ७१
दिने दिने स्वप्नसुप्त्योरधीते विस्मृतेऽप्ययम् ।
परेद्युर्नानधीतः स्यात्तद्वद्विद्या न नश्यति ॥१०७॥
स्वप्न और सुषुप्ति अवस्था के आने पर प्रतिदिन पढ़े हुए
पाठ के भूल जाने पर भी, अगले दिन जब वह पाठक उठता
है तब अनधीत [अनपढ़] नहीं हो जाता है । इसी प्रकार मरते
समय मूर्च्छादि के कारण तत्व का विचार न कर सकने पर भी,
ज्ञानी का ज्ञान नष्ट नहीं होता है । [वह संस्कार रूप से तो
रहता ही है ।]
प्रमाणोत्पादिता विद्या प्रमाणं प्रवलं विना ।
न नश्यति न वेदान्तात् प्रवलं मानमीक्ष्यते ॥१०८॥
जिस विद्या को प्रमाणों ने उत्पन्न किया है, वह किसी
प्रबल प्रमाण के बिना नष्ट नहीं हो सकेगी । वेदान्तों से प्रबल
प्रमाण तो कोई देखा ही नहीं जाता । [फिर यह ज्ञान मूर्च्छा
आदि में कैसे नष्ट हो सकेगा ?]
तस्माद् वेदान्तसंसिद्धं सदद्वैतं न वाध्यते ।
अन्तकालेऽप्यतो भूतविवेकान्निर्वृतिः स्थिता ॥१०९॥
इससे यही सिद्ध हुआ कि वेदान्तसिद्ध सत् अद्वैत की
बाधा अन्तकाल में भी नहीं होगी । इसी से यह कहना सर्वथा
ठीक है कि भूतविवेक कर लेने पर ही निर्वृत्ति [किंवा मुक्ति]
की स्थिरता हो जाती है ।
इति श्रीमद्विद्यारण्यमुनिविरचितं पंचभूतविवेकप्रकरणं समाप्तम्
3. Pancha Kosha Viveka
ओम्
पञ्चकोशविवेकप्रकरणम्
गुहाहितं ब्रह्म यत्तत् पञ्चकोशविवेकतः ।
बोद्धुं शक्यं ततः कोशपंचकं प्रविविच्यते ॥१॥
गुहा में छिपा हुआ जो ब्रह्मतत्व है वह पंचकोशविवेक के
करने पर भी जाना जा सकता है । इसलिये पांचों कोशों का
विवेक किया जाता है ।
यह प्रकरण तैत्तरीय उपनिषत् के तात्पर्य का व्याख्यान रूप
है—'यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् सोश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा
विपश्चिता' जो गुहा में छिपे हुए ब्रह्म को पहचानता है, इस
श्रुति में जिस गुहाहित ब्रह्म का प्रतिपादन किया गया है उस
ब्रह्म का ज्ञान पांचकोश नामक गुहाओं के विवेक से ही हो
सकता है । इसी कारण उन पांचों कोशों को आत्मा से पृथक्
करके अब दिखाया जाता है ।
देहादभ्यन्तरः प्राणः प्राणादभ्यन्तरं मनः ।
ततः कर्ता ततो भोक्ता गुहा सेयं परम्परा ॥२॥
देह से अन्दर प्राण, प्राण से अन्दर मन, मन से अन्दर
बुद्धि, तथा बुद्धि से अन्दर आनन्द, बस यह परम्परा ही तो
'गुहा' कहाती है ।
देह [अन्नमय कोष] से प्राण [प्राणमय कोश] अन्दर है ।
प्राण से मन अर्थात् मनोमय अन्दर है । मनोमय से 'कर्ता'
पंचकोशविवेकप्रकरणम् ७३
पंचकोशविवेकप्रकरणम् ७३
जिसको 'विज्ञानमय' भी कहते हैं अन्दर है । उस विज्ञानमय
से 'भोक्ता' अर्थात् 'आनन्दमय' अन्दर का है । सो यह 'अन्न-
मय' से लेकर 'आनन्दमय' तक की परम्परा ही 'गुहा'
कहाती है । इसी में ब्रह्म लुक छिप गया है । इन पांचों
कोशों का विवेक कर लेने पर फिर भी उस के शुद्ध रूप के
दर्शन मिल ही सकते हैं ।
पितृभुक्तान्नजाद् वीर्याज्जातोऽन्नेनैव वर्धते ।
देहः सोऽन्नमयो नात्मा प्राक् चोर्ध्वं तदभावतः ॥३॥
माता और पिता जिस अन्न को खाते हैं, उस से जो वीर्य
बनता है, उस से यह देह उत्पन्न होता है । उत्पन्न होने के
पश्चात् यह फिर अन्न से ही वृद्धि को पाने लगता है । सो यह
तो स्पष्ट ही अन्न का विकार है । इस कारण यह अन्नमय
देह आत्मा नहीं है । देखते हैं कि जन्म होने से पहले भी यह
देह नहीं था, तथा मरने के पश्चात् भी यह देह नहीं रहेगा ।
[तात्पर्य यह है कि घटपदादि के समान उत्पत्ति वाला होने से
यह देह आत्मा नहीं है]
पूर्वजन्मन्यसन्नेतज्जन्म संपादयेत् कथम् ।
भाविजन्मन्यसत् कर्म न भुञ्जीतेह संचितम् ॥४॥
यदि वह पूर्व जन्म में नहीं था तो इसने इस जन्म को
पाया ही कैसे ? यदि इसका भावि जन्म नहीं होगा तो यहाँ
संचित किये पुण्य पापों को नहीं भोग सकेगा । [ इस कारण
आत्मा को देह से पृथक् और नित्य मानना चाहिये । ]
जब आत्मा को देहरूप ही माना जाता है तब यह स्पष्ट
ही है कि यह पूर्वजन्म में नहीं था और इस जन्म को उत्पन्न
७४ पंचदशी
करने वाला अदृष्ट भी नहीं था । फिर इस जन्म की उत्पत्ति
इस देहरूप आत्मा ने स्वयं कैसे करली ? इस पक्ष में
तो 'अकृताभ्यागम' दोष आता है अर्थात् जो इस शरीरात्मा ने
किया नहीं था उसे अब यह विचारा भोग रहा है । यह देह-
रूप आत्मा तो भाविजन्मों में भी नहीं रहेगा । यह तो यहाँ
ही गाड़ डाला या जला दिया जायगा । तब इस जन्म में
किये भले-बुरे कामों के फल को भोगने वाला कोई न रहेगा ।
सो यह 'कृतविनाश' नाम का महादोष आजायगा । इन दोनों
दोषों के कारण आत्मा को कार्य किंवा उत्पत्ति वाला मानना
ठीक नहीं है ।
पूर्णो देहे बल यच्छन्नक्षाणां यः प्रवर्तकः ।
वायुः प्राणमयो नासावात्मा चैतन्यवर्जनात् ॥५॥
पैर से लेकर मस्तकपर्यन्त देह में पूर्ण होकर [ व्यानरूप से ]
बल किंवा सामर्थ्य को देता हुआ जो वायु, चक्षु आदि इन्द्रियों का
प्रेरक होता है, वह वायु ही 'प्राणमय' कोश कहाता है। चैतन्य
रहित किंवा जड होने के कारण वह भी तो आत्मा नहीं है ।
अहन्तां ममतां देहे गेहादौ च करोति यः ।
कामाद्यवस्थया भ्रान्तो नासावात्मा मनोमयः ॥६॥
देह में 'मैं' भाव और गृहादि में 'मेरेपन का अभिमान'
जो किया करता है वह मनोमय भी आत्मा नहीं है । क्योंकि
वह तो कामादि अवस्थाओं से भ्रान्त हुआ रहता है । [ काम
क्रोध आदि विकारों के कारण उस मनोमय का स्वभाव नियत
नहीं रहता है। वह तो विकारी हुआ रहता है। फिर वह आत्मा
कैसे हो । क्योंकि आत्मा तो निर्विकार तत्व है ।]
पंचकोशविवेकप्रकरणम् ७५
पंचकोशविवेकप्रकरणम् ७५
लीना सुप्तौ वपुर्बोधे व्याप्नुयादानखाग्रगा ।
चिच्छायोपेतधीर्नात्मा विज्ञानमयशब्दभाक् ॥७॥
चिच्छाया से युक्त जो बुद्धि, सुषुप्तिकाल में लीन होजाती
है, तथा जागने पर नखाग्र तक शरीर को व्याप्त किये रहती
है, वह विज्ञानमय कहाने वाली बुद्धि भी तो आत्मा नहीं है
[बताओ कि विलय आदि अवस्थाओं में फंस जानेवाली बुद्धि
आत्मा कैसे हो ? ]
कर्तृत्वकरणत्वाभ्यां विक्रियेतान्तरिन्द्रियम् ।
विज्ञानमनसी अन्तर्बहिःस्थैते परस्परम् ॥८॥
[मनोमय तथा विज्ञानमय का भेद इस श्लोक में बताया जाता
हैं] अन्दर की इन्द्रिय जिसे मन भी कहते हैं, कभी तो कर्त्ता-
रूप से तथा कभी करणरूप से परिणत होती रहती है। जब
कर्त्तारूप से परिणत होती है तब उसको 'विज्ञानमय कोश'
कहते हैं। जब करणरूप से परिणत होती है तब उस को
'मनोमय कोश' कहा जाता है। ये दोनों आपस में अन्दर
बाहर रहा करते हैं [बुद्धि अन्दर रहती है, मन बाहर रहता
है, उसी से एक के ही दो कोश हो गये हैं।]
काचिदन्तर्मुखा वृत्तिरानन्दप्रतिविम्बभाक् ।
पुण्यभोगे, भोगशान्तौ निद्रारूपेण लीयते ॥९॥
जब हम किसी पुण्यकर्म के फल का अनुभव करते हैं,
तब कोई बुद्धिवृत्ति अन्तर्मुख हो जाती है और उस पर आनन्द
का प्रतिविम्ब पड़ जाता है, तथा भोगों के शान्त हो जाने पर
वही बुद्धिवृत्ति निद्रारूप से विलीन हो जाती है। [उस लीन
बुद्धिवृत्ति को ही 'आनन्दमय' कहा जाता है।]
७६ पंचदशी
कादाचित्कत्वतो नात्मा स्यादानान्दमयोऽप्ययम् ।
विम्बभूतो य आनन्द आत्मासौ सर्वदा स्थितेः॥१०॥
यह 'आनन्द' भी कादाचित्क[कभी कभी होने वाला=सदा
न रहने वाला] होने से [मेघ आदि कादाचित्क पदार्थों के
समान] आत्मा नहीं है। किन्तु बुद्धि आदि में प्रतिबिम्बित
होकर बैठे हुए आनन्दमय का बिम्बभूत अर्थात् कारणभूत जो
आनन्द है, वही तो सच्चा आत्मा है। क्योंकि वह सदा ही
बना रहता है [नित्य है]
ननु देहमुपक्रम्य निद्रानन्दान्तवस्तुषु ।
मा भूदात्मत्वमन्यस्तु न कश्चिदनुभूयते ॥११॥
अन्नमय देह से लेकर निद्रा तथा आनन्द पर्यन्त पदार्थों
में आत्मभाव नहीं है तो न सही, परन्तु इन के अतिरिक्त और
भी तो कोई वस्तु अनुभव में नहीं आती है [जिसे आत्मा
कहा जा सकता हो]।
बाढं, निद्रादयः सर्वेऽनुभूयन्ते न चेतरः ।
तथाप्येतेऽनुभूयन्ते येन तं को निवारयेत् ॥१२॥
इस प्रश्न का उत्तर यह है कि—"निद्रानन्द से लेकर देह
पर्यन्त पदार्थ उपलब्ध होते हैं और कुछ भी पदार्थ उपलब्ध नहीं
होता" तुम्हारा यह कहना तो बिलकुल ठीक है। परन्तु इन सब
पदार्थों का अनुभव जो करता है उस को कौन हटा सकता है।
[तात्पर्य यह है कि यह तो ठीक है कि इन के अतिरिक्त
और कोई उपलब्ध नहीं होता है परन्तु जिस अनुभव के बल
से इन सब आनन्दमयादि में उपलभ्यमानता आ गयी है उस
अनुभव की सत्ता का निषेध तुम कैसे कर सकते हो]
पंचकोशविवेकप्रकरणम् ७७
[Header]
पंचकोशविवेकप्रकरणम् ७७
स्वयमेवानुभूतित्वाद् विद्यते नानुभाव्यता ।
ज्ञातृज्ञानान्तराभावादज्ञेयो न त्वसत्तया ॥१३॥
स्वयं अनुभूतिरूप होने से वह तत्त्व किसी का अनुभाव्य
नहीं होता है । उस से भिन्न ज्ञाता और उस से भिन्न ज्ञान
दूसरा न होने से वह अज्ञेय रहता है। उस के अज्ञेय होने का
कारण असत्ता नहीं होती ।
इन आनन्दमयादियों का जो साक्षी है वह क्योंकि अनु-
भव रूप है इसी से वह अनुभाव्य कभी नहीं होता है । उस
के 'अज्ञेय' होने का कारण उसकी असत्ता नहीं है । किन्तु
उस से भिन्न ज्ञाता और उस से भिन्न ज्ञान कोई होता ही नहीं
है इस कारण से वह अज्ञेय बना हुआ है। ऐसी अवस्था में
केवल अनुपलब्ध होने से ही उसे असत् नहीं मान बैठना
चाहिये । उपलब्ध तो विषय हुआ करते हैं । वह किसी का
विषय नहीं है । इसी से वह किसी को उपलब्ध नहीं होता
है । वह तो उपलब्ध करने वालों का स्वयं आत्मा [आपा] ही
होता है ।
माधुर्यादिखभावानामन्यत्र स्वगुणार्पिणाम् ।
स्वस्मिंस्तदर्पणापेक्षा नो, न चास्त्यन्यदर्पकम् ॥१४॥
माधुर्य आदि स्वभाव वाले [गुडादि पदार्थ] जौ चने आदि
में, अपने माधुर्य आदि गुणों को डाल देते हैं, वे अपने आप
में तो उन मधुरता आदि की ज़रूरत ही नहीं रखते [वे गुडादि
यह कभी नहीं चाहते कि कोई हमको आकर मीठा कर दे ]
इसके अतिरिक्त गुडादि में मधुरता को उत्पन्न करने वाली
कोई वस्तु भी तो नहीं है ।
७८ पंचदशी
अर्पकान्तरराहित्येऽप्यस्त्येषां तत्स्वभावता ।
माभूत्तथाऽनुभाव्यत्वं बोधात्मा तु न हीयते ॥१५॥
उनमें माधुर्यादि पैदा करने वाले किसी दूसरे पदार्थ के
न होने पर भी इन गुडादियों में माधुर्यादिस्वभावता है ही ।
इसी प्रकार आत्मा भले ही [किसी के] अनुभव का विषय न
होता हो, परन्तु उसकी अनुभवरूपता तो रहती ही है । उसे
कौन हटा सकता है ?
स्वयंज्योतिर्भवत्येष पुरोऽस्माद् भासतेऽखिलात् ।
तमेव भान्तमन्वेति तद्भासा भास्यते जगत् ॥१६॥
“अत्रायं पुरुषः स्वयं ज्योतिर्भवति, अस्मादखिलात्पुरतः भासते,
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति”'काठ २-३-१५)
इत्यादि श्रुतियें आत्मा को स्वप्रकाश बता रही हैं ।
येनेदं जानते सर्वं तत् केनान्येन जानताम् ।
विज्ञातारं केन विन्द्याच्छक्तं वेद्ये तु साधनम् ॥१७॥
जिस से इस सब [पसारे] को जान रहे हैं, उस [ज्ञाता]
को दूसरे किस से जानें ? जानने वालों को किस से पहचानें ?
क्योंकि जानने के साधन भी तो वेद्य पदार्थ को ही जानने में शक्त हैं।
जिस साक्षिचैतन्य रूप आत्मा से, प्राणी इस समस्त दृश्य
जगत् को जानते हैं, उस साक्षी आत्मा को किस साक्ष्य जड
पदार्थ से जानें ? तात्पर्य यह है कि—इस दृश्य जगत् के
ज्ञाता को किस दृश्य से जाना जाय ? अर्थात् वह किसी से
भी नहीं जाना जा सकता । ज्ञान का साधन यह बिचारा मन
भी तो वेद्य पदार्थ में ही समर्थ है । ज्ञाता आत्मा में तो उस से
भी कुछ नहीं होता । देखो बृहदारण्यक ४–५–१५ ।
पंचकोशविवेकप्रकरणम् ७९
पंचकोशविवेकप्रकरणम् ७९
स वेत्ति वेद्यं तत्सर्वं नान्यस्तस्यास्ति वेदिता।
विदिताविदिताभ्यां तत् पृथग्बोधस्वरूपकम् ॥१८॥
आत्मा को स्वप्रकाश सिद्ध करने के लिये ‘स वेत्ति वेद्यं न
च तस्यास्ति वेत्ता’(श्वे० ३–१९)‘अन्यदेव तद्विदितादयो अविदितादधि’
(केन–१–३) इन दोनों वाक्यों के अर्थ का उल्लेख इस श्लोक
में किया गया है—वह आत्मा, जो भी कुछ वेद्य पदार्थ हैं,
उन सभी को जाना करता है। परन्तु उस आत्मा का ज्ञाता
और कोई भी नहीं है। ज्ञानस्वरूप वह ब्रह्म विदित् [ज्ञान से
विषय किये हुए] तथा अविदित [अज्ञान से ढके हुए] दोनों
से ही विलक्षण है। क्योंकि वह तो साक्षात् बोधस्वरूप ही
ठहरा। [विदित तो इसलिये नहीं कि वह बुद्धिवृत्ति का
विषय नहीं होता। अविदित इसलिये नहीं कि उस से भिन्न
और कोई जानने वाला ही नहीं है।]
बोधे ऽप्यनुभवो यस्य न कथंचन जायते।
तं कथं बोधयेच्छास्त्रं लोष्टं नरसमाकृतिम् ॥१९॥
जिस मूर्ख को तो [घटादि की प्रतीति रूपी] बोध का
अनुभव [साक्षात्कार] किसी प्रकार भी नहीं होता है, उस
मनुष्याकार ढेले को विचारा शास्त्र भी कैसे समझायेगा ?
[तात्पर्य यह है कि “ज्ञात और अज्ञात पदार्थ ही अनुभव में
आते हैं। ज्ञान किंवा बोध तो कहीं भी दीखता नहीं है” ऐसी
यदि कोई शंका करे तो उस को कहना चाहिये कि, ज्ञात किंवा
विदित का विशेषण जो ज्ञान तथा वेदन है वही तो बोध है।
उस बोध का अनुभव जिस मूर्ख को न होगा, उस को
तो ज्ञात या विदित का भी अनुभव नहीं हो सकेगा।
८० पंचदशी
इस कारण बोध के अनुभव को तो अवश्य ही मानना
पड़ता है]।
जिह्वा मेऽस्ति न वेत्युक्ति र्लज्जायै केवलं यथा।
न बुध्यते मया बोधो बोद्धव्य इति तादृशी ॥२०॥
("मेरे जिह्वा है या नहीं" यह कहना जैसे केवल लज्जा के
लिये ही होता है [ऐसा कहने वाला मूर्ख समझा जाता है।
उस को कोई भी बुद्धिमान् नहीं मान सकता] क्योंकि जिह्वा
के बिना तो भाषण ही नहीं हो सकता। ठीक इसी प्रकार 'मैं
बोध को अब तक नहीं जानता, उस बोध को तो मुझे अभी
जानना है' (यह कथन भी वैसा ही) लज्जाजनक है।) क्योंकि
बोध के बिना तो यह बात भी नहीं कही जा सकती है।
यस्मिन्यस्मिन्नस्ति लोके बोधस्तत्तदुपेक्षणे।
यद् बोधमात्रं तद्ब्रह्मेत्येवंधीर्ब्रह्म निश्चयः ॥२१॥
लोक में जिन घटादि नाम वाले विषयों का ज्ञान होता
है, उन उन विषयों की उपेक्षा किंवा अनादर कर देने पर
[घटादि सभी पदार्थों में अनुस्यूत] जो केवल ज्ञानरूप एक
स्फूर्ति [शान्त भाव से विराजती हुई] दीखने लगती है वही
ब्रह्म तत्व है, ऐसा यदि किसी की बुद्धि को पता चल जाय, तो
हम इसी को 'ब्रह्मनिश्चय' कहते हैं [हम समझते हैं कि ऐसा
निश्चय कर लेने वाले को ब्रह्मज्ञान हो चुका है]।
पञ्चकोशपरित्यागे साक्षिबोधावशेषतः।
स्वस्वरूपं स एव स्याच्छून्यत्वं तस्य दुर्घटम् ॥२२॥
अन्नमयादि पांचों कोशों का परित्याग जब हम कर देते
हैं,
[Header] पंचकोशविवेकप्रकरणम् ८१
[Header] पंचकोशविवेकप्रकरणम् ८१
में से निकल बाहर होना जान जाते हैं] किंवा बुद्ध से उन
[पांचों कोशों] को अनात्मा समझ लेते हैं, तब इन कोशों का
साक्षी जो बोध शेष रह जाता है, वह साक्षिरूपी बोध ही तो
'निज रूप' अथवा 'ब्रह्म' है । उस साक्षिरूपी बोध को शून्य
[अर्थात् कुछ नहीं] कह देना हँसी खेल नहीं है । यह एक
बड़ा ही दुर्घट काम है ।
अस्ति तावत् स्वयं नाम विवादाविषयत्वतः ।
स्वस्मिन्नपि विवादश्चेत् प्रतिवाद्यत्र को भवेत् ॥२३॥
स्वयं [अपना आपा] नाम की कोई चीज तो, क्या लौकिक
और क्या वैदिक सभी के मत में है ही । क्योंकि वह कभी
विवाद का विषय ही नहीं होती है । अपने आपे में कभी
किसी को विप्रतिपत्ति नहीं होती कि मैं हूँ या नहीं हूँ ? यदि
किसी को अपने आपे में भी विप्रतिपत्ति होती हो, तो बताओ
कि इस विप्रतिपत्ति का प्रतिवादी कौन होगा ?
स्वासत्त्वं तु न कस्मैचिद्रोचते विभ्रमं विना ।
अतएव श्रुतिर्बाधं ब्रूते चासत्त्ववादिनः ॥२४॥
भ्रान्ति [पागलपन] को छोड़कर और किसी भी दशा में
अपना अभाव किसी को भी अच्छा नहीं लग सकता । यही
कारण है कि अगले श्लोक में उद्धृत श्रुति असत्त्ववादी का
बाध कह रही है ।
असद्ब्रह्मेति चेद्वेद स्वयमेव भवेदसत् ।
अतोऽस्य मा भूद्बोध्यत्वं स्वसत्त्वं त्वभ्युपेयताम् ॥२५॥
यदि कोई यह समझता है कि 'ब्रह्म असत् है' तो वह
[ ब्रह्म को असत् जानने वाला ] स्वयं भी असत् ही हो जाता
८२ पंचदशी
है [ क्योंकि वह स्वयं भी तो ब्रह्मरूप ही है। उसके 'ब्रह्म नहीं
है' इसे कहने का यही अभिप्राय होता है कि मैं स्वयं ही नहीं
हूँ।] इसलिये यह वेद्य तत्व भले ही न हो परन्तु अपनी सत्ता
तो तुम्हें मान ही लेनी चाहिये [ कि तुम्हीं ब्रह्म हो ] ।
कीदृक्तर्हीति चेत्पृच्छेदीदृक्ता नास्ति तत्र हि ।
यदनीदृगतादृक् च तत् स्वरूपं विनिश्चिनु ॥२६॥
जब यह आत्मा वेद्य भी नहीं है तब फिर वह कैसा है ?
ऐसा एक प्रश्न स्वभाव से उठ सकता है। इसका उत्तर यह है
कि उस आत्म तत्व में 'ईदृक्ता' अर्थात् 'ऐसापन' तो है ही
नहीं। [ यदि उसमें 'ऐसापन, मान लेंगे तो फिर उसे वेद्य
होने से कौन रोक सकेगा ? ] जो ऐसा भी नहीं और वैसा
भी नहीं उसी को आत्मा का [अपना] स्वरूप समझ लो ।
अक्षाणां विषयस्त्वीदृक् परोक्षस्तादृगुच्यते ।
विषयी नाक्षविषय स्वत्वान्नास्य परोक्षता ॥२७॥
जिसको इन्द्रियाँ विषय करती हैं, उसे तो 'ईदृक्' कहा
जाता है। जो तो परोक्ष अर्थात् इन्द्रियों की गति से बाहर
रह जाता है, उसे 'तादृक्' कहते हैं। विषयी अर्थात् ज्ञाता या
द्रष्टा आत्मा इन्द्रियों का विषय नहीं होता [इससे वह 'ईदृक्'
अर्थात् 'ऐसा' नहीं कहाता है ] तथा स्वयं वही होने से वह
परोक्ष भी नहीं होता, [ इससे उसे 'तादृक्' अर्थात् 'वैसा'
कहते भी नहीं बनता । इसी कारण से पहले श्लोक में आत्मा
के 'ऐसा' 'वैसा' होने का निषेध किया है । ]
अवेद्योप्यपरोक्षोतः स्वप्रकाशो भवत्ययम् ।
सत्यं ज्ञानमनन्तं चेत्यस्तीह ब्रह्मलक्षणम् ॥२८॥
पंचकोशविवेकप्रकरणम् ८३
पंचकोशविवेकप्रकरणम् ८३
वह आत्मा अवेद्य होकर भी [अर्थात् इन्द्रियजन्यज्ञान का
विषय न होकर भी] अपरोक्ष रहता है इसी से वह स्वयं-
प्रकाश माना जाता है। श्रुति ने ब्रह्म का जो कि सत्य ज्ञान
तथा अनन्त लक्षण बताया है वह लक्षण इस आत्मा में
भी है। इस कारण उस स्वयंप्रकाश तत्व को ब्रह्म मान लेना
चाहिये।
सत्यत्वं बाधराहित्यं, जगद्बाधैकसाक्षिणः ।
बाधः किंसाक्षिको ब्रूहि, नत्वसाक्षिक इष्यते ॥२९॥
[सत्य और अबाध्य, मिथ्या और बाध्य ये सब पर्याय-
वाची शब्द हैं] सत्य उसी को कहते हैं जिसकी बाधा न होती
हो। [जिस के मिथ्यापन का निश्चय कभी न होता हो] इस
सकल जगत् की बाधा का जो एक मात्र साक्षी है, उस के
बाध का साक्षी कौन होगा उसे हमें बताओ ? क्योंकि विना
साक्षी का तो कोई बाध माना ही नहीं जाता।
तात्पर्य यह है कि सुषुप्ति, मूर्छा तथा समाधि के समय,
जब यह स्थूल सूक्ष्म शरीरादि नाम का जगत् नहीं रहता, उस
जगत् के न रहने को जो जानता है अथवा शास्त्रीय शब्दों में
यों कहो कि जो आत्मा इस बाध का साक्षी है, उस आत्मा
के बाध का साक्षी [उस आत्मा के न रहने को जानने वाला]
कौन होगा ? उसका तो कोई भी साक्षी नहीं हो सकता । बिना
साक्षी के ही आत्मबाध मान लेना ठीक नहीं है। अतिप्रसक्ति के
डर से साक्षिरहित बाध को कोई भी नहीं मानता है।
अपनीतेषु मूर्तेषु ह्यमूर्तं शिष्यते वियत् ।
शक्येषु बाधितेष्वन्ते शिष्यते यत्तदेव तत् ॥३०॥
८४ पञ्चदशी
मूर्त पदार्थों के हटा दिये जाने पर जैसे अमूर्त आकाश
शेष रह जाता है, इसी प्रकार वाधा करने योग्य पदार्थों की
बाधा कर देने पर पीछे से जो अबाध्य तत्व शेष रह जाता है,
वही ब्रह्म है ।
घर में रक्खे हुए घटादि मूर्त पदार्थ, जब उसमें से बाहर
निकाल दिये जाते हैं, तब जैसे हटाया न जा सकने वाला एक
आकाश ही घर में शेष रह जाता है । इसी प्रकार आत्मा से
भिन्न देहेन्द्रियादि मूर्त और अमूर्त पदार्थों के—जिनका कि
निराकरण हो सकता है—'नेति नेति' श्रुति से हटा दिये
जाने पर, पीछे से सम्पूर्ण निराकरणों [निषेधों] का साक्षी
जो भी बोध शेष रह जाता है, बाधरहित वही तत्व 'आत्मा'
कहाता है ।
सर्वबाधे न किञ्चिच्चेद्यन्न किंचित्तदेव तत् ।
भाषा एवात्र भिद्यन्ते निर्बाधं तावदस्ति हि ॥३१॥
'तुम्हारी कही विधि से सब की बाधा कर देने पर तो,
कुछ भी नहीं रहता है' ऐसा यदि कोई कहने लगे, तो उस से
कहो कि जो 'कुछ भी नहीं है' उसी को ब्रह्म जान लो । 'न
किंचित्' इस शब्द से जिस चैतन्य का उल्लेख किया जाता है
उसी को ब्रह्म मान लेना चाहिये ।
तात्पर्य यह है कि जो मनुष्य यह कहता है कि 'कुछ भी
शेष नहीं रहता' उस को सकलाभाव विषय का [सब कुछ
न होने का] ज्ञान तो अवश्य ही मानना होगा । बस तब हम
कहेंगे कि यह ज्ञान ही हमारे आत्मा का स्वरूप है । अरे भाई,
इस बाधसाक्षी प्रत्यगात्मा के विषय में 'न किंचित्' आदि
पञ्चकोशविवेकप्रकरणम् ८५
पञ्चकोशविवेकप्रकरणम् ८५
भाषा ही भिन्न भिन्न हो गई हैं। बाधरहित साक्षिचैतन्य तो
एक ही है। यह और बात है कि उस चैतन्य का वर्णन हम
भले ही 'न किंचित्' इस अभाववाचक शब्द से कर डालें।
बाध का साक्षी तो हमें प्रत्येक अवस्था में मानना ही पड़ेगा।
उस के वाचक शब्दों में झगड़ा हो सकता है। वाच्य आत्मतत्व
में तो किसी प्रकार की भी विप्रतिपत्ति नहीं हो सकती।
अत एव श्रुतिर्बाध्यं बाधित्वा शेषयत्यदः ।
स एष नेति नेत्यात्मेत्यतद्व्यावृत्तिरूपतः ॥३२॥
क्योंकि यह साक्षिचैतन्य एक अबाध्य वस्तु है इसलिये
'स एष नेति नेत्यात्मा' (बृ० ३-९-२६) इस श्रुति ने, अनात्म
पदार्थों का निषेध करते करते, निषेध करने योग्य सब अनात्म
पदार्थों की बाधा करके, निराकरण के अयोग्य, इस प्रत्यक्
स्वरूप को शेष रख लिया है।
इदं रूपं तु यद्यावत् त्यक्तुं शक्यतेऽखिलम् ।
अशक्यो ह्यनिदंरूपः स आत्मा बाधवर्जितः ॥३३॥
जो 'इदं' है [जो दृश्य रूप से हमारे अनुभव में आता
है] वह जितना भी [देहेन्द्रियादि सम्पूर्ण दृश्य जगत्] है वह
तो सब का सब ही त्याग किया जा सकता है। परन्तु प्रत्यग्रूप
होने से जिस को 'इदं' नहीं कह सकते, उस साक्षी आत्मा
का त्याग तो हो ही नहीं सकता [क्योंकि वह तो त्याग करने
वाले का अपना स्वरूप ही है, फिर उस का त्याग कैसे किया
जा सकता है ?] निष्कर्ष यही निकलता है कि वह बाधरहित
[सत्य] साक्षी ही आत्मा है [अहंकारादि दृश्य पदार्थ आत्मा
नहीं हैं]।
८६ पंचदशी
सिद्धं ब्रह्मणि सत्यत्वं, ज्ञानत्वं तु पुरेरितम् ।
स्वयमेवानुभूतित्वादित्यादिवचनै स्फुटम् ॥३४॥
ब्रह्म के लक्षण में जिस सत्यता का वर्णन आया है वही
सत्यता आत्मा में भी है यह यहां तक सिद्ध हो गया । इसी
प्रकरण के 'स्वयमेवानुभूतित्वाद्विद्यते नानुभाव्यता' इत्यादि तेरहवें
श्लोक में आत्मा की ज्ञानरूपता भी पहले भले प्रकार कही जा
चुकी है ।
न व्यापित्वाद्देशतोऽन्तो नित्यत्वान्नापि कालतः ।
न वस्तुतोऽपि सर्वात्म्या दानन्त्यं ब्रह्मणि त्रिधा ॥३५॥
व्यापक होने से देशकृत अन्त नहीं, नित्य होने से काल-
कृत अन्त नहीं, सर्वात्मा होने से वस्तुकृत अन्त नहीं, यों
ब्रह्म में तीन प्रकार की अनन्तता होती है ।
'नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मम्' (मुण्ड० १-१-६) 'आकाशवत्
सर्वगतश्च नित्यः' 'नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्' (कठ०
२-४-१३) 'इदं सर्वं यदयमात्मा' (बृ० २-४-६) 'सर्वं ह्येतद् ब्रह्म'
(माण्डू० २) 'ब्रह्मैवेदं सर्वम्' इत्यादि श्रुतियों में ब्रह्म की
व्यापकता नित्यता और सर्वात्मकता का उल्लेख किया गया है ।
इस से ब्रह्म में तीन प्रकार की अनन्तता माननी चाहिये कि
यह ब्रह्म देश, काल और वस्तु के परिच्छेद से रहित है ।
व्यापक होने के कारण उस का देशकृत अन्त कहीं नहीं
होता---'कि यहां वा यहां ब्रह्म नहीं है' । नित्य होने के कारण
उस का कालकृत अन्त कभी नहीं होता कि—'तब ब्रह्म नहीं
था, अब ब्रह्म नहीं है, तब ब्रह्म नहीं रहेगा इत्यादि' । सब
का आत्मा होने के कारण उस का वस्तुकृत अन्त भी नहीं
पंचकोशविवेकप्रकरणम् ८७
पंचकोशविवेकप्रकरणम् ८७
होता। जैसे यह कहा जाता है कि घट पट नहीं है तो यह
घट का वस्तुकृत अन्त हो गया। ऐसे ब्रह्म को यह नहीं कह
सकते कि ब्रह्म घट नहीं है ब्रह्म पट नहीं है। वह तो सर्वात्मा
होने से घट भी है और पट भी है। यों ब्रह्म में तीन प्रकार
की अनन्तता रहती है।
देशकालान्यवस्तूनां कल्पितत्वाच्च मायया।
न देशादिकृतोऽन्तोस्ति ब्रह्मानन्त्यं स्फुटं ततः ॥३६॥
देश काल तथा अन्य वस्तुओं की कल्पना माया ही ने तो
कर डाली है। इससे ब्रह्म में उन [ देश कालादि ] का किया
हुआ अन्त नहीं हो सकता। यों ब्रह्म की अनन्तता समझ में
आ सकती है।
परिच्छेद कर डालने वाले देश, काल तथा अन्य पदार्थ
सब माया ही ने तो कल्पित कर लिये हैं। सो जैसे गन्धर्व
नगर से आकाश में जब देशादिकृत अन्त प्रतीत होने लगता
है; वह अन्त जैसे पारमार्थिक नहीं होता, इसी प्रकार माया
के बनाये देशादि का किया हुआ परिच्छेद [ खण्ड ] ब्रह्म में
नहीं होता। इससे ब्रह्म की अनन्तता सब को स्पष्ट हो जाती
है। उस ब्रह्म तथा आत्मा को 'अयमात्मा ब्रह्म' [बृ० २-५-१९]
इत्यादि श्रुतियें एक बता रही हैं, इस कारण आत्मा की अनन्तता
तो स्वतः ही सिद्ध हो जाती है।
सत्यं ज्ञानमनन्तं यद् ब्रह्म तद्वस्तु, तस्य तत्।
ईश्वरत्वं च जीवत्व मुपाधिद्वयकल्पितम् ॥३७॥
जो ब्रह्म नाम की वस्तु सत्य, ज्ञान तथा अनन्त है, वही
एक पारमार्थिक वस्तु इस संसार में है। उस ब्रह्म को जब
८८ पञ्चदशी
'ईश्वर' वा 'जीव' कहा जाता है, वह आगे कही दो उपाधियों
से कल्पित किया हुआ होता है [ कल्पित होने से ही ये जीवे-
श्वर भी उस ब्रह्म के परिच्छेदक नहीं बन सकते हैं ]
शक्तिरस्त्यैश्वरी काचित् सर्ववस्तुनियामिका ।
आनन्दमयमारभ्य गूढा सर्वेषु वस्तुषु ॥३८॥
ऐश्वरी अर्थात् ईश्वर से सम्बन्ध रखने वाली [ ईश्वर की
उपाधि बनी हुई] कोई एक ऐसी शक्ति है [जिसका सत् या असत्
किसी भी रूप से निर्वचन नहीं हो सकता] जो [पृथिवी आदि]
सम्पूर्ण नियम्य वस्तुओं को नियम में रख रही है। वह शक्ति
आनन्दमय से लेकर [ब्रह्माण्ड पर्यन्त] सभी वस्तुओं में गूढ भाव
से छिपी बैठी है [यही कारण है कि वह दीख नहीं पड़ रही है]।
वस्तुधर्मा नियम्येरन् शक्त्या नैव यदा तदा ।
अन्योऽन्यधर्मसांकर्याद् विप्लवेत जगत् खलु ॥३९॥
यदि यह शक्ति, पृथिवी आदि वस्तुओं के [काठिन्य द्रवत्व
आदि ] धर्मों को नियम में न रखती होती तो अन्योऽन्य धर्म
की संकरता किंवा मिश्रण हो जाने से [ किसी एक जगह
नियत भाव से न रहने से ] जगत् में विप्लव मच जाता ।
चिच्छायावेशतः शक्तिश्चेतनेव विभाति सा।
तच्छक्त्युपाधिसंयोगाद् ब्रह्मैवेश्वरतां व्रजेत् ॥४०॥
चिच्छायावेश [ किंवा चिदाभासके प्रवेश ] से यह शक्ति
चेतन सी प्रतीत हुआ करती है [ इसी से वह नियामक हो
सकती है ] उस शक्ति रूपी उपाधि के सम्बन्ध से [ सत्यादि
रूप ] ब्रह्म ही ईश्वरभाव को प्राप्त हो जाता है [किंवा सर्वज्ञत्व
आदि धर्मों से युक्त हो जाता है ]।
पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ८९
पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ८९
कोशोपाधिविवक्षायां याति ब्रह्मैव जीवताम् ।
पिता पितामहश्चैकः पुत्रपौत्रौ यथा प्रति ॥४१॥
कोश रूपी उपाधि की पर्यालोचना जब की जाती है, तब
सत्यादिलक्षण 'ब्रह्म' ही 'जीव' बन जाता है । जैसे कि एक
ही देवदत्त एक ही समय पुत्र के प्रति तो पिता तथा पौत्र के
प्रति पितामह हो जाता है [ इसी प्रकार ब्रह्म भी कोशरूपी
उपाधि की विवक्षा में तो 'जीव' होजाता है तथा उसी समय
शक्तिरूपी उपाधि की विवक्षा में 'ईश्वर' बन जाता है ] ।
पुत्रादेरविवक्षायां न पिता न पितामहः ।
तद्वन्नेशो नापि जीवः शक्तिकोशाविवक्षणे ॥४२॥
पुत्रादि की जब विवक्षा नहीं रहती, तब न तो यह देवदत्त
पिता ही होता है और न पितामह ही कहाता है । ठीक इसी
प्रकार जब शक्ति और कोश की विवक्षा किसी चतुर साधक
को नहीं रह जाती [ जब वह इन उपाधियों की ओर को दृष्टि
ही नहीं डालता ] तब वह ब्रह्म, 'ईश्वर' या 'जीव' कुछ भी
नहीं रहता ।
य एवं ब्रह्म वेदैष ब्रह्मैव भवति स्वयम् ।
ब्रह्मणो नास्ति जन्मातः पुनरेष न जायते ॥४३॥
जो ब्रह्म को इस तरह जान लेता है वह स्वयं ब्रह्म ही
हो जाता है । ब्रह्म का जन्म नहीं होता इससे फिर वह भी
उत्पन्न नहीं होता । चारों साधनों से युक्त जो कोई महा-
पुरुष इस प्रकार पांचों कोशों का विवेक करलेने के पश्चात्
सत्यादिस्वरूप ब्रह्म का साक्षात्कार कर लेता है, वह स्वयं ब्रह्म
ही हो जाता है । 'स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति'(मु० ३-
६