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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

ब्रह्मानन्दान्तर्गत अद्वैतानन्द १२१
मिट्टी के बने किसी भी पदार्थ को देखता है तब सभी को जान
लेता है कि यह भी मिट्टी का बना है और यह भी मिट्टी का ।
इसी प्रकार ब्रह्मनाम के सर्वानुगत एक-तत्व का परिज्ञान जब किसी
को हो जाता है, तब उसी से बने हुए इस सकल जगत् का ज्ञान
भी उसे हो ही जाता है । ब्रह्म सच्चिदानन्द स्वरूप है और यह
जगत् नामरूपात्मक है । यहं जगत् पहले अव्याकृत था, इसे व्यक्त
करते समय इसका कुछ 'नाम' और कुछ 'आकार' बना दिया गया
है। अव्याकृत से हमारा अभिप्राय ब्रह्म में रहने वाली इस अचिन्त्य-
शक्ति माया से ही है। अविक्रिय ब्रह्म में रहने वाली वह माया ही
अनेक रूप हो जाती है—सबसे पहले उसका आकाश बनता है,
वह भी 'अस्ति' 'भाति' और 'प्रिय' अर्थात् 'सत्' 'चित्' और
'आनन्द' स्वरूप ही होता है। उसका अपना खास रूप तो 'अव-
काश' ही है। वही बिचारा मिथ्या है, वे तीनों [ सच्चिदानन्द ]
मिथ्या नहीं हैं। इस अवकाश पर जरा विचार का प्रयोग करके
देखिये—यह अवकाश व्यक्त होने से पहले नहीं था, नष्ट हो जाने
के बाद भी यह अवकाश नहीं रहेगा। यह तो बीच में कुछ काल
के लिये पानी के बुलबुले की तरह व्यक्त हो गया है। आदि और
अन्त में न होने के कारण यह तो वर्तमान में भी नहीं है। परन्तु
यह बात बुद्धियोग से ही जानी जा सकती है। ऊपर जिन सच्चिदा-
नन्दों का वर्णन किया है वे घड़े आदि में मिट्टी की तरह सदा सब
कार्यों में ही अनुगत रहते हैं। बताओ, जब तुम अवकाश को भूल
जाते हो तब तुम्हें क्या भासा करता है। उस समय तुम्हें जो तत्व
भासता है, उस तत्व को कुछ न कुछ तो कहना ही होगा। ऐसे
समय उदासीनावस्था होने के कारण उस तत्व को 'सुख' ही कहना
चाहिये। जो अनुकूल भी प्रतीत न हो और प्रतिकूल भी न लगे

१२२ पञ्चदशी
वही तो निजसुख होता है। जब कोई अनुकूल पदार्थ दीखता है
तब हर्ष होता है, प्रतिकूल जान पड़े तब दुःख हो जाता है, जब
तो अनुकूल भी न हो और प्रतिकूल भी न हो तब तो 'निजानन्द'
का भान शुरू हो जाता है। यह निजानन्द एक स्थिर चीज है।
हर्ष और शोक तो क्षण क्षण में बदलने वाले पदार्थ हैं। इन दोनों
हर्ष शोकों को तो मानस ही मान लेना ठीक है। क्योंकि मन भी
क्षणिक है। उसके परिवर्तन से ही हर्ष और शोक होते हैं। इतने
विवेचन से आकाश में आनन्द होने की बात मन में बैठ गयी
होगी। सत्ता और भान को तो सभी मानते हैं, इस कारण उसका
वर्णन हम नहीं करेंगे। वायु से लेकर देहपर्यन्त पदार्थों में भी
यह बात समझ लेना। गति और स्पर्श वायु के,दाह और प्रकाश
अग्नि के, द्रवता जल का, और कठिनता भूमि का अपना निजी
आकार है। इन सब के नाम तो अवश्य अनेक या विभिन्न हो रहे
हैं, परन्तु इनमें सच्चिदानन्द तो एक रूप से ही रहते हैं। इनमें
जो अलग अलग नाम और रूप [आकार] हैं वे निस्तत्त्व हैं। क्यों-
कि इनके जन्म और नाश बराबर होते रहते हैं। अपने संस्कारी
मन की सहायता से इन नामरूपों को समुद्र के बुलबुले की तरह
समझा करो। ज्यों ही कोई अधिकारी इस सर्वत्र परिपूर्ण सच्चिदा-
नन्द ब्रह्म को [ चाम की आँखों से नहीं अपितु ] बुद्धियोग से
देख लेगा तब वह धीरे धीरे इन नामरूपों की अवहेलना स्वयमेव
करने लगेगा। ज्यों ज्यों यह अवहेलना बढ़ने लगेगी त्यों त्यों ब्रह्म
के दर्शन होने लगेंगे। और ज्यों ज्यों ब्रह्म के दर्शन होंगे त्यों त्यों
नामरूप छूटने लगेंगे। इस ब्रह्माभ्यास [द्वैतावहेलना और ब्रह्म-
दर्शन] से जब अधिकारी की 'विद्या' स्थिर हो जायगी तब वह इस
जीवन के रहते ही मुक्त हो जायगा। फिर उसका शरीर प्रारब्धा-

ब्रह्मानन्दान्तर्गत अद्वैतानन्द का संक्षेप १२३
नुकूल कैसे भी रहा करो उसकी जीवन्मुक्ति को कोई रोक नहीं
सकेगा। उसी का चिंतन, उसी का कथन, उसी की बातचीत और
उसी में तत्पर हो जाना 'ब्रह्माभ्यास' कहा जाता है। ऐसा ब्रह्मा-
भ्यास जब दीर्घकाल तक निरन्तर तथा श्रद्धापूर्वक किया जायगा
तब अनादिकाल से हृदय में घुसी हुई वासनायें नष्ट हो जायँगी ।
मिट्टी की शक्ति घट शराव आदि अनेक मिथ्या पदार्थों को बना
देती है,इसी प्रकार ब्रह्मशक्ति भी अनेक अनृत पदार्थों को बना डालती
है। अथवा इसे यों समझना चाहिये कि जीव की निद्राशक्ति अनेक
दुर्घट सुपनों को घड़ डालती है, इसी प्रकार ब्रह्म की मायाशक्ति सृष्टि
आदि अनेक कार्यों का सर्जन कर लेती है। निद्रा से तो यहां तक हो
जाता है कि—कभीआकाश में उड़ान मारना दीखता है,कभी अपना
सिर कटने की बात दीखती है,कभी क्षणमात्र में सैकड़ों वर्ष बीत जाते
हैं,कभी मरे हुए पुत्रादि देखने मिल जाते हैं। उस सुपने में 'यह ठीक
है और यह ठीक नहीं' यह व्यवस्था नहीं की जा सकती। वहां तो जो
जैसा दीखे, वह वैसा ही ठीक होता है। ध्यान देने की बात है कि—
जब जीव की निद्राशक्ति की ऐसी अद्भुत महिमा है कि वह अपने में
तर्क शास्त्र को चलने नहीं देती है, तब फिर ब्रह्म की मायाशक्ति
की महिमा अचिन्त्य हो तो इसमें अचम्भा क्यों करते हो ? पुरुष
सोया पड़ा होता है उधर निद्राशक्ति अपना काम जारी रखती है—
वह अनेक प्रकार के सुपनों को बना बना कर तैयार करती रहती
है उससे पूछती तक नहीं कि क्या मैं यह सब कर डालूँ ? ठीक
इसी प्रकार ब्रह्मदेव निर्विकार भाव से विराज रहे हैं, यह श्रीमती
माया शक्ति अनेक आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, ब्रह्माण्डलोक,
प्राणी और पर्वत समुद्र आदि को घड़ घड़ कर खड़ा करती जाती
है। यों तो ये सभी विकार मायाशक्ति ने उत्पन्न किये हैं,परन्तु प्राणियों

१२४ पञ्चदशी
में इतनी विशेषता होती है कि उनमें चैतन्य की छाया प्रतिबिम्बित
हो गयी है और वे चेतन हो गये हैं, जिन में चैतन्य का प्रतिबिम्ब
नहीं पड़ संका वे जड रह गये हैं । क्या चेतन और क्या अचेतन
सभी में ब्रह्म का सच्चिदानन्द रूप समान ही होता है । भेद केवल
इतनाही होता है कि उनके नाम और रूप (शकल) अलग अलग हो
गये हैं। ये नाम रूप ब्रह्म में ऐसे हैं जैसे कपड़े पर कोई चित्र बना
दिया गया हो। जब कोई उन नामरूपों की अपेक्षा कर सके तभी
उसे सच्चिदानन्द रूप ब्रह्म तत्व के दर्शन हों। पानी में अपना देह
अधोमुख दीख रहा हो तो उस देह को छोड़ कर अपने तीरस्थ देह
में ही ममता होती है, इसी प्रकार जगत् के दीखने वाले नामरूपों
का परित्याग कर देने पर सच्चिदानन्द में ही ज्ञानी की ममतां हो
जाती है। मनोराज्य हज़ारों होते रहते हैं तो भी जैसे उनकी सदा ही
उपेक्षा करदी जाती है इसी प्रकार विवेकी लोग हज़ारों प्रकार से दीख
पड़ने वाले नामरूपों की उपेक्षा करते रहते हैं । मनोराज्य जिस
प्रकार क्षण क्षण में बदलता जाता है, इसी प्रकार वह बाह्य व्यवहार
भी क्षण क्षण में बदलता है और जो बीत जाता है वह लौटकर कभी
भी नहीं आता। देखते हैं कि जवानी में बचपन ढूंढे भी हाथ नहीं
लगता, बुढ़ापे में जवानी की भी यही गति हो जाती है। मरा हुआ
पिता फिर देखने को नहीं मिलता । बीता हुआ दिन लौटकर नहीं
आता । जो लौकिक पदार्थ क्षणध्वंसी है उन में और मनोराज्य में
फ़र्क क्या है वही तो हमारी समझ में नहीं आता । इस लिये, हम तो
यही कहेंगे कि लौकिक पदार्थ भले ही भासा करें.उनके सत्य होने
का वृथा विचार सर्वथा छोड़ दो। जब लौकिक पदार्थों की उपेक्षा
कर दीजायगी तब ब्रह्मचिन्तन का कांटा जाता रहेगा । फिर तो वह
बुद्धि ब्रह्मचिन्तन में ही जुट जायगी। इस पर प्रश्न हो सकता है कि

ब्रह्मानन्दान्तर्गत अद्वैतानन्द का संक्षेप १२५
फिर ज्ञानी लोग व्यवहार कैसे करें ? इसका उत्तर यह है कि नाटक
करने वाले नट लोग जैसे बनावटी आस्था से अपना काम कर गुज़-
रते हैं, इसी प्रकार ज्ञानी लोग भी लौकिक कामों को बनावटी आस्था
से निभा लेजाते हैं । ऊपर पानी बहता रहता है परन्तु नीचे बैठी
हुई बड़ी शिला जैसे शान्त भाव से पड़ी रहती है इसी प्रकार नाम-
रूपी रूपी जल ऊपर बहता भी रहो परन्तु कूटस्थ ब्रह्मरूपी शिला
ज्यों की त्यों बनी रहती है । ज्ञानी लोग संसार के साथ वह नहीं
जाते । दर्पण के अन्दर कोई छेद नहीं होता, जिसमें कोई वस्तु
छिप रही हो परन्तु ऐसा मालूम हुआ करता है मानो दर्पण में अन-
गिनत वस्तु से परिपूर्ण बड़ा लम्बा चौड़ा आकाश ही हो । ठीक
इसी प्रकार नाना जगत् से परिपूर्ण यह आकाश उस सच्चिद्धन
अखण्ड ब्रह्मरूपी दर्पण में प्रतीत हो रहा है । पहले दर्पण दीख लेता
है तब उसके अन्दरकी वस्तु देखी जा सकती है । इसी प्रकार पहले
सच्चिदानन्द वस्तु दीख चुकती है उसके बाद नामरूपात्मक जगत्
का भास होता है । अब होशियार साधकों को चाहिये कि ज्यों ही
उन्हें सच्चिदानन्द वस्तु का भान हो चुके त्यों ही अपनी बुद्धि को
रोक कर खड़े होजांय और वार वार उसी का भान होते रहने दें ।
यदि उनकी मति आगे नामरूप की तरफ को चलने का प्रयत्न करती
हो तो उसे वैसा न करने दें । जानते हो ये साधक अब कहां पहुंच
चुके हैं ? इन्होंने कितना रास्ता तै कर लिया है ? सुनो ! ये लोग
चलते चलते जगत् से हीन सच्चिदानन्द स्वरूप ब्रह्मधाम में खड़े
हुए हैं । इसी को तो 'अद्वैतानन्द' कहा जाता है । मुमुक्षु लोग इस
'अद्वैतानन्द' में चिरकाल तक विश्राम करें यही हमारी अभिलाषा है।
जगत् के मिथ्या भाव का चिन्तन करने से जो आनन्द जाग
उठता है वही 'अद्वैतानन्द' होता है ।

14. Vidyananda

[ १४ ]
ब्रह्मानन्दान्तर्गत विद्यानन्द का संक्षेप
योग से, आत्मा के विवेक से, अथवा द्वैत के मिथ्यापन की
चिन्ता करने से, जब किसी को ब्रह्मानन्द दीखने लगा हो, तब
उस समय के 'ज्ञानानन्द' का वर्णन इस प्रकरण में है। जिस
प्रकार विषयानन्द एक प्रकार की बुद्धिवृत्ति है इसी प्रकार यह
विद्यानन्द [ज्ञानानन्द] भी एक प्रकार की बुद्धिवृत्ति ही है। यह
चार प्रकार का होता है, प्रथम दुःखाभाव, फिर कामाप्ति। फिर
कृत-कृत्यता और उसके पश्चात् प्राप्तप्राप्यता। दुःख दो तरह का
होता है—एक इस लोक का दूसरा परलोक का। बृहदारण्यक
में कहा है कि ज्ञानानन्दी को ऐहिक दुःख नहीं रहते। ऐहिक
दुख तो कामना ही है। परन्तु जब किसी को आत्मज्ञान हो जाय
तब फिर वह किस चीज की चाहना से और किसके लिये शरीर
के दुःखों से दुःखी होता फिरे ! पहले प्रकरणों में बता आये हैं
कि जीवात्मा और परमात्मा ये दो भेद आत्मा के हैं। यह आत्मा
तीनों देहों के साथ जब तादात्म्य कर बैठता है तब यह जीव बन
जाता है और तब ही इसमें 'भोक्तापन' आ जाता है। उधर
परात्मा का भी हाल सुन लीजिये—वह सच्चिदानन्द होकर भी
जब नामरूप के साथ तादात्म्य करने की खिलवाड़ कर बैठता है
तब 'भोग्य' हो जाता है। अब यदि 'भोक्ता' और 'भोग्यपन' के
बखेड़े को हटाना चाहो तो उन तीनों शरीरों और उन नामरूपों
से उस आत्मतत्व का विवेक कर डालो। भोक्ता और भोग्यपन को
हटाकर शुद्ध के दर्शन करलो। यही तो होता है कि 'भोक्ता' के

ब्रह्मानन्दन्तर्गतं विद्यानन्द का संक्षेप · १२७ ·
लिये किसी 'भोग्य' पदार्थ को चाहता है तो [ शरीर के साथ ]
दुःखी होने लगता है। क्योंकि ये तीनों शरीर तो ज्वरों [संतापों]
के निवासमन्दिर ही हैं। आत्मतत्व को कभी कोई ज्वर नहीं
होता। देखलो—वात, पित्त,कफ नामक धातुओं में जब विषमता
आ जाती है तब इस स्थूल शरीर में रोग उत्पन्न हो जाते हैं।
काम क्रोधादि विकार जब उदय हो जाते हैं तब ये ही सूक्ष्म शरीर
में रहने वाले ज्वर कहे जाते हैं। परन्तु इन दोनों प्रकार के ज्वरों
की जड़ तो कारण शरीर [अज्ञान] में ही रहती है। पिछले अद्वै-
तानन्द प्रकरण में कही रीति के अनुसार जब परात्मतत्व को पह-
चान लिया जायगा, तब ज्ञानी को सच्चा 'भोग्य' दीखेगा ही नहीं।
फिर बताओ वह परात्मतत्व को जानने वाला ज्ञानी कौन से 'भोग्य'
को चाह सकेगा ? आत्मानन्द प्रकरण में कही रीति से जीवात्मा के
असंग कूटस्थ स्वरूप का निश्चय, जब हो जायगा तब 'भोक्ता' ही
कोई न रहेगा । अब आप सावधान होकर विचार कीजिये कि
'भोग्य' और 'भोक्ता' दोनों ही विवेक की आंच के सामने मोम के
पुतले की तरह पिघल गये हैं। शेष बचे हुए इस बिचारे जड देह
को तो कोई ज्वर होना ही क्यों है।
यहां तक ऐहिक दुःखों का विचार किया गया। अब आमु-
ष्मिक दुःखों की पड़ताल भी कर लीजिये—पाप और पुण्यों की
चिन्ता ही आमुष्मिक [पारलौकिक] दुःख होता है। पहले अध्याय
में कह ही चुके हैं कि—ज्ञानी को पुण्य पाप की चिन्ता नहीं सताती
जैसे कमल के पत्ते पर पानी नहीं चिपटता इसी प्रकार ज्ञान हो
जाने के कारण, ज्ञानी में आगामी कर्मों का सम्बन्ध नहीं हो पाता।
सरकण्डे की रूई जिस प्रकार क्षण भर में जल जाती है इसी प्रकार
ज्ञानी के संचित कर्म ज्ञानाग्नि से सहसा जल जाते हैं। गीता में भी

१२८ पञ्चदशी
कहा है कि—हे अर्जुन जिस प्रकार प्रदीप्त अग्नि ईंधन को जला
देती है इस प्रकार [विधि पूर्वक सुलगाई हुई] यह ज्ञानाग्नि सब कर्मों
को राख कर देती है। जिस ज्ञानी को अहंकारयुक्त भाव नहीं रहता,
जिस ज्ञानी की बुद्धि संसार में लिप्त नहीं रहती, वह यदि इन सब
लोकों को भी मार दे तौ भी उसे मारने वाला मत समझो । इतने
गुरुतर अपराध से भी वह किसी बन्धन में नहीं आयेगा । इतने से
ज्ञानी को आमुष्मिक दुःख या परलोक की चिन्ता नहीं रहती वह
आप समझ गये होंगे ।
अब क्रमानुसार सर्वकामाप्ति का विचार करेंगे—जैसे ज्ञानी को
दुःखाभाव हो जाता है इसी प्रकार उसे सर्वकामाप्ति भी हो ही जाती
है । ऐतरेय श्रुति ने प्रायः इन्हीं शब्दों में कहा है कि—यह ज्ञानी
सब कामों को पाकर अमर हो चुका है। छान्दोग्य में कहा है कि—
खाता, खेलता, स्त्रियों से रमण करता, सवारियों पर बैठता तथा भोगों
को भोगता हुआ भी ज्ञानी शरीर को भूला रहता है । वह आत्म-
सागर में इतना रमा रहता है कि फल वाले पेड़ों को जैसे फल देने
का या नदी को बहने का ज्ञान नहीं होता इसी प्रकार उसे शरीर
की चेष्टाओं तक का भी ज्ञान नहीं रह जाता । उस समय उसका
प्राण ही उसके प्रारब्ध कर्मों के अनुसार उस शरीर को जीवित
रखता है। तैत्तिरीय में कहा है कि—ज्ञानी लोग संसार की सम्पूर्ण
कामनाओं को एक ही साथ पा लेते हैं। दूसरे अज्ञानियों की तरह
इसे कर्मों से जन्म लेना नहीं पड़ता। अज्ञानी लोग जैसे क्रमानुसार
भोगों को भोगा करते हैं, ज्ञानी को उस तरह भोग नहीं मिलते,
वह तो संसार के सब भोगों को एक साथ, बिना ही किसी क्रम
के, भोगा करता है। पूर्ण युवा हो, रूपवान् हो, विद्यावान् हो,
नीरोग हो, दृढ़चित्त हो, बड़ी सेनावाला हो, धन्यधान्य पूर्ण पृथिवी

ब्रह्मानन्दान्तर्गत विद्यानन्द का संक्षेप १२९
पर शासन कर रहा हो, मनुष्यों को मिल सकने वाले सभी भोग
प्राप्त हों, ऐसे तृप्त राजा को जो आनन्द मिलता है, उस आनन्द
को एक ब्रह्मज्ञानी, ब्रह्मज्ञानी होने के नाते से ही पा लेता है।
मर्त्य लोगों के भोगों की इच्छा इन दोनों को ही नहीं है, इस कारण
दोनों को ही तृप्ति एकसी रहती है। हां, इतना भेद भी है कि राजा
तो भोगों को पाकर निष्काम हो सका है। परन्तु दूसरे की निष्कामता
तो अद्भुत ही ढंग की है। वह तो अपने विवेक के प्रताप से निष्काम
हो गया है। क्योंकि वह श्रोत्रिय है, इस कारण वेद शास्त्रों में जो
भोगों के दोष लिखे हैं उनका उसे पूरा पूरा ध्यान रहता है। देह
के दोष, चित्त के दोष, तथा भोग्य पदार्थों के दोष, उसे सदा
याद रहते हैं। कुत्ते ने जिस खीर को वमन कर दिया हो उसको
जैसे कोई खाना नहीं चाहता, इसी प्रकार विवेकी पुरुष दुष्ट भोगों
की कामना नहीं करता। यद्यपि श्रोत्रिय और राजा दोनों ही समान
भाव से निष्काम हो गये हैं, परन्तु राजा उन साधनों का संचय
करने में काफी तकलीफ़ उठा चुका है और अब भोगों के भावी
नाश को याद करके भी डर रहा है। श्रोत्रिय को ऐसा कोई कष्ट
उठाना नहीं पड़ता। यही कारण है कि श्रोत्रिय का आनन्द उस
के आनन्द से अधिक है। एक यह भी बात है कि विवेकी को
अब किसी ऊँचे पद की अभिलाषा नहीं रही है। राजा को तो
यह भी आशा लगी हुई है कि यदि कोई इससे ऊँचा पद [गन्धर्व
आदि का] हो तो वह भी मुझे मिल जाय तो अच्छा हो। सार्वभौम
राजा से लेकर ब्रह्मा पर्यन्त सभी उत्तरोत्तर पद की कामना किया
करते हैं। परन्तु यह जो आत्मानन्द है यह मन वाणी से अगम्य
है ! यही कारण है कि वह इन सबसे ऊँचा है। ये सब पदवी-
धारी लोग जिस किसी सुख को चाहते या चाह सकते हैं, श्रोत्रिय

१३० पञ्चदशी

[ज्ञानी] को उन किसी भी सुखों की इच्छा तक नहीं होती—वह
उन सब सुखों की ओर से पहले ही निःस्पृह हो गया होता है।
सो उन सबको अलग अलग जितना सुख होता है उतना अकेले
श्रोत्रिय को हो जाता है। वे सब उन उन कामनाओं को पूरा करके
भी तो जब कुछ काल के लिये अपने आपको निःस्पृह कर लेते हैं
तभी वे आनन्दी हो सकते हैं। उनकी यह निःस्पृहता उन उन काम-
नाओं के अधीन होती है। उन उन कामनाओं के पूरा किये विना
उन्हें आनन्द मिल ही नहीं सकता। इसके विपरीत विवेकी को तो
कुछ कामना ही नहीं होती। वह तो सदा ही निःस्पृह बना रहता
है। यों वह सदा ही आनन्द को लूटा करता है। इसी कारण विवेकी
का दर्जा सबसे ऊँचा है। मनु ने भी कहा है कि जो तो इन सब
कामों को प्राप्त करले और जो केवल इन्हें छोड़ ही भर दे, सब कामों
के पाने से सबका परित्याग करने में बहुत बड़ा महत्व है। बस यही
ज्ञानी की 'सर्वकामाप्ति' है।
ज्ञानी की सर्वकामाप्ति की एक यह भी रीति है—कि जैसे वह
अपने देह में आनन्दाकार बुद्धि का साक्षी होता है, इसी प्रकार
सम्पूर्ण प्राणियों के देहों में जो जो भोग भोगे जा रहे हैं और उनसे
उनको जो जो आनन्द आ रहे हैं, उन सबका साक्षी बनना उसे आ
जाता है। अथवा यों कहो कि उन सब भोगों का साक्षी बनकर उन
सब भोगों को अकेला ही भोगने लगता है। इस रीति से भी ज्ञानी को
'सर्वकामाप्ति' हो जाती है।
वैसे तो अज्ञानी भी सबका साक्षी होता है परन्तु इस निगूढ
तत्व का ज्ञान न होने से उसे वैसी तृप्ति नहीं हो पाती। श्रुति ने तो
यह बात स्पष्ट ही कही है कि—जो इस महातत्त्व को पहचान जाता
है वही सब कामों को भोग सकता है। इस तत्व को न जानने वालों

[Page-header: ब्रह्मानन्दान्तर्गत विद्यानन्द का संक्षेप १३१]

को इस महालाभ से वंचित ही रहना पड़ता है। वह तो इस एक
ही क्षुद्र शरीर के द्वारा छनकर आने वाले आनन्दकण को चाट चाट
कर उपवासी से रहकर आशा ही आशा में दिन काटा करते हैं।
ज्ञानी की 'सर्वकामाप्ति' का तीसरा प्रकार यह भी है कि जब
उसे अपनी सर्वात्मकता का दिव्य अनुभव हो जाता है तब फिर
उसके हृदय-मन्दिर में सदा एक ही गूँज रहने लगती है कि मैं ही
अन्न हूँ मैं ही अन्न हूँ मैं ही अन्न हूँ और मैं ही अन्नाद हूँ और मैं ही
अन्नाद हूँ और मैं ही अन्नाद हूँ।
अब ज्ञानी की कृतकृत्यता और प्राप्तप्राप्यता की बात भी सुन
लीजिये—जब तक यह अज्ञानी था तब तक इसे परलोक और इस
लोक के लिये या मुक्ति पाने के लिये बहुत कुछ करना था। परन्तु
अब आत्मज्ञान हो जाने पर तो इसने वह सब कुछ कर डाला।
क्योंकि अब उसे कुछ करने की आवश्यकता ही प्रतीत नहीं होती
अब तो वह कृतकृत्यता में रुकावट डालने वाली पहली अवस्था को
याद करके यों तृप्त हुआ करता है कि—दुःखी अज्ञानी लोग पुत्रादि
की दुरभिलाषा में फँसकर संसाररूपी झाड़ में उलझे पड़े रहें, मैं
भी कभी ऐसे ही उलझा पड़ा था, परन्तु परमानन्द पूर्ण हो चुकने
वाला मैं, भला कौन सी इच्छा को लेकर संसार में फँसा रहूँ ? पर-
लोक जाने वाले लोग कर्म करते हैं तो करें, कभी मैं भी ऐसे ही किया
करता था। परन्तु सर्वलोकस्वरूप बन चुकने वाला मैं अब यह सब
बखेड़ा क्यों करूँ ? नींद और भिक्षा स्नान और शौच की न मुझे
चाह है और न मैं करता ही हूँ। देखने वाले मुझे करता हुआ सम-
झते हैं तो वे समझा करें। दूसरों के समझने से क्या होता है।
जिन गुंजाओं को दूसरों ने आग मान लिया हो तो क्या वे यथार्थ ही
जलाने लगती हैं ? इसी तरह दूसरों ने जिन संसारधर्मों का आरोप

१३२ पञ्चदशी
इस मरे हुए शरीर को देखकर मुझ में कर लिया है वे सब धर्म मुझ
में नहीं है। जिन्होंने तत्व को सुना नहीं है वह सुनते फिरें, तत्व को
जान चुकने वाला मैं भला क्यों सुनूँ ? जिन्हें संशय हो वे मनन
करें, जिस मुझे संशय ही नहीं रहा वह मैं मनन क्यों करने लगूँ ?
जिसे विपर्यास हो वह निदिध्यासन करे, जब मुझे विपरीत ज्ञान
ही नहीं रहा तब मैं ध्यान ही क्यों और किस बात का करूँ ? मुझे
तो अब कभी यह मालूम ही नहीं होता कि मैं देह हूँ। मैं जो कभी
कभी यह कह देता हूँ कि 'मैं मनुष्य हूँ' सो तो अनादिकाल की
वासनाओं के प्रभाव से कह बैठता हूँ। जब मेरा प्रारब्ध-कर्म नष्ट
हो जायगा तब निश्चय ही यह व्यवहार भी नहीं रहेगा। जब तक
मेरे प्रारब्धकर्म क्षीण न हो जांयगे तब तक हज़ार ध्यान करने पर
भी यह व्यवहार रुक नहीं सकेगा। जो व्यवहार को कम करना
चाहते हों उन्हें यह ध्यान भले ही पसन्द हो, मुझे तो अब यह
व्यवहार बाधक ही प्रतीत नहीं होता। फिर मैं ध्यान क्यों करूँ ?
विक्षेप भी अब मुझे नहीं होता इस कारण समाधि भी नहीं होती।
विक्षेप और समाधि ये दोनों तो विकारी मन को ही होते हैं। मैं
आत्मानुभव करने भी क्यों बैठ जाऊँ ? मैं तो नित्यअनुभवरूप ही
हूँ। मुझ से पृथक् और अनुभव क्या होगा ? मुझे अब निश्चय हो
गया है कि जो करना था सो कर डाला और जो पाना था सो पा
चुका। अब लौकिक, शास्त्रीय या और किसी तरह का भी व्यवहार
मेरे प्रारब्धानुकूल चलता रहो, मैं तो अकर्ता और अलेप हो गया.
हूँ। या फिर जिस मार्ग पर चलकर मुझे कृतकृत्यता मिली है वह
मार्ग औरों के लिये भी बना रहो इसलिये लोकसंग्रह का ध्यान रख
कर मैं शास्त्रीय मार्ग पर ही चलता रहूँगा इसमें भी मेरी कोई हानि
नहीं है। लोगों को दिखाने और सिखाने के लिये मेरा शरीर देवार्चन

ब्रह्मानन्दान्तर्गत विद्यानन्द का संक्षेप १३३
स्नान शौच तथा भिक्षायात्रा जप या वेदान्त का पाठ किया करो,
यह मेरी बुद्धि विष्णु का ध्यान करो या ब्रह्मानन्द में गोता लगाकर
बैठ जाओ, मैं तो साक्षी हूँ मैं कुछ करता या करवाता नहीं हूँ। कृत-
कृत्यता और प्राप्तप्राप्यता की खुशी जब उसके अन्दर नहीं समाती
है तब मन में यह विचार किया करता है कि मैं धन्य हूँ क्योंकि मैं
अपने नित्य आत्मतत्व को ठीक ठीक समझ गया हूँ। मैं धन्य हूँ
क्योंकि मुझे आज स्पष्ट ही ब्रह्मानन्द समुद्र दीख पड़ रहा है। मैं
धन्य हूँ क्योंकि मुझे आज कोई भी सांसारिक दुःख दीखता नहीं
है। मैं धन्य हूँ क्योंकि आज मेरा अज्ञान दिगन्त को पलायन कर
गया है। मैं धन्य हूँ क्योंकि जो मुझे प्राप्तव्य था वह आज सभी सिद्ध
हो गया है। मैं धन्य हूँ क्योंकि आज मेरे समान धन्य कौन निक-
लेगा ? मैं धन्य हूँ मैं धन्य हूँ मैं वार वार धन्य हूँ। ओहो ! आज
मेरे पुण्यों के ढेर एक साथ ही फल पड़े हैं। पुण्यों की इस महती
सम्पत्ति के कारण आज मैं कृतकृत्यता की झूल में पड़ा हुआ झोटे
ले रहा हूँ। मुझे ज्ञान कराने वाले शास्त्र, मुझे मार्ग दिखाने वाले गुरु,
मेरा वह ज्ञान और मेरा वह आनन्द जिनके कारण आज यह धन्य
अवस्था मुझे हाथ आयी है, सभी धन्य हैं। वे सबके सब आज मुझे
मेरा पद देकर समुत्तीर्ण हो गये। उनकी महिमा गाने के लिये
मैं शब्दों को कहां से लाऊँ ? ऊपर कहा हुआ ऐसा विद्यानन्द
(ज्ञानानन्द) जब तक न उमड़ पड़े तब तक ब्रह्माभ्यास करते ही
जाना चाहिये।

15. Vishayananda

[ १५ ]
ब्रह्मानन्दान्तर्गत विषयानन्द का संक्षेप
अब ब्रह्मानन्द के ही एक अंश बने हुए विषयानन्द का निरू-
पण इसलिये करेंगे कि वह भी तो ब्रह्मज्ञान को समझने का ही एक
लौकिक द्वार है। श्रुति ने स्वयं उसको ब्रह्मानन्द का ही एक अंश
बताया है। वह कहती है कि—शेष सब प्राणी उसी ब्रह्मानन्द की
मात्रा [कण] को चाट रहे हैं। मन की 'शान्त' 'घोर' तथा 'मूढ़' ये
तीन तरह की वृत्तियां होती हैं। वैराग्य, क्षमा, उदारता आदि 'शान्त'
वृत्तियां कहाती हैं। तृष्णा, स्नेह, राग तथा लोभ आदि 'घोर' वृत्तियां
मानी जाती हैं। सम्मोह और भय आदि 'तामस' वृत्तियां बतायी
जाती हैं। इन सभी वृत्तियों में ब्रह्म का केवल चित्स्वभाव आ गया
है। शान्तवृत्तियों में इतनी और अधिकता है कि इनमें ब्रह्मतत्व का
सुख भी प्रतिबिम्बित हो गया है। 'रूपंरूपं प्रतिरूपो बभूव'इत्यादि
श्रुतियों का भी यही अभिप्राय है कि वह आत्मतत्व किसी में चैतन्य
रूप से और किसी में चैतन्य तथा सुख दोनों रूपों से और किसी
में सत्ता चैतन्य और सुख तीनों रूपों से समाकर उन उनके प्रतिरूप
बन गया है। यह भी कहा है कि—भूतात्मा एक ही है वही सब
भूतों में व्यवस्थित हो रहा है। वह एकरूप से उन्हें दीखता है जो
ज्ञानी हों। परन्तु जिन्हें तत्व का पता नहीं होता उन्हें तो वह जलों
के चाँदोंने की तरह बहुत रूपों में दीखा करता है। कीचड़ वाले जल
में वही चांद अस्फुट दीखता है, निर्मल जल में वही चांद सुस्पष्ट
दीखने लगता है। ठीक उसी प्रकार ब्रह्मतत्व भी शुद्ध और अशुद्ध

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ब्रह्मानन्दान्तर्गत विषयानन्द का संक्षेप १३५
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वृत्तियों में दो तरह का हो जाता है। इसी को विस्तार से यों समझो
कि मलिन होने के कारण 'घोर' और 'मूढ' वृत्तियों में ब्रह्म का
सुखभाग ढका रहता है—दीखता नहीं। उनमें क्योंकि थोड़ी सी ही
निर्मलता रहती है इस कारण केवल चिदंश का ही प्रतिबिम्ब पड़ा
करता है। दूसरा उदाहरण यह भी है कि निर्मल जल में अग्नि की
गरमी तो आ जाती है प्रकाश नहीं आता। इसी तरह 'घोर' और
'मूढ' वृत्तियों में केवल चेतनभाग का ही उद्भव होता है सुखभाग
का नहीं होता। काष्ठ में जैसे उष्णता और प्रकाश दोनों ही उद्भूत
हो जाते हैं, इसी तरह 'शान्त' वृत्तियों में सुख और चैतन्य दोनों
ही उद्भूत हो जाते हैं। ऐसा क्यों होता है ? इसका उत्तर तो हम
यही देंगे कि इनका स्वभाव ही ऐसा है। इनके इस स्वभाव को
देखकर नियामक को ढूँढ निकालो। देखते हैं कि—'घोर' या 'मूढ'
कोई सी भी अवस्था जब हो—उस समय सुख का अनुभव होता
ही नहीं। यह भी देखा जाता है कि—'शान्त' वृत्तियों में तो सुखा-
नुभव होता ही है। घर या खेत आदि की कामना जब किसी के
मन में जाग जाती है तब वह राजस काम, घोर होने से सुख को
उद्भूत होने ही नहीं देता। देखलो कि—यह मेरा काम सिद्ध होगा
या नहीं ? यह विचार जब आता है तब दुःख होने लगता है। जब
काम सिद्ध नहीं होता तब दुःख बढ़ने लगता है। जब कोई उस
काम में रुकावट डालता है तब क्रोध आने लगता है। जब अपनी
कामना के विरुद्ध बात देखनी पड़ जाती है तब उससे द्वेष होने
लगता है। जब वह उसका कुछ इलाज नहीं कर सकता तब उस
समय जो विषाद होता है वह 'तामस' है। इन क्रोधादियों में तो
बड़ा ही दुःख होता है। इनमें सुख की तो थोड़ी सी भी संभावना
नहीं होती। काम्य पदार्थ का लाभ जब किसी को हो जाय

१३६ पञ्चदशी
उस समय जो हर्षवृत्ति उत्पन्न होती है, उसमें बड़ा सुख होता है।
उसका भोग करना मिल जाय तो और भी बड़ा सुख होता है। उस
काम्य पदार्थ के मिलने की सभावना हो जाय तो थोड़ा सा ही सुख
होता है। उसकी ओर से वैराग्य हो जाय तो बहुत ही बड़ा सुख
होता है—जिसका वर्णन हमने विद्यानन्द नाम के प्रकरण में विस्तार
पूर्वक किया है। क्रोध को भगा देने वाली क्षमा और लोभ को मार-
भगाने वाली उदारता में भी बड़ा सुख होता है। परन्तु यह बात
कभी न भूलनी चाहिये कि जो भी कोई सुख होता है वह सब
ब्रह्म का प्रतिबिम्ब होने के कारण ब्रह्म ही है। इष्ट भोग जब मिलता
है और प्राणी की वृत्ति अन्तर्मुख होती है तब वह ब्रह्मतत्व उन
अन्तर्मुख वृत्तियों में निर्विघ्नता के साथ प्रतिबिम्बित हो जाया करता
है। बस यही.तो प्राणियों का 'सुख' कहाता है। 'सत्ता' चैतन्य
और 'सुख' ये ब्रह्म के तीन स्वभाव हैं। मिट्टी और पत्थर आदियों में
केवल सत्ता ही प्रकट होती है, चैतन्य और सुख नहीं। 'घोर' और
'मूढ़' बुद्धिवृत्तियों में 'सत्ता' और 'चैतन्य' दो गुण प्रकट हो जाते
हैं। 'शान्त' वृत्तियों में तो 'सत्ता' 'चैतन्य' और 'सुख' तीनों ही
व्यक्त हो जाते हैं। प्रपंच में मिश्रित ब्रह्मतत्व का निरूपण यहां तक
किया गया। उस ब्रह्म को यदि कोई अमिश्ररूप में देखना चाहे तो
'ज्ञान' और 'योग' से ही उसे देखा जा सकता है। उन दोनों का
वर्णन पहले आ चुका है—ब्रह्मानन्द के प्रथम अध्याय में 'योग' का
वर्णन है। ब्रह्मानन्द के दूसरे [आत्मानन्द] तथा तीसरे [अद्वैतानन्द]
अध्याय में 'ज्ञान' का बखान किया गया है। 'असत्ता' 'जड़ता' और
'दुःख' ये तीनों ही माया के रूप हैं। 'असत्ता'[मिथ्यापन] मनुष्य के
सींग आदि पदार्थों में है। 'जड़ता' काष्ठ पाषाण आदि में पायी जाती
है। घोर और मूढ़ वृत्तियों में दुःख पाया जाता है। यों सब जगह

ब्रह्मानन्दान्तर्गत विषयानन्द का संक्षेप १३७
माया का राज्य विस्तृत हो रहा है । बुद्धि की जो शान्त वृत्तियां हैं
उनके साथ एकता को प्राप्त हुआ हो जाने से उसको 'मिश्रब्रह्म'
कहा है ।
ब्रह्म की स्थिति तो हमने साफ़ साफ़ समझा दी है । अब जो
कोई पुरुष ब्रह्म का ध्यान करना चाहे, वह नृशृंग आदि जैसे पदार्थों
की तो उपेक्षा करता जाय और फिर जो तत्व शेष रह गया हो, उसी
का यथायोग्य रीति से ध्यान करे । वह यों कि—शिला आदियों में
नाम और रूपों [आकारों] को छोड़कर केवल सन्मात्र की ही चिन्ता
किया करे । घोर और मूढ बुद्धियों के दुःख-भाग को छोड़कर उनमें
के सत् और चित् के चिन्तन में लग जाय । शान्त वृत्तियों में तो
सच्चिदानन्द नामक तीनों की ही चिन्ता करने लगे । ये उक्त तीन
प्रकार की चिन्तायें क्रम से 'कनिष्ठ' 'मध्यम' और 'उत्कृष्ट' चिन्ता
कहाती हैं ।
जिन मन्दलोगों को निर्गुण ब्रह्म का ध्यान करने का अधिकार
ही नहीं है, वे लोग व्यवहार काल में भी मिश्र ब्रह्म का चिन्तन करें,
तो उनके लिये यही उत्कृष्ट बात है। ऐसा मिश्रब्रह्मचिन्तन बताने के
लिये ही विषयानन्द नाम का यह प्रकरण लिखा गया है ।
उदासीन अवस्था में जब बुद्धिवृत्ति ढीली पड़ जाती हैं, तब तो
विना वृत्ति का ध्यान होने लगता है। वह ध्यान सब ध्यानों से ऊँचे
दर्जे का है। इस विषयानन्द नाम के प्रकरण में यहां तक चार प्रकार
का ध्यान बताया जा चुका । तीन तरह का तो सवृत्तिक ध्यान तथा
एक विना वृत्ति का ध्यान, यों चार प्रकार का ध्यान हो गया । जड
पदार्थों में सत्ता, मूढ़वृत्ति में सत्ता तथा चैतन्य, सात्विकवृत्ति में सत्ता
चैतन्य तथा आनन्द, यों तीन तरह का सवृत्तिक ध्यान हो जाता है।

१३८ पञ्चदशी
इस ब्रह्मानन्द नाम के पांच अध्याय वाले ग्रन्थ में 'ज्ञान' और
'योग'के द्वारा जिस ध्यान का वर्णन किया है, वह ध्यान तो ब्रह्मविद्या
ही है। उसका वर्णन तो हमने यों किया है कि ध्यान से जब चित्त
एकाग्र हो जाता है तब उस चित्त में ब्रह्मविद्या स्थिर हो जाती है।
ब्रह्मविद्या के स्थिर हो जाने पर ये 'सत्' 'चित्' 'आनन्द' पहले की
तरह अलग अलग नहीं दीखते। तब तो ये अखण्ड एकरस होकर
दीखने लगते हैं। क्योंकि उस समय भेद करने वाली उपाधियां नहीं
रहतीं। भेद करने वाली उपाधियें तो ये शान्त घोर वृत्तियां और
शिलादि पदार्थ ही हैं। इन उपाधियों को यदि कोई हटाना चाहे तो
'योग' या 'विवेक' से ही ऐसा कर सकता है। जब उपाधिरहित
स्वयं प्रकाश अद्वैत ब्रह्मतत्त्व भासने लगता है तब यह प्रत्यक्ष दीख
पड़ने वाली त्रिपुटी नहीं रह जाती। यही कारण है कि तब उसे
'भूमानन्द' भी कह देते हैं।
ब्रह्मानन्दान्तर्गत विषयानन्द का वर्णन समाप्त हुआ। मन्दाधि-
कारी लोग इसी को द्वार बनाकर आत्मधाम में घुस जांय।